आपराधिक मामलों में सजा सुनाते समय पीड़ित और समाज के हित को भी ध्यान में रखें अदालत : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]

आपराधिक मामलों में सजा सुनाते समय पीड़ित और समाज के हित को भी ध्यान में रखें अदालत : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]

सुप्रीम कोर्ट ने यह माना है कि अदालतों को आपराधिक मामलों में सजा सुनाते समय पीड़ित और समाज के हित को भी ध्यान में रखना चाहिए।

दरअसल सूर्यकांत बाबूराव @ रामराव चरण बनाम महाराष्ट्र राज्य के मामले में उच्च न्यायालय ने कारावास की सजा को 7 साल से घटाकर 5 साल कर दिया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति आर. बानुमति और न्यायमूर्ति ए. एस. बोपन्ना की पीठ इस दृष्टिकोण से असहमत रही

पीठ ने कहा :
"अदालतों को न केवल अभियुक्तों के अधिकार को ध्यान में रखना चाहिए, बल्कि बड़े पैमाने पर पीड़ित और समाज के हित को भी ध्यान में रखना चाहिए। अदालतें इस दृष्टिकोण के साथ रही हैं कि अपराध की गंभीरता और सजा के बीच उचित अनुपात बनाए रखा जाना चाहिए। जबकि यह सच है कि आरोपियों पर लगाई गई सजा कठोर नहीं होनी चाहिए, पर सजा की अपर्याप्तता से पीड़ित और समुदाय को बड़े पैमाने पर नुकसान उठाना पड़ सकता है। "

पीठ ने यह भी कहा कि हालांकि अदालत को सजा देने के लिए विवेक के इस्तेमाल का अधिकार है, लेकिन इसे अपराध की गंभीरता के साथ सराहा जाना चाहिए और सजा के विकल्प को समझाने के लिए इसके संक्षिप्त कारण को भी बताना चाहिए।

इस मामले में पीड़िता के सीने में गोली लगने के कारण हुई चोटों की प्रकृति को देखते हुए और डॉक्टर की राय कि पीड़ित को लगी चोटें मौत का कारण बनने में सक्षम हैं, हाईकोर्ट ने पहले आरोपियों की सजा कम करके सही नहीं किया, पीठ ने यह कहा