यौन व्यापार से छुड़ाए गए महिलाओं को किसी मध्यवर्ती क़ैद में तीन सप्ताह से ज़्यादा समय तक नहीं रखा जा सकता : बॉम्बे हाईकोर्ट

यौन व्यापार से छुड़ाए गए महिलाओं को किसी मध्यवर्ती क़ैद में तीन सप्ताह से ज़्यादा समय तक नहीं रखा जा सकता : बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में उन दो महिलाओं को बरी कर दिया जिन्हें कथित रूप से वेश्यावृत्ति के धंधे से मुक्त कराया गया था। कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट द्वारा 21 के दिनों के भीतर इनके पुनर्वास के बारे में कोई आदेश पास नहीं कर पाने के कारण इन्हें तीन सप्ताह से ज़्यादा समय तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता है।

न्यायमूर्ति मृदुला भाटकर ने इमॉरल ट्रैफ़िक (निवारण) अधिनियम (PITA), 1956 की धारा 17(3) के प्रावधान के तहत यह आदेश दिया।

इन महिलाओं ने अदालत में याचिका दायर कर उन्हें नवजीवन महिला संस्था देवनार, मुंबई से बाहर निकाले जाने की माँग की थी। इन महिलाओं को मुंबई के ग्रांट रोड से एक पुलिस छापे के बाद छुड़ाया गया था। इसके बाद इन्हें अगस्त 2018 में देवनार स्थित पुनर्वास केंद्र में रख दिया गया था।

अब इन महिलाओं ने एक याचिका दायर कर कहा है कि उन्हें इसी पुनर्वास केंद्र पर मई 2018 से यानी मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए जाने के समय से रखा गया है। इसके बाद गत वर्ष अगस्त में विशेष जज ने Protection of Children from Sexual Offences Act के तहत इनको देवनार के पुनर्वास केंद्र पर एक साल के लिए रखे जाने का आदेश दिया था। यह आरोप लगाया कि ऐसा करना PITA की धारा 17(3) का उल्लंघन है।

इस दलील से सहमति जताते हुए कोर्ट ने कहा कि उनके पुनर्वास से संबंधित आदेश मजिस्ट्रेट को 21 दिनों के अधीन ही जारी कर देना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा, "इस मामले में 24 मई 2018 को पीड़ितों को मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया और शुरू में उन्हें पुनर्वास केंद्र में रखा गया। हालाँकि, होना चाहिए था कि सत्र न्यायाधीश 14 जून 2018 को या उससे पहले उनके पुनर्वास का आदेश पास करता पर इस तरह का आदेश पास नहीं किया गया।

कोर्ट ने कहा कि इस हालात में, विशेष जज ने एक साल तक पुनर्वास केंद्र में रखने का जो आदेश दिया है उसे निरस्त किया जाता है।

कोर्ट ने याचिकाकर्ता महिलाओं को रिहा करने का इस शर्त पर आदेश दिया कि वे अपना सही पता और रहने के ठिकाने का पता सत्र अदालत और जाँच अधिकारी को बताएँगे।