'महिला पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति एक प्रमुख आवश्यकता'-सुप्रीम कोर्ट ने बिहार पुलिस चयन के लिए शारीरिक परीक्षण में गर्भवती महिलाओं को राहत दी

सुप्रीम कोर्ट ने उन सभी महिलाओं को राहत दे दी है, जो पिछले साल बिहार पुलिस चयन प्रक्रिया के लिए अपनी गर्भावस्था के कारण शारीरिक परीक्षण में उपस्थित नहीं हो सकी थीं। सुप्रीम कोर्ट ने बिहार पुलिस अधीनस्थ सेवा आयोग को निर्देश दिया है कि वे इस वर्ष अधिसूचित रिक्तियों के खिलाफ इन सभी महिलाओं का शारीरिक परीक्षण करें और उन्हें समायोजित करें।

जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस कृष्ण मुरारी की पीठ ने कहा कि- "महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध को देखते हुए पुलिस बल में महिला सदस्यों की उपस्थिति, समय की प्रमुख आवश्यकता है। इस प्रकार हमें लगता है कि यह सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए कि पुलिस सेवाओं में महिलाओं का उच्च प्रतिनिधित्व बना रहे।''

यह आदेश एक खुशबु शर्मा द्वारा दायर अपील में पारित किया गया था, जिसने पटना हाईकोर्ट की एक दो सदस्यीय खंडपीठ के फैसले को इस अपील में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश के आदेश को पलट दिया था, जिसमें खुशबू शर्मा को राहत मिली थी। एकल न्यायाधीश ने प्रतिवादियों को निर्देश दिया था कि दो महीने के बाद अपीलकर्ता की शारीरिक परीक्षा के लिए कोई भी तारीख तय करें।

क्या था मामला

अपीलकर्ता ने प्रतिवादी बिहार पुलिस अधीनस्थ सेवा आयोग को प्रतिनिधित्व दिया था, वह बिहार पुलिस में चयन के लिए शारीरिक परीक्षा की तारीख को स्थगित करने की मांग कर रही थी, क्योंकि वह गर्भवती थी और उसी महीने उसकी डिलीवरी होने वाली थी,जिस महीने में परीक्षा आयोजित होने वाली थी।

विकल्प के तौर पर, उसने चयन की अगली प्रक्रिया में भर्ती करने की मांग की थी,जिसके लिए उसकी शारीरिक धीरज परीक्षण हो और प्रारंभिक या मुख्य परीक्षा दोबारा न ली जाए। हालांकि, प्रतिवादी ने उसके प्रतिधित्व का जवाब नहीं दिया और उसे कानूनी सहारा लेने के लिए मजबूर किया गया।

अपीलार्थी की दलीलें

अपीलकर्ता शर्मा की तरफ से एडवोकेट शिवम सिंह और जयदीप खन्ना पेश हुए। उन्होंने दलील दी कि परीक्षा की तारीख के संबंध में प्रतिवादियों की तरफ से ''अस्पष्टता'' रही और प्रस्तुत किया कि बिहार पुलिस मैनुअल, 1978 व रिक्तियों के लिए जारी विज्ञापन में प्रतिवादियों द्वारा परीक्षा के विभिन्न चरणों के लिए अनुसूची का उल्लेख नहीं किया गया था।

इस प्रकार, अपीलकर्ता से 'अपने प्रजनन अधिकारों के प्रयोग को त्यागने' की उम्मीद करना बहुत अन्यायपूर्ण था,जबकि परीक्षाओं के विभिन्न चरणों के संबंध में कोई निश्चित समय-सीमा निर्धारित नहीं की गई थी।

उन्होंने कहा कि प्रतिवादियों के ऐसे कार्य, संविधान के अनुच्छेद 42 के तहत महिलाओं को अपने प्रजनन अधिकारों का उपयोग करने के लिए एक वातावरण उपलब्ध कराने के ,उनके कर्तव्य के विपरीत थे। इतना ही नहीं प्रतिवादियों के इन कार्य ने महिलाओं की ''सार्वजनिक रोजगार के लिए प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता'' को भी हल्का कर दिया है और दावा किया कि 'सुचिता श्रीवास्तव बनाम चंडीगढ़ प्रशासन, (2009) 9 एससीसी 1' में दिए गए फैसले के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता अधिकार से भी वंचित किया है।

'मधु व अन्य बनाम नॉर्दर्न रेलवे एंड अदर्स,2018 ऑनलाइन डीईएल 6660'मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए अपीलकर्ता ने कहा कि प्रतिवादी के कृत्य ''अप्रत्यक्ष भेदभाव जैसे हैं, जिसमें एक तटस्थ कार्य व्यक्तियों के एक विशिष्ट समूह पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है''और इस तरह संविधान के अनुच्छेद 14, 15 व 16 का उल्लंघन किया है।

प्रतिवादी की दलीलें

प्रतिवादी ने इस मामले में 14 अगस्त को उपस्थिति दर्ज कराई और प्रस्तुत किया कि प्रारंभिक परीक्षा आयोजित होने से पहले अपीलकर्ता गर्भवती थी और इसलिए वह अच्छी तरह से जानती थी कि वह शारीरिक परीक्षा में शामिल नहीं हो पाएगी। इसके अलावा ऐसा कोई नियम नहीं है कि चिकित्सीय स्थिति होने के मामले में किसी भी प्रकार की छूट दी जाएगी, इसलिए प्रतिवादी ने उसके अनुरोध को समायोजित नहीं किया है।

आगे प्रस्तुत किया गया कि अपीलकर्ता ने जिन रिक्तियों के लिए आवेदन किया था उनके लिए चयन प्रक्रिया पहले ही पूरी हो चुकी थी और अनुशंसित उम्मीदवारों को पहले ही नियुक्त किया जा चुका था। यह स्पष्ट किया गया था कि सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारों के लिए सीटें भर दी गई थीं और इस प्रकार अपीलकर्ता, जो उक्त श्रेणी से संबंधित है, को समायोजित नहीं किया जा सका।

प्रतिवादी ने कहा कि उनको इसी तरह के 73 अन्य अनुरोध प्राप्त हुए थे और चिकित्सा आधारों पर ऐसे अनुरोधों को समायोजित करने से पूरी चयन प्रक्रिया में खलल पड़ेगा। इस प्रकार, अपीलार्थी को नए सिरे से आवेदन करना चाहिए और पूरी चयन प्रक्रिया से गुजरना चाहिए क्योंकि इस समय अपीलकर्ता को दी गई कोई भी राहत मुकदमों की बाढ़ ला देगी।

हाईकोर्ट का आदेश

अपने आदेश में, हाईकोर्ट की दो सदस्यीय खंडपीठ ने अपीलार्थी के तर्कों को ठुकरा दिया दिया था और माना था कि,''पूर्व-रोजगार के स्तर पर एक महिला द्वारा परिवारिक जीवन व अपने बच्चे का चयन करने का अधिकार ,किसी नियोक्ता को इस बात के लिए मजबूर नहीं कर सकता है कि वह उम्मीदवारों की सुविधा के आधार पर चयन प्रक्रिया के नियमों और शर्तों में बदलाव कर दें।''

सुप्रीम कोर्ट का आदेश

हाईकोर्ट के निष्कर्षों से असहमत, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति कृष्णा मुरारी की पीठ ने कहा, ''कुछ पूर्व-निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार भर्तियाँ हुई थीं,उन मामलों में इस अदालत के हस्तक्षेप का आग्रह नहीं किया गया था क्योंकि उम्मीदवारों को यह पता होता था कि कब भर्ती होगी और उसी के अनुसार उन्हें अपने जीवन की योजना बनानी होगी।''

पीठ ने कहा कि,''पुलिस बल में महिला सदस्यों की उपस्थिति, महिलाओं के खिलाफ अपराध को देखते हुए समय की प्रमुख आवश्यकता है। इस प्रकार हमें लगता है कि यह सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए कि पुलिस सेवाओं में महिलाओं का उच्च प्रतिनिधित्व बना रहें।''

प्रतिवादी की उपस्थिति या अपील दायर करने के लगभग एक महीने के अंदर 27 सितंबर को मामले का निस्तारण करते हुए, पीठ ने निर्देश दिया कि जिन अभ्यर्थियों ने सिर्फ गर्भावस्था के कारण स्थगन की मांग की थी, उन्हें शारीरिक परीक्षण के लिए बुलाया जाना चाहिए। पीठ ने स्पष्ट किया कि चूंकि पिछले साल विज्ञापित सीटों को भर दिया गया था, इसलिए योग्य उम्मीदवारों को उन रिक्तियों के खिलाफ समायोजित किया जाएगा जिन्हें इस वर्ष विज्ञापित किया गया था और ऐसे सभी उम्मीदवार वर्तमान सूची मेें सबसे नीचे मेरिट मेरिट लेंगे या मेरिट सूची में निचले स्तर पर रखा जाएगा।

पीठ ने कहा कि,''इस तरह की प्रक्रिया को दो महीने की अवधि के भीतर पूरा किया जाना चाहिए ... हम इस बात से सचेत हैं कि यह संभवतः बाद की परीक्षा के लिए उपलब्ध सीटों की संख्या को कम कर देगा, लेकिन यह पूर्वोक्त निर्देश का प्राकृतिक परिणाम है।''

हालांकि, यह स्पष्ट किया गया है कि परीक्षाएं अब समय-समय पर आयोजित की जा रही हैं और पूर्वोक्त राहत केवल ''एक समय का उपाय'' है।