विवरणों का पूरा ख़ुलासा करने की ज़िम्मेदारी बीमित व्यक्ति की है, बीमाकर्ता को अपर्याप्त ख़ुलासे के बार में बताने को कहकर उस पर इसका अनावश्यक बोझ नहीं डाला जा सकता : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]

विवरणों का पूरा ख़ुलासा करने की ज़िम्मेदारी बीमित व्यक्ति की है, बीमाकर्ता को अपर्याप्त ख़ुलासे के बार में बताने को कहकर उस पर इसका अनावश्यक बोझ नहीं डाला जा सकता : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यह बीमित व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह बीमा प्रस्ताव प्रस्तुत करने के समय स्पष्ट रूप से विशेष जानकारियों का ख़ुलासा करे।

संबंधित पॉलिसी की जहाँ तक बात है, पिछले तीन सालों में दावों के बारे में जो विवरण जमा कए गए हैं वे ऐसे विवरण थे जो उन्हें जमा कराना ज़रूरी था पर बीमित व्यक्ति ने इन्हें जमा नहीं कराया।

एनसीडीआरसी ने कहा कि चूँकि पूर्व की पॉलिसी को प्रस्ताव में शामिल किया गया, बीमाकर्ता को जाँच-पड़ताल करने पर यह पता चल सकता था कि पहलेवाले बीमाकर्ता के समक्ष किए गए दावे क्या थे। यह कहा गया कि अगर पैराग्राफ़ 25(g) के तहत अगर ज़रूरी विवरणों का ख़ुलासा नहीं किया गया है, तो बीमाकर्ता को बीमा प्रस्ताव को वापस कर देना चाहिए था। एनसीडीआरसी के अनुसार, बीमाकर्ता ने अगर सामान्य सक्रियता दिखाई होती तो उसे तथ्यों की सच्ची जानकारी हो जाती और इसलिए वह दावे से इंकार करके उचित कार्य नहीं किया है।

आयोग के इस रूख से असहमति जताते हुए न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता की पीठ ने कहा :

"जाँच द्वारा अपर्याप्त विवरणों के बारे में पूर्व बीमाकर्ता से जानकारी इकट्ठा करने का बोझ बीमाकर्ता पर नहीं डाला जा सकता ताकि यह पता किया जा सके कि दावे की प्रकृति क्या हैइसके उलट, यह प्रतिवादी का कर्तव्य था कि वह प्रस्ताव सौंपने के समय स्पष्ट रूप से विशिष्ट जानकारियों की घोषणा करता। न्यू इंडिया एस्योरेंश कंपनी के कराई गई बीमा की अवधि 15 नवंबर 2004 से 14 नवंबर 2005 तक की अवधि के लिए था। उत्खननकर्ता15 नवंबर 2005 से 10 अक्टूबर 2006 तक बिना बीमा कवर के रहा। प्रतिवादी का मामला यह है कि उस अवधि के दौरान उसमें मरम्मत का काम चल रहा था। पहले प्राप्त किए गए बीमा के दावे के साथ-साथ ये तथ्य के आधार पर बीमाकर्ता यह निर्णय कर सकता था कि उसे बीमा के इस प्रस्ताव को स्वीकार करना चाहिए कि नहीं। पैराग्राफ़25(g) के तहत जिन ख़ुलासों की ज़रूरत थी उसके आधार पर बीमा प्रस्ताव देने के समय इस वाहन के रिस्क फ़ैक्टर के बारे में आकलन किया जा सकता था"।

पीठ ने अपील स्वीकार कर ली और कहा कि बीमित व्यक्त पर यह ज़िम्मेदारी थी कि अपने बीमा प्रस्ताव के बारे में पूर्व की बीमा को लेकर वह पूर्ण ख़ुलासा करता।