सेना के अनुशासनात्मक क्षेत्राधिकार के ख़िलाफ़ निष्फलकारी न्यायिक हड़ताल अनावश्यक है : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]

सेना के अनुशासनात्मक क्षेत्राधिकार के ख़िलाफ़ निष्फलकारी न्यायिक हड़ताल अनावश्यक है : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुशासनात्मक क्षेत्राधिकार का रास्ता अपनाने की ज़रूरत है कि नहीं इस बात का निर्धारण करने के अधिकार को अपने हाथ में लेकर हाईकोर्ट को सेना के अनुशासनात्मक क्षेत्राधिकार को निष्फल नहीं करना चाहिए।

न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता की पीठ ने मणिपुर हाईकोर्ट के आदेश के ख़िलाफ़ भारत सरकार की याचिका पर ग़ौर करते हुए यह फ़ैसला सुनाया। पीठ के अनुसार, ऐसा करना सेना अधिनियम, 1950 के तहत एक अधिकारी के ख़िलाफ़ उसकी अनुशासनात्मक कार्रवाई के अधिकार को निष्फल करना है।

इस मामले में, लेफ़्टिनेंट कर्नल धर्मवीर सिंह के ख़िलाफ़ 1986 के सेना निर्देश नम्बर 30 के तहत कुर्की आदेश में हस्तक्षेप किया था। सेना अधिकारी के ख़िलाफ़ अनुशासन तोड़ने, हथियार अधिनियम और सुरक्षात्मक और प्रशासनिक लापरवाही के आरोप में अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की गई थी।

पीठ ने कहा कि एकल जज को सावधानी बरतनी चाहिए थी और कुर्की के आदेश को स्थगित करने से पहले सावधानी बरतनी चाहिए थी। पीठ ने कहा कि सैन्य बल अधिकरण अधिनियम, 2007 की धारा 3(0) में 'सेवा मामले' की परिभाषा और धारा 14 के तहत सैन्य बल अधिकरण के क्षेत्राधिकार को देखते हुए इस तरह की रिट याचिका पर हाईकोर्ट को ग़ौर नहीं करना चाहिए था।

कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर अनुशासनात्मक क्षेत्राधिकार का उपयोग किया जाना है तो ऑफ़िसर को सैन्य अधिनियम 1950 के अनुशासन सम्बंधी विनियमों का पालन करना होगा। पीठ ने इसके साथ ही हाईकोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया।