मिताक्षरा कानून - एक पुरुष द्वारा प्राप्त की गई संपत्ति, 3 डिग्री नीचे तक के उत्तराधिकारियों के लिए सहसंयोजक (कोपार्सनरी) संपत्ति के रूप में बनी रहेगी: SC [निर्णय पढ़ें]

मिताक्षरा कानून - एक पुरुष द्वारा प्राप्त की गई संपत्ति, 3 डिग्री नीचे तक के उत्तराधिकारियों के लिए सहसंयोजक (कोपार्सनरी) संपत्ति के रूप में बनी रहेगी: SC [निर्णय पढ़ें]

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि मिताक्षरा कानून के तहत यह नियम कि जब भी कोई पुरुष अपने पूर्वजों में से किसी से भी 3 डिग्री ऊपर तक की संपत्ति प्राप्त करता है, तो उसके बाद उसके 3 डिग्री तक के कानूनी रूप से पुरुष उत्तराधिकारियों को उस संपत्ति में सहसंयोजक (कोपार्सनर्स) होने के नाते बराबर अधिकार प्राप्त होगा, यह नियम उत्तराधिकार के उन मामलों में लागू होगा जहाँ संपत्ति हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 से पहले खोली गई थी।

इस नियम को लागू करते हुए, जस्टिस यू. यू. ललित और जस्टिस इंदू मल्होत्रा की पीठ ने एक अर्शनूर सिंह द्वारा दायर अपील को अनुमति दी, जिससे वर्ष 1999 में उनके पिता धरम सिंह द्वारा निष्पादित बिक्री डीड (sale deed) को रद्द किया जा सके। इस सेल डीड के अनुसार, धरम सिंह द्वारा संयुक्त परिवार की संपत्ति को प्रतिवादी हरपाल कौर को दे दिया गया था, जिससे उन्होंने बाद में दूसरी पत्नी के रूप में शादी की।
धरम सिंह को वर्ष 1964 में उनके पिता इंद्र सिंह द्वारा निष्पादित विभाजन के अनुसार संपत्ति मिली थी। इंद्र सिंह को अपने पिता लाल सिंह से विरासत के माध्यम से संपत्ति मिली थी जब वर्ष 1951 में उनकी मृत्यु हो गई थी।
वर्ष 2003 में वयस्कता हासिल करलेने के बाद, वर्ष 2004 में दायर एक मुकदमे में अर्शनूर सिंह द्वारा सेल डीड को चुनौती दी गई थी। उन्होंने दावा किया कि संपत्तियां कोपार्सनरी गुण की थीं, जिन्हें धर्म सिंह ने बिना किसी कानूनी आवश्यकता के और बिना प्रतिवादी से कोई प्रतिफल प्राप्त किये दे दिया था।
ट्रायल कोर्ट ने मुकदमा डिक्री कर दिया. इसके बाद प्रतिवादी द्वारा दायर अपील में इसकी पुष्टि की गई थी।
हालांकि, पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने द्वितीय अपील में इस आधार पर डिक्री को रद्द कर दिया कि वर्ष 1964 में इंदर सिंह द्वारा किये गए विभाजन के बाद संपत्ति कोपार्सनरी नहीं रह गयी थी। इसलिए, अर्शनूर सिंह के पास सेल डीड को चुनौती देने का कोई आधार नहीं था। इसे चुनौती देते हुए, वह शीर्ष अदालत के समक्ष अपील में आया।
शीर्ष अदालत ने कहा कि इस मामले में, सक्सेशन वर्ष 1951 में हुआ जब अपीलकर्ता के बाबा के पिता (great grandfather) लाल सिंह की मृत्यु हुई। चूंकि यह हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के प्रारंभ से पहले हुआ था, तो उसपर मिताक्षरा कानून लागू होगा। इसका मतलब यह था कि लाल सिंह से प्राप्त संपत्ति, उनके पुरुष उत्तराधिकारियों की तीन डिग्री नीचे तक (इंदर सिंह, धर्म सिंह और अर्शनूर सिंह) कोपार्सनरी गुण को बनाए रखेगी।
