मुख्य न्यायाधीश को मिलने वाले पेंशन लाभ के हकदार कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश नहीं, सुप्रीम कोर्ट का फैसला

मुख्य न्यायाधीश को मिलने वाले पेंशन लाभ के हकदार कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश नहीं,  सुप्रीम कोर्ट का फैसला

“केवल वेतन जैसे सीमित उद्देश्य के लिए ही कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश को मुख्य न्यायाधीश के समतुल्य समझा जाता है, किसी अन्य उद्देश्य, खासकर पेंशन के लिए नहीं।”

उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश के समान पेंशन की अंतिम सीमा सहित अन्य पेंशन लाभ के हकदार नहीं हैं।

न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा, न्यायमूर्ति एम आर शाह और न्यायमूर्ति बी आर गवई ने हाईकोर्ट के पूर्व जज न्यायमूर्ति के. श्रीधर राव की रिट याचिका खारिज करते हुए कहा कि हालांकि, एक कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के रूप में प्रदान की जाने वाली सेवा को मुख्य न्यायाधीश के रूप में दी जाने वाली सेवा मानी जानी चाहिए और उस निश्चित अवधि के लिए उसकी पेंशन की गणना मुख्य न्यायाधीश के समान की जानी चाहिए।

जस्टिस राव चीफ जस्टिस के समान अधिकतम पेंशन के हकदार नहीं

न्यायमूर्ति राव ने 14 माह गुवाहाटी हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के रूप में सेवा दी थी और 20 अक्टूबर 2015 को इसी पद से सेवानिवृत्त हो गये थे। उनकी सेवानिवृत्ति के बाद, विधि एवं न्याय विभाग ने सूचित किया था कि न्यायमूर्ति राव मुख्य न्यायाधीश को मिलने वाले 5,40,000 रुपये की अधिकतम पेंशन के हकदार नहीं हैं। इसके बाद, उन्होंने शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था और कहा था कि वह मुख्य न्यायाधीश को मिलने वाले पेंशन लाभ के हकदार हैं।

प्रासंगिक सांविधिक प्रावधानों का उल्लेख करते हुए पीठ ने कहा कि केवल वेतन की गणना जैसे सीमित उद्देश्य के लिए ही कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश को मुख्य न्यायाधीश के समान माना जाता है।

पीठ ने कहा,

"कोई भी जज जब तक संविधान के अनुच्छेद 223 के तहत कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के तौर पर अपने कर्तव्यों का निर्वहन करता है, तब तक वह मुख्य न्यायाधीश को मिलने वाले वेतन एवं अन्य लाभ का हकदार रहेगा। इसका अर्थ है, उपरोक्त प्रावधान कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के तौर पर सेवा के दौरान उन्हें मुख्य न्यायाधीश की तरह मिलने वाले केवल वेतन से संबंधित हैं। 1954 एक्ट के प्रावधानों के तहत भी कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश को केवल वेतन की गणना के मामले में ही मुख्य न्यायाधीश के बराबर माना गया है।"

कार्यवाहक चीफ जस्टिस और चीफ जस्टिस में अंतर

पीठ ने आगे कहा कि संविधान के अनुच्छेद 223 के तहत नियुक्त कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश और अनुच्छेद 217 के तहत नियुक्त मुख्य न्यायाधीश में स्पष्ट अंतर है।

पीठ के अनुसार, "हाईकोर्ट के एक जज को मुख्य न्यायाधीश का कामकाज संभालने के लिए संविधान के अनुच्छेद 223 के तहत कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया जाता है, लेकिन इस दौरान मुख्य न्यायाधीश का पद रिक्त रहता है। यदि हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस का पद रिक्त है तो उनके कार्यालय का काम कोई भी जज कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के तौर पर निपटायेगा। इसलिए केवल वेतन के मामले में ही कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश को मुख्य न्यायाधीश के समान माना जायेगा, किसी अन्य उद्देश्य, खासकर पेंशन के लिए नहीं।"

जस्टिस राव की याचिका खारिज करते हुए पीठ ने व्यवस्था दी कि कार्यवाहक चीफ जस्टिस के रूप में उनके 14 माह के कार्यकाल को ही पेंशन की गणना के लिए मुख्य न्यायाधीश के समान माना जायेगा।