एससी-एसटी अधिनियम में 2018 में हुए संशोधन के बाद भी अग्रिम ज़मानत याचिका पर ग़ौर करने पर कोई रोक नहीं : बॉम्बे हाईकोर्ट [निर्णय पढ़े]

एससी-एसटी अधिनियम में 2018 में हुए संशोधन के बाद भी अग्रिम ज़मानत याचिका पर ग़ौर करने पर कोई रोक नहीं : बॉम्बे हाईकोर्ट [निर्णय पढ़े]

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है कि सत्र अदालत और हाईकोर्ट एससी-एसटी अधिनियम में 2018 में संशोधन के बाद भी इस अधिनियम के तहत दायर मुक़दमों में अग्रिम ज़मानत के आवेदन पर ग़ौर कर सकता है।

न्यायमूर्ति टीवी नलवाड़े और न्यायमूर्ति मंगेश एस पाटिल की पीठ ने कहा कि सिर्फ़ इसलिए कि एफआईआर एससी-एसटी अधिनियम के तहत दायर किया गया है, अधिनियम के तहत अपराध को दंडनीय अपराध के लिए पंजीकृत नहीं किया जा सकता है और इस अधिनयम के तहत अपराध को तभी पंजीकृत किया जा सकता है जब आरोप में इस तरह की बातें हों जिसके आधार पर इस अधिनियम के तहत सज़ा दी जा सकती है।

कोर्ट एक ऐसे मामले की सुनवाई कर रहा था जिसमें एक व्यक्ति के ख़िलाफ़ एससी-एसटी अधिनियम के तहत आरोप लगाए गए हैं। अग्रिम ज़मानत की इस याचिका को सत्र अदालत ने इस आधार पर ख़ारिज कर दिया कि अधिनियम की धारा 18-A(2) के तहत इसकी मनाही है। हाईकोर्ट के समक्ष भी अभियोजन ने यह दलील दिया कि उपरोक्त प्रावधान कोई देखते हुए अब 20-8-2018 के बाद अंतरिम ज़मानत नहीं दी जा सकती।

संशोधन का ज़िक्र करते हुए पीठ ने कहा, धारा 18 के प्रावधान 18-A(2) के प्रावधानों से बहुत अलग नहीं हैं। पीठ ने कहा कि उच्च अदालत को नए प्रावधानों की व्याख्या का अधिकार है ताकि नए प्रावधानों के ध्येय को सुनिश्चित किया जा सके और इस नए प्रावधान की संवैधानिक वैधता को सुनिश्चित कर सके।

"…यह कहा जा सकता है कि इस अधिनियम के संशोधन का मुख्य उद्देश्य यह कहना था कि अपराध के पंजीकरण से पहले किसी भी तरह के जाँच की ज़रूरत नहीं है और अपराधी को गिरफ़्तार करने से पहले आवश्यक अनुमति लेना ज़रूरी नहीं है अगर यह अपराध इस अधिनियम के तहत हुआ है। वर्ष 2018 में इस अधिनियम को संशोधित करने का कोई और कारण नहीं था…।"

इस मामले में शुरू में FIR आईपीसी की धारा 307, 341, 504 और 506 के तहत दायर किए गए थे। बाद में शिकायकर्ता ने पूरक बयान दाख़िल किया जिसमें उसने आरोप लगाया था कि यह घटना उसके लिए आरोपी के मन में घृणा होने के कारण हुई क्योंकि वह अनुसूचित जनजाति का है। कोर्ट ने इस पर ग़ौर करते हुए कहा,

"…बयान से यह नहीं लगता कि जानबूझकर अपमानित किया गया या उसे अपमानित करने के ध्येय से धमिकियाँ दी गईं। प्रथम सूचना देने वाले का यह आरोप नहीं है कि उसे जाति के नाम पर गाली दी गई जैसा कि अधिनियम की धारा 3 (1)(s) में है।

Dr. Subhash Kashinath Mahajan vs. State of Maharashtra मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में इस बात का जाँच करने को कहा था कि कुछ प्रारंभिक जाँच अपराध दर्ज कराने के पहले होता है या नहीं। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि अगर अपराध करने वाला सरकारी नौकर नहीं है तो उसके ख़िलाफ़ मामला चलाने के लिए ज़िला के एसएसपी से लिया जा सकता है और अगर वह सरकारी अधिकारी है तो उसको नियुक्ति करने वाले अधिकारी से अनुमति ली जाए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि इस मामले में अत्याचार अधिनियम के तहत अग्रिम ज़मानत याचिका पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है अगर न्यायिक जाँच से यह पता चलता है कि शिकायत दुर्भावनापूर्ण है। इस फ़ैसले पर हंगामा हो गया जिसके बाद केंद्र और कई राज्य सरकारों ने इस फ़ैसले की समीक्षा की माँग की थी। पर अदालत ने किसी भी तरह की राहत देने से मना कर दिया।

इसके बाद ही इस अधिनियम को संशोधित किया गया और इसमें एक नई धारा 18A जोड़ दी गई।