जॉनसन एंड जॉनसन हिप ट्रांसप्लांट : केंद्र के जवाब के बाद सुप्रीम कोर्ट ने बंद की सुनवाई

जॉनसन एंड जॉनसन हिप ट्रांसप्लांट : केंद्र के जवाब के बाद सुप्रीम कोर्ट ने बंद की सुनवाई

जॉनसन एंड जॉनसन के गड़बड़ी वाले हिप इंप्लाट के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के जवाब के बाद इससे जुड़ी जनहित याचिका पर सुनवाई को बंद कर दिया है।

शुक्रवार को चीफ जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस संजय किशन कौल की पीठ ने कहा कि केंद्र सरकार ने बताया है कि उनके द्वारा पीड़ितों को तीन लाख से 1.22 करोड़ रुपये का मुआवजा देने का आदेश जारी किया है। केंद्र के इस जवाब के बाद पीठ को लगता है कि इस जनहित याचिका को जारी रखने की अब कोई जरूरत नहीं है।

पीठ ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि मुआवजे के बारे में ज्यादा से ज्यादा प्रचार किया जाए।

वहीं जॉनसन एंड जॉनसन की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने इस मुआवजे के फैसले को चुनौती दी है और फिलहाल उनकी अपील अर्जी दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित है और उस पर सुनवाई नहीं हो पा रही है।

इससे पहले 5 अक्तूबर 2018 को चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस के. एम. जोसेफ की पीठ ने नोटिस जारी कर केंद्र सरकार को दो महीने में एक्सपर्ट कमेटी की रिपोर्ट भी कोर्ट में दाखिल करने के निर्देश दिए थे। पीठ ने आदेश जारी किया कि याचिका की एक प्रति, सेंट्रल एजेंसी में दी जाए और फिर ASG पीठ को यह बताएं कि क्या एक्सपर्ट कमेटी की कोई रिपोर्ट है। अगर ऐसी रिपोर्ट है तो वो भी कोर्ट के सामने रखी जाए।

दरअसल अरूण कुमार गोयनका ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका में जॉनसन एंड जॉनसन के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी। प्रभावित याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वकील विवेक नारायण शर्मा ने दावा किया कि इंप्लांट में गडबडी के चलते 15800 लोग प्रभावित हुए हैं। याचिका में कहा गया था कि हिप इम्प्लांट से प्रभावित मरीजों का पता लगाया जाना चाहिए।

याचिका के मुताबिक ये बिक्री और प्रत्यारोपण जॉनसन और जॉनसन द्वारा किया गया है।

याचिकाकर्ता ने कहा कि सरकार द्वारा नियुक्त पैनल ने सिफारिश की है कि उस प्रत्येक रोगी को, जिन्हें भी संशोधित सर्जरी से गुजरना पड़ा, 20 लाख रुपये दिए जाएं लेकिन अभी तक ऐसी कोई कार्रवाई नहीं की गई है। केंद्र ने पिछले साल इस मामले की जांच के लिए डॉ. अग्रवाल की कमेटी का गठन भी किया है।

याचिका में ये भी कहा गया कि ये भी पता लगाया जाए कि जॉनसन एंड जॉनसन को बिना परीक्षण, हिप इंप्लांट करने की किसने इजाजत दी। साथ ही मामले की जांच के लिए वरिष्ठ डॉक्टरों व पुलिस अफसरों की SIT बनाई जाए जो प्रभावित लोगों की जांच करे क्योंकि उनका जीवन खतरे में है। याचिका में कहा गया कि गैरकानूनी रूप से हिप इंप्लांट वर्ष 2005 से चल रहा है और ये संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उनके जीने के अधिकार के खिलाफ है। इसके अलावा ये आपराधिक लापरवाही के समान है।