यौन उत्पीड़न के शिकार मानसिक रूप से बीमार पीड़ितों को समाज से ज़्यादा सुरक्षा की उम्मीद; बॉम्बे हाईकोर्ट ने धारा 377 के तहत सज़ा पाए आरोपी को राहत देने से मना किया

यौन उत्पीड़न के शिकार मानसिक रूप से बीमार पीड़ितों को समाज से ज़्यादा सुरक्षा की उम्मीद; बॉम्बे हाईकोर्ट ने धारा 377 के तहत सज़ा पाए आरोपी को राहत देने से मना किया

बॉम्बे हाईकोर्ट ने आईपीसी की धारा 377 और 387 के तथत सज़ा पाए एक आरोपी को कोई भी राहत देने सेमना कर दिया। इस आरोपी पर मानसिक रूप से बीमार 32 साल के एक व्यक्ति के साथ अप्राकृतिक यौन संबंधस्थापित करने का आरोप है और उसे सात साल की जेल की सज़ा मिली है।

न्यायमूर्ति मृदुला भटकर ने आरोपी रामचंद्र यादव की आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए यह फ़ैसला दिया।आरोपी रामचंद्र यादव पहले ही 4.5 साल जेल में गुज़ार चुका है। कोर्ट ने कहा कि मानसिक रूप से बीमारव्यक्ति को समाज से ज़्यादा सुरक्षा की ज़रूरत होती है और इस तरह उसने आरोपी को कोई भी राहत देने सेमना कर दिया।

पृष्ठभूमि

अभियोजन के अनुसार, 24 जून 2012 को पीड़ित अपने एक दोस्त के साथ सिद्धिविनायक मंदिर के लिए चला।बाद में आरोपी, जो कि उसका पारिवारिक मित्र है, ने उसे फोन किया कि वह अपने ऑफ़िस में अकेले है औरवह उसके पास आ जाए। पीड़ित कलबादेवी स्थित उसके ऑफ़िस गया जहाँ आरोपी ने उसके साथ अप्राकृतिकयौन संबंध बनाया।

इसके बाद पीड़ित ने अपनी मां को इस बात की जानकारी दी जिसने पुलिस में रिपोर्ट लिखाई और आरोपी कोगिरफ़्तार किया गया।

आरोपी की चिकित्सा जाँच हुई जिसमें इस बात की पुष्टि हुई कि उसके साथ ज़बरन अप्राकृतिक यौन संबंध बनाएगए हैं। बाद में यह साबित हुआ कि पीड़ित मानसिक रूप से रोगग्रस्त है और उसकी मानसिक उम्र आठ सालहै।

इसके बाद निचली अदालत ने आरोपी को सात साल की सज़ा दी और अतिरिक्त सत्र जज ने इस सज़ा की पुष्टिकी।

फ़ैसला

न्यायमूर्ति भटकर ने आरोपी की ओर से दी गई दालील को मानने से इंकार कर दिया और उसे कोई राहत देने सेमना कर दिया।

कोर्ट ने कहा कि आरोपी घटना से पहले से ही पीड़ित को अच्छी तरह जानता था और उसने उसकी मानसिकअस्वस्थता का नाजायज़ फ़ायदा उठाया। अदालत ने कहा कि उन्हें आरपी में ऐसा कोई सुधार नहीं दिखता किउसको कोई राहत दी जा सके। इसलिए उसे किसी तरह की रियायत नहीं दी जाएगी।

इस तरह कोर्ट ने उसकी सज़ा की पुष्टि की और समीक्षा की उसकी याचिका ख़ारिज कर दी।