नए युग में कोर्ट की रिपोर्टिंग : बार और बेंच दोनों हैं कसौटी पर

नए युग में कोर्ट की रिपोर्टिंग : बार और बेंच दोनों हैं कसौटी पर

संजोय घोष

हाल में कॉस्मेटिक क्लीनिक की निगरानी के लिए एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के एक जज ने हल्के-फुल्के अन्दाज़ में इस तरह के क्लीनिक की बहुत सारे लोगों के जीवन में केंद्रीय भूमिका के बारे में अपनी टिप्पणी को वापस लेते हुए कहा, "हम जो भी कहते हैं प्रेस में उसकी रिपोर्टिंग हो जाती है!" सुप्रीम कोर्ट ने भी यह संकेत दिया है कि वह अयोध्या मामले की रिकॉर्डिंग/ब्रॉड्कैस्टिंग की अनुमति देने के आग्रह पर विचार करेगा। 24x7 घंटे न्यूज़ और जरुरत से ज्यादा सक्रीय सोशल मीडिया के इस दौर में क्या कोर्ट की कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग एक सकारात्मक कदम होगा। कोर्ट इस बात पर विचार कर रही है।

ऐतिहासिक रूप से, अदालत का इस बात को नियंत्रित करता रहा है कि दुनिया के समक्ष उसकी कौनसी बात को पेश किया जायेगा और कौनसी बात को नहीं। अदालत के अपने आधिकारिक रिपोर्टर हैं (एक ऐसा जर्नल जो मामलों के फ़ैसलों का प्रकाशन करता है),जो जज फ़ैसला देता है उसको स्वयं यह अधिकार होता है कि उसके फ़ैसले की रिपोर्टिंग होनी चाहिए कि नहीं, यह निर्धारित करें।

भारतीय क़ानून रिपोर्ट्स अधिनियम, 1875 के तहत सरकारी भारतीय क़ानून रिपोर्ट्स दिए गए फैसलों के प्रकाशन में पिछड़ता चला गया। पर निजी जर्नल इसके प्रकाशन में सामने आए और सफल रहे। अदालती प्रकाशन, जिसकी सम्पादकीय नीति पर जजों का कड़ा नियंत्रण होता था कि क्या प्रकाशित होगा और क्या नहीं, से अलग, निजी प्रकाशकों ने इस बंधन को तोड़ दिया। इन फ़ैसलों के प्रकाशन से अच्छी आमदनी होने लगी। बाद में इन रिपोर्टेरों ने एक पृष्ठ के ऐसे आर्डर भी प्रकाशित किए जो नुकसादायक नहीं थे और वक़ील अपने दलीलों में इसे मिसाल के रूप में भी पेश करने लगे।

नई तकनीक से हम अभी भी कोसों दूर थे। मैं उस समय की बात कर रहा हूँ जब मेरे सीनियर ने मुझे एक सेलफोन दिया था जो लगभग एक 'वाकी- टॉकी' जैसा दिखता था और उतना ही वजनी था। फ़ोन करने का रेट 16 रूपए प्रति मिनट था।

पहले मोबाइल आया और फिर आये फेसबुक और ट्विटर। अगर कोई आज की हाथों-हाथ ट् वीट करने वाली रिपोर्टिंग को केशवानंद भारती या ए. डी. एम जबलपुर की कोर्ट रिपोर्टिंग से तुलना करे तो वह डी. डी. कृषि दर्शन जैसा मालूम होगा। स्मार्ट फ़ोन लिए हम सब जर्नलिस्ट और कमेंटेटर बन गए है। कई तरह के एनिमेशन से अपनी बात कही जा रही है।

"जानने की हमारी भावना" या जानने की हमारी उद्गम इच्छा जिसे हम "दर्शनरति" ( voyeuristic desire to know) भी कह सकते हैं या फिर इसे "जानने का अधिकार" कहें, यह हमारी इन सभी इच्छाओं की पूर्ति करता है। ट्वीट करके जानकारी देने वालों के प्रति मुझे कोई शिकायत नहीं है। हाल में निजता के अधिकार और अनुच्छेद 377 पर अदालत के फ़ैसले के समय से ही क़ानून के हज़ारों छात्र, वक़ील, जज और आम लोग ट्वीट और ब्लॉग पर लगातार नज़र रखे हुए थे , नको क़ानून के प्रतिभाशाली और युवा जानकार और पत्रकार अपलोड किया करते थे। मैं ख़ुद को कैप्टन स्पॉक की शैली में अदालत कक्ष में होने की कल्पना कर सकता था और वास्तविक समय में "ट्वीट- रिपोर्टिंग" के माध्यम से सैंवैधानिक इतिहास के निर्माण में एक किरदार के रूप में महसूस कर सकता था।

हम "आइवरी टावर" वाले उस पुराने युग को भी नहीं भूल सकते जिसके लिए हमारे जजों ने काफ़ी कुछ बलिदान दिया यह सोचकर कि 'न्याय होते हुए दिखना चाहिए'। "न्यायिक उदासीनता" से यह उम्मीद की जाती है कि वह न्यायाधीशों में निष्पक्षता का भाव जगाएगी। न्यायाधीश सक्