राजस्व रिकॉर्ड में नाम बदलवाने से भूमि पर क़ब्ज़े का अधिकार नहीं बन जाता और इसका कोई आनुमानिक महत्व भी नहीं है : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]

राजस्व रिकॉर्ड में नाम बदलवाने से भूमि पर क़ब्ज़े का अधिकार नहीं बन जाता और इसका कोई आनुमानिक महत्व भी नहीं है : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी ज़मीन के राजस्व रेकर्ड में नाम बालवाने से उस व्यक्ति का उस ज़मीन पर क़ब्ज़ा नहीं हो जाता है और जिस व्यक्ति की ज़मीन है उसका अधिकार ख़त्म नहीं हो जाता है और न ही इसका कोई आनुमानिक (presumptive) महत्व भी नहीं है। सिर्फ़ इतना होता है कि जिस व्यक्ति का नाम राजस्व रेकर्ड में डाला गया है वह राजस्व का भुगतान कर सकता है।

न्यायमूर्ति अभय मनोहर सप्रे और न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी की पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के एक फ़ैसले के ख़िलाफ़ दायर अपील पर सुनवाई करते हुए यह बात कही। हाईकोर्ट का यह आदेश विवादित भूमि के राजस्व रेकर्ड के बारे में उत्पन्न विवाद से संबंधित है।

"किसी भी भूमि के राजस्व रेकर्ड में बदलाव के बारे में उसकी क़ानूनी स्थिति में क्या परिवर्तन आता है और इससे ज़मीन पर अधिकार को लेकर क्या बदलाव आता है इस बारे में क़ानून बिलकुल स्पष्ट है और इस बारे में बहुत सारे फ़ैसले आ चुके हैं।

"यह अदालत इस बात को लगातार स्पष्ट करता रहा है कि राजस्व रेकर्ड में नाम के परिवर्तन से ज़मीन पर उस व्यक्ति का स्वामित्व नहीं बनता है और न ही इस ज़मीन पर जिसका स्वामित्व है उसका अधिकार ख़त्म होता है। इस बदलाव का कोई आनुमानिक महत्व भी नहीं है। इससे सिर्फ़ यह होता है कि जिस व्यक्ति के पक्ष में नामांतरण किया गया है वह इस ज़मीन का राजस्व चुका सकता है", पीठ ने कहा।

पीठ ने इस बारे में कई मामलों का ज़िक्र किया जिसमें इस तरह के फ़ैसल दिए जा चुके हैं, जैसे : Sawarni (Smt.) vs Inder Kaur, Balwant Singh & Anr vs Daulat Singh and Narasamma & Ors vs State of Karnataka & Ors.

पीठ ने कहा, "यह निर्विवादित तथ्य है कि इस ज़मीन के बारे में दीवानी मुक़दमा अदालत में लंबित है… इसलिए इस बात की पड़ताल नहीं की जा सकती कि जो बदलाव उचित तरीक़े से किया गया या नहीं और ऐसा किसके कहने पर किया गया…।