"यदि उत्तराधिकार पुराने हिंदू कानून के तहत खोला जाता है, अर्थात हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के शुरू होने से पहले, तो पार्टियों को मिताक्षरा कानून द्वारा शासित किया जाएगा। एक पुरुष हिंदू द्वारा अपने पैतृक पुरुष पूर्वजों से विरासत में मिली संपत्ति उसके पास, उसके तीन डिग्री नीचे तक के पुरुष उत्तराधिकारियों के सापेक्ष, सहसंयोजक संपत्ति (कोपार्सनरी) के रूप में होगी। संपत्ति की प्रकृति, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की शुरुआत के बाद भी सहसंयोजक संपत्ति (कोपार्सनरी) के रूप में रहेगी," न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा द्वारा लिखित निर्णय में अवलोकन किया गया।
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 लागू होने के बाद, इस स्थिति में बदलाव आया है। वर्ष 1956 के बाद, यदि कोई व्यक्ति अपने पैतृक पूर्वजों से स्व-अर्जित संपत्ति का उत्तराधिकार लेता है, तो उक्त संपत्ति उसकी स्व-अर्जित संपत्ति बन जाती है, और वह सहसंयोजक संपत्ति (एचएसए की धारा 8) नहीं रहती है।
"वर्तमान मामले में, वर्ष 1951 में उत्तराधिकार लाल सिंह की मृत्यु पर खोला गया। उनके पुत्र इंदर सिंह को विरासत में मिली संपत्ति, प्रकृति में कोपार्सनरी थी। भले ही इंदर सिंह ने 1964 में अपने बेटों के बीच सहसंयोजक संपत्ति (कोपार्सनरी) के विभाजन को प्रभावित किया था, परन्तु इंदर सिंह के बेटों को विरासत में मिली संपत्ति की प्रकृति उनके तीन डिग्री नीचे तक के पुरुष उत्तराधिकारियों के सापेक्ष, सहसंयोजक संपत्ति (कोपार्सनरी) के रूप में बनी रहेगी," अदालत ने आगे कहा।
अदालत ने कहा कि सूट संपत्ति जो विभाजन के माध्यम से स्वर्गीय धरम सिंह के हिस्से में आई, वह उनके बेटे अर्शनूर सिंह के सापेक्ष सहसंयोजक संपत्ति (कोपार्सनरी) थी, जो वर्ष 1985 में अपने जन्म पर सूट की संपत्ति में सहसंयोजककर्ता बन गए।
प्रतिवादी ने उत्तम बनाम सौभाग सिंह (2016) 4 एससीसी 68 के निर्णय पर अपनी निर्भरता रखी थी, जिसमे यह अभिनिर्णित किया गया था कि विभाजन के बाद संपत्ति, संयुक्त परिवार की संपत्ति का चरित्र खो देगी। लेकिन SC द्वारा इस आधार पर इसे अलग माना गया कि उस मामले में उत्तराधिकार 1956 के बाद खोला गया था
SC ने यह माना कि यह कानून है कि एक कर्ता द्वारा सहसंयोजक प्रॉपर्टी बेचने की शक्ति कुछ प्रतिबंधों के अधीन है, जैसे बिक्री कानूनी आवश्यकता के लिए या संपत्ति के लाभ के लिए होनी चाहिए। विधिक आवश्यकता के अस्तित्व को स्थापित करने का भार कर्ता पर होता है।
यह साक्ष्य में सामने आया था कि हरपाल कौर के पक्ष में धर्म सिंह द्वारा की गयी सेल डीड के लिए कोई मौद्रिक प्रतिफल नहीं मिला था।
"यह तथ्य कि दिनांक 01.09.1999 की सेल डीड को बिना किसी प्रतिफल के निष्पादित किया गया था, यह खुद ही दिखाता है कि सूट की संपत्ति किसी भी कानूनी आवश्यकता के बिना बेची गई थी। सह्संयोजक संपत्ति होने के नाते, यह कानूनी आवश्यकता के बिना, या लाभ के बिना बेची नहीं जा सकती थी," अदालत ने यह देखा।
इसलिए,अपील को अनुमति दी गई।