अलग रह रहे विवाहित जोडे़ के वैवाहिक अधिकारों की बहाली करने की अदालती शक्ति को चुनौती : सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को नोटिस जारी किया

अलग रह रहे विवाहित जोडे़ के वैवाहिक अधिकारों की बहाली करने की अदालती शक्ति को चुनौती : सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को नोटिस जारी किया

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अलग रह रहे किसी विवाहित जोड़े के संवैधानिक अधिकारों की बहाली का निर्देश देने के लिए हिंदू विवाह अधिनियम द्वारा अदालतों को दी गई शक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर उनकी ओर से जवाब मांगा है।

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस संजीव खन्ना की पीठ ने गुजरात नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, गांधीनगर के छात्रों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े की दलीलें सुनने के बाद यह नोटिस जारी किया।

अब ये पीठ तय करेगी कि पत्नी या पति के 'वैवाहिक अधिकारों' की बहाली से संबंधित हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 संवैधानिक तौर पर वैध है या नहीं।

5 मार्च को चीफ जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस संजीव खन्ना की पीठ ने 3 जजों की पीठ को इस मामले को रिफर किया था। ये कदम उस याचिका के संबंध में उठाया था जिसके तहत सक्षम न्यायालय डिक्री द्वारा पति या पत्नी को एक साथ रहने या सहवास करने के निर्देश जारी कर सकता है।

याचिकाकर्ताओं ओजस्वा पाठक और मयंक गुप्ता के अनुसार ये प्रावधान संवैधानिक अधिकारों की बहाली के लिए वैधानिक योजना प्रदान करते हैं। भारत में कानूनी योजना के तहत एक पति या पत्नी अपने जीवनसाथी को सहवास करने और संभोग में भाग लेने का निर्देश देने वाली डिक्री का हकदार है। यदि पति या पत्नी पुनर्स्थापना के आदेश की अवज्ञा करेंगे तो पति/पत्नी द्वारा संपत्ति की कुर्की के रूप में जबरदस्त उपायों के लिए भी वह हकदार हैं।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि संवैधानिक अधिकारों की बहाली के लिए प्रदान किया जाने वाला "विधायी पैकेज" असंवैधानिक है क्योंकि यह महिलाओं पर असम्बद्ध बोझ डालता है और इसलिए यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 (1) का उल्लंघन है। ये कानूनी ढांचा सामंती अंग्रेजी कानून पर आधारित है, जो एक महिला को अपने पति की 'सपंत्ति' मानता है। यह पितृसत्तात्मक लिंग रूढ़िवादिता में डूबा हुआ है और संविधान के अनुच्छेद 15 (1) का उल्लंघन है।

'निजता के अधिकार 'के फैसले का हवाला देते हुए उन्होंने कहा है कि ये कानूनी ढांचा निजता के अधिकार, व्यक्तिगत स्वायत्तता और व्यक्तियों (दोनों पुरुषों और महिलाओं) की गरिमा, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटी हैं, का उल्लंघन है। संवैधानिक अधिकारों की बहाली के उपाय को भारत की किसी भी निजी कानून व्यवस्था ने मान्यता नहीं दी है। सामंती अंग्रेजी कानून में इसकी उत्पत्ति हुई है, जो उस समय एक पत्नी को पति की संपत्ति मानता था।

याचिका में कहा गया है कि यूनाइटेड किंगडम ने स्वयं वर्ष 1970 में वैवाहिक अधिकारों की बहाली के उपाय को समाप्त कर दिया है। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि अब समाज बदल रहा है जहां सामाजिक स्वायत्तता, गरिमा और किसी व्यक्ति की खुशी में निजी हितों को सामाजिक नैतिकता या पारिवारिक जीवन जैसी चिंताओं से पहले रखा जाता है।

इस प्रकार राज्य के लिए वैवाहिक अधिकारों से संबंधित मामलों में हस्तक्षेप करने के लिए कोई हित मौजूद नहीं है। उनके अनुसार पुनर्स्थापना की डिक्री के परिणाम, महिला के लिए अत्यधिक कठिनाई का कारण बनते हैं - जिसे अपने वैवाहिक घरों और जिम्मेदारियों पर वापस जाना पड़ता है। इस तरह से इसे असंवैधानिक घोषित कर रद्द किया जा सकता है।