हत्या के अभियुक्त बरी : सुप्रीम कोर्ट ने उन चार लोगों के ख़िलाफ़ जाँच का आदेश दिया जिनकी पहचान घायल गवाह ने की थी [निर्णय पढ़े]

हत्या के अभियुक्त बरी : सुप्रीम कोर्ट ने उन चार लोगों के ख़िलाफ़ जाँच का आदेश दिया जिनकी पहचान घायल गवाह ने की थी [निर्णय पढ़े]

सुप्रीम कोर्ट ने न केवल हत्या के छह आरोपियों को मौत की सज़ा से बरी कर दिया है बल्कि 15 साल पहले हुए इस हत्याकांड की आगे जाँच का आदेश भी दिया। जस्टिस सिकरी ,जस्टिस अब्दुल नज़ीर और जस्टिस म आर शाह की पीठ ने ये निर्णय दिया |

अंकुश मारुति शिंदे और पाँच अन्य लोगों पर यह आरोप है कि उन्होंने पाँच हत्याओं को अंजाम देने और एक महिला के साथ बलात्कार का आरोप है। यह महिला बच गई और पर 15 साल के एक बच्चे की मौत हो गई। सुप्रीम कोर्ट ने 2009 में इस मामले में सभी लोगों को मौत की सज़ा को सही ठहराया था। पर मंगलवार को दिए फ़ैसले में उसने सभी को बरी कर दिया।

रहस्यमय चार

पीठ ने कहा कि रेकर्ड के अनुसार एक घायल गवाह ने फ़ोटो में ऐसे चार लोगों की उनके नाम के साथ पहचान की थी जिन पर इस मामले में आरोपियों के अलावा मुक़दमा चला था।

"गवाह नम्बर PW8 ने जिन चार लोगों की 7.6.2003 को पहचान की थी उनके बारे में कोई जाँच नहीं की गई। उल्टे, वर्तमान मामले में जो आरोपी हैं वे सब के सब घूमंतू आदिवादी हैं और इन्हें फ़र्ज़ी तरीक़े से फँसाया गया है या इस मुक़दमें में लाया गया है", पीठ ने कहा।

निचली अदालत ने आरोपी को सज़ा दिलाने के लिए इसी गवाह के बयान पर भरोसा किया था जिसने ढाई साल के बाद इन छह गवाहों के ख़िलाफ़ सबूत दिए। हालाँकि, हाईकोर्ट में यह दलील दी गई कि उसने कोर्ट में जो बातें कहीं वही बात पुलिस/विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट के समक्ष अपने बयान में उसने नहीं कहा थाजो जाँच के दौरान रेकर्ड किया गया था और पीठ ने उसे दरकिनार कर दिया था यह कहते हुए कि जिन बातों का ज़िक्र नहीं किया गया है वे मामूली हैं।

"PW8 जो गवाही दी है उसको देखने के बाद हम हाईकोर्ट की इस दलील को नहीं मानते कि जो नहीं कही गई वह मामूली बात थीहमारी राय में जो नहीं कही गई वह महत्त्वपूर्ण बात थी और यह अभियोजन के मामले के लिए घातक और यह PW8 के बारे में काफ़ी हद तक अविश्वास पैदा करता है।"

पीठ ने इसके बाद कहा कि यह मामले में सीआरपीसी की धारा 173(8) के तहत उन चार लोगों के बारे में आगे जाँच की ज़रूरत है जिनकी घायल गवाह ने पहचान की थी। अपने आदेश में कोर्ट ने कहा,

"अभियोजन को निर्देश है कि वह इस मामले में सीआरपीसी की धारा 173(8) के तहत आगे उन चार लोगों की और जाँच करे जिनकी घायल गवाह ने फ़ोटो में उनके नाम के साथ घटना के तुरंत बाद 7.6.2003 को पहचान की थी ताकि इस मामले के वास्तविक दोषी को सज़ा दिलाई जा सके जिसमें पाँच लोगों की नृशंसहत्या हुई और एक महिला के साथ बलात्कार हुआ।"

सभी पर लटक रही थी मौत की तलवार

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य को निर्देश दिया कि वह हर 'आरोपी' को पाँच-पाँच लाख का मुआवज़ा दे और इसके बाद पीठ ने इन लोगों ने किस तरह जेल में अपने जीवन के 15 साल काटे हैं उसका ज़िक्र किया।

"एक को छोड़कर सभी पिछले 16 सालों से जेल में हैं। सब पर मौत की तलवार लटक रही थी। छह आरोपियों में से एक नाबालिग़ पाया गया। डॉक्टर अशित सेठ जो मनोचिकित्सक हैं, ने एक आरोपी अंकुश मारुति शिंदे की जाँच की और उसे नाबालिग़ पाया और उसने बताया है कि उसे सालों तक बहुत ही अमानवीयहालात में रखा गया है।उसे बहुत ही सीमित मानवीय सम्पर्क वाले एकांत स्थान पर मौत के निरंतर साये में रखा गया है। उसे सिर्फ़ उसकी माँ से मिलने दिया जाता था और वह भी कभी कभी। उसे अन्य बंदियों के साथ घुलने मिलने नहीं दिया जाता था। इस तरह सभी आरोपी निरंतर तनाव में रह रहे थे। चूँकि वे सब मौतकी सज़ा पाए हुए थे इसलिए उन्हें ना तो परोल मिल सकता था और ही थोड़े दिन की छुट्टी। ये सभी लोग जो 25 से 30 साल की उम्र के थे (और इनमें से कोई भी आरोपी नाबालिग़ नहीं था), ने अपने जीवन के बहुमूल्य समय जेल में बिताए हैं। उनके परिवार वालों को नुक़सान उठाना पड़ा है।"

कोर्ट ने महाराष्ट्र राज्य के गृह विभाग के मुख्य सचिव को इस मामले की जाँच करने और इस मामले में हुई ग़लती के लिए जवाबदेह अफ़सरों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने को कहा।