हाई पावर कमेटी ने बहाली के कुछ घंटो में ही आलोक वर्मा को सीबीआई निदेशक के पद से हटाया

हाई पावर कमेटी ने बहाली के कुछ घंटो में ही आलोक वर्मा को सीबीआई निदेशक के पद से हटाया

सुप्रीम कोर्ट के बहाल करने के कुछ ही घंटे बाद आलोक वर्मा को सीबीआई के निदेशक पद से हटा दिया गया है। प्रधान मंत्री, सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस ए के सीकरी और विपक्ष में सबसे बड़ी पार्टी के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे की उच्चाधिकार प्राप्त समिति ने गुरुवार को हुई मीटिंग में ये फैसला लिया। हालांकि खड़गे की राय इस मामले में अलग रही। इससे पहले आलोक वर्मा पर फैसले के लिए प्रधानमंत्री और नेता विपक्ष की हाई पावर कमेटी की बैठक में चीफ जस्टिस ने सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठता में दूसरे क्रम के जज जस्टिस ए के सीकरी को नामांकित किया था।

समझा जाता है कि चीफ जस्टिस ने इसलिए ये फैसला किया है क्योंकि उन्होंने आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजे जाने का फैसला सुनाया था।

दरअसल 8 जनवरी को एक अहम आदेश में 23-24 अक्टूबर की रात को सीबीआई निदेशक के रूप में आलोक वर्मा के "रातोंरात" छुट्टी पर भेजे जाने के केंद्र सरकार और सीवीसी के आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर उन्हें पद पर फिर से बहाल कर दिया। हालांकि पीठ ने कहा था कि हाईपावर कमेटी के फैसले तक वर्मा कोई भी बड़ा नीतिगत व संस्थानिक फैसला या नया कदम नहीं उठाएंगे।

फैसला सुनाते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अगुवाई वाली तीन जजों की पीठ ने कहा कि क़ानून न तो सरकार और न ही केंद्रीय सतर्कता आयोग को अधिकार देता है कि वो सीबीआई प्रमुख के कार्यकाल में बाधा पहुंचाएं।

ये फैसला मुख्य न्यायाधीश गोगोई द्वारा लिखा गया जो मंगलवार को छुट्टी पर थे। जस्टिस एस के कौल और जस्टिस के एम जोसेफ ने खुली अदालत में फैसला सुनाया। न्यायमूर्ति कौल ने फैसले के अंश पढ़े।

फैसले ने वर्मा के इस तर्क को सही ठहराया कि उन्हें प्रधान मंत्री, भारत के मुख्य न्यायाधीश और विपक्ष के नेता की उच्चाधिकार प्राप्त समिति की पूर्वानुमति के बिना सीबीआई के निदेशक पद से सीमित नहीं किया जा सकता जिसे डीएसपीई अधिनियम के तहत सीबीआई निदेशक की नियुक्ति की सिफारिश करने का वैधानिक अधिकार है। क़ानून ने न तो सीवीसी को और न ही सरकार को उनके कार्यों और कर्तव्यों से विमुख करने की शक्ति देता है।

कोर्ट ने कहा कि वर्मा पर फैसला करने के लिए उच्चाधिकार प्राप्त समिति को एक सप्ताह के भीतर बैठक करनी है। वर्मा इस महीने के अंत तक सेवानिवृत्त हो रहे हैं।

अदालत ने कहा कि डीएसपीई अधिनियम में संशोधन करने और सीबीआई निदेशक की नियुक्ति की सिफारिश करने के लिए पीएम पैनल को सशक्त बनाने के पीछे विधायी मंशा राज्य और राजनीतिक दबाव से सीबीआई के कामकाज को प्रेरित करना है।

इस बीच कोर्ट ने सीबीआई निदेशक के 'स्थानांतरण' की व्याख्या को भी विस्तारित कर दिया, जिसका अर्थ है उनकी शक्तियों को सीमित करना। अधिनियम की धारा 4 में उनके वैधानिक दो साल के कार्यकाल समाप्त होने से पहले सीबीआई से स्थानांतरित करने से पूर्व

पीएम पैनल की पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता है। उनके कार्यकाल में कोई भी बदलाव - चाहे सीबीआई निदेशक का स्थानांतरण या अधिकार सीमित करने का कदम पीएम पैनल की पूर्व स्वीकृति के साथ ही लिया जाएगा।

दरअसल पीठ ने वर्मा की याचिका और एनजीओ कॉमन कॉज द्वारा दायर एक अन्य याचिका पर 6 दिसंबर, 2018 को फैसला सुरक्षित रखा था।