सोहराबुद्दीन केस : बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोहराबुद्दीन के भाइयों द्वारा 22 आरोपियों को बरी करने के खिलाफ अपील को मंजूर किया

सोहराबुद्दीन केस : बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोहराबुद्दीन के भाइयों द्वारा 22 आरोपियों को बरी करने के खिलाफ अपील को मंजूर किया

बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोहराबुद्दीन शेख के भाइयों द्वारा दाखिल की गई उस अपील को मंजूर कर लिया है जिसमें कथित फर्जी मुठभेड़ मामले के सभी 22 आरोपियों को बरी करने के फैसले को चुनौती दी गई है।

आरोपियों को जारी हुआ नोटिस
आरोपियों में गुजरात और राजस्थान के पुलिस अधिकारी शामिल हैं जिन्हें 21 दिसंबर, 2018 के एक फैसले में सीबीआई की विशेष अदालत ने बरी कर दिया था। जस्टिस आई. ए. महंती और जस्टिस ए. एम. बदर की पीठ ने सोमवार को अपील स्वीकार की और आरोपियों को नोटिस जारी किया।

ट्रायल फिर से कराने का हुआ था अनुरोध
रुबाबुद्दीन शेख और नायबुद्दीन शेख ने उक्त फैसले को रद्द करने या वैकल्पिक दिशा-निर्देशों के तहत फिर से ट्रायल की मांग की है। इससे पहले रुबाबुद्दीन ने गृह मंत्रालय, सीबीआई निदेशक और कैबिनेट सचिव को पत्र लिखकर विशेष सीबीआई जज एस. जे. शर्मा के फैसले के खिलाफ अपील दायर करने का अनुरोध किया था।

दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 2 (डब्लूए) का जिक्र
अपील में यह कहा गया है कि अपीलकर्ता दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 2 (डब्लूए) के संदर्भ में एक पीड़ित है क्योंकि वह वो व्यक्ति है जिसने अपने भाई और भाभी काे खोया है और इसलिए वो अपील दायर करने का हकदार है।

"आरोपियों को बरी करने का फैसला विरोधाभासी"
"विशेष न्यायाधीश ने अनुचित धारणाओं और स्पष्ट रूप से गलत सबूतों की सराहना करते हुए अपने फैसले को आधार बनाया है। उनके कार्यों से न्याय का दुर्वहन हुआ है और इसलिए न्याय के सिरों को सुरक्षित रखने के लिए इस माननीय न्यायालय का हस्तक्षेप उचित है," अपील में यह कहा गया है।इसके अलावा अपील में यह भी कहा गया है कि बरी करने का फैसला पूरी तरह से विरोधाभासी था।

निर्णायक सबूतों की कमी के आधार पर फैसला
358 पन्नों के फैसले में न्यायाधीश शर्मा ने मृतक के परिवार के प्रति अपनी सहानुभूति व्यक्त की लेकिन उन्होंने इस मामले में निर्णायक सबूतों की कमी की ओर भी इशारा किया है।

"इसमें कोई संदेह की बात नहीं है कि सोहराबुद्दीन और तुलसीराम की हत्या की रिपोर्ट है लेकिन इसमें कोई सजा नहीं हो रही। साथ ही सोहराबुद्दीन की पत्नी कौसर बी गायब हो गई और सीबीआई की जांच की कहानी कि उसे हत्या कर जला दिया, के लिए साक्ष्य भी नहीं हैं। हालांकि रिकॉर्ड के लिए अभियुक्तों को नैतिक या संदेह के आधार पर दोषी ठहराते हुए दंडित नहीं किया जा सकता। इसलिए मेरे पास यह निष्कर्ष निकालने के लिए कोई विकल्प नहीं है कि अभियुक्त दोषी नहीं हैं और उन्हें बरी किया जाना चाहिए," जज शर्मा ने मामले में निर्णय सुनाते हुए नोट किया।

अपीलकर्ता द्वारा इस मामले में उठाए गए सवाल
इस मामले में कुल 210 गवाहों की जांच की गई, जिनमें से 92 मुकर गए थे। फैसले के संबंध में अपील में उठाए गए कई अन्य सवालों के बीच अपीलकर्ता ने इस तथ्य पर सवाल उठाया कि अभियोजन पक्ष द्वारा उन मजिस्ट्रेट को बुलाने के लिए कोई प्रयास नहीं किया गया जिनके सामने 'मुकरे गवाह' ने पूर्व में बयान दिए थे।

अपील में यह कहा गया है कि यह पूरा ट्रायल न्याय को हराने के लिए आयोजित किया गया। अपील में यह तर्क दिया गया है कि जिस तरह से ट्रायल किया गया, उसे दोबारा करने के लिए मामला बनता है। इस प्रकार अपील में सीबीआई कोर्ट द्वारा सुनाए गए फैसले को रद्द करने या सत्र न्यायालय को सीआरपीसी, 1973 की धारा 386 (ए) के तहत पुन: ट्रायल करने के लिए निर्देश देने का अनुरोध किया गया है। यह मामला प्रक्रिया के तहत सुनवाई के लिए आएगा।