'लेटर पैड कॉलेजों' से क़ानून की डिग्री ख़रीदने वालों पर रोक लगाने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल को जारी किया नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने लेटर पैड कॉलेजों द्वारा बेची जाने वाली क़ानून की डिग्री पर रोक लगाने की एक याचिका पर बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया (BCI)को नोटिस जारी किया है। याचिका में इस मुद्दे की जाँच की माँग की गई है जो कि क़ानूनी पेशे की पवित्रता को समाप्त कर रहा है।

न्यायमूर्ति एके सीकरी और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नज़ीर की पीठ ने एम वसंत राजा की याचिका पर BCI को नोटिस जारी किया। अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायण ने राजा की ओर से इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ के समक्ष अपना पक्ष रखा।

इस याचिका में याचिकाकर्ता ने इस 'घोटाले' की जाँच की माँग की है। याचिका 20 नवंबर 2018 को दायर की गई थी।

राजा ने अपनी याचिका में इस तरह के फ़र्ज़ी डिग्रीधारी लोगों को पेशे से निकाले जाने की माँग की गई है जो कि क़ानूनी पेशे की पवित्रता को नष्ट कर रहे हैं। इस याचिका में इस तरह के ग़ैरक़ानूनी तत्वों को भविष्य में प्रवेश करने से रोकने के लिए तत्काल क़दम उठाने की माँग की गई है।

याचिकाकर्ता ने लेटर पैड से चलने वाले विधि कॉलेजों द्वारा 'क़ानून की डिग्री की बिक्री' की वर्तमान परिपाटी पर रोक लगाने की माँग की है जो कि देश के सभी हिस्सों में उग आए हैं। याचिका में कहा गया है कि देश में विशेषकर आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश में इसकी स्थिति काफ़ी भयावह है। इन राज्यों में किसी उम्मीदवार के बदले किसी और को भी परीक्षा में बैठने देने की अनुमति है।

याचिकाकर्ता ने कहा है सरकारी नौकरी करने वाले, निजी क्षेत्र में पूर्णकालिक नौकरी करने वाले, व्यवसाइ और असामाजिक तत्त्वों को ये डिग्रियाँ बेची जा रही हैं। इस क्रम में याचिका में चेन्नई के एक पुलिस अधिकारी का उदाहरण दिया गया है जो अभी भी सेवा में है और ख़ुद को क़ानून की डिग्री रखने वाला बताता है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि इस पुलिस अधिकारी के बारे में की गई जाँच और जिस तरह की नौकरी में वह है, उससे यह पता चलता है कि उसके पास इतना समय नहीं है कि वह नियमित छात्र की तरह क़ानून की पढ़ाई के लिए क्लास में उपस्थित होकर पढ़ाई कर सके जबकि क़ानून की डिग्री प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक शर्त है।

याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में BCI से यह माँग भी की है कि वह उन कॉलेजों और विश्वविद्यालयों का लाइसेन्स रद्द करे जो ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से ऐसे छात्रों को क़ानून की डिग्रियाँ बेच रहे हैं जो नियमित क्लास में मौजूद नहीं रहते हैं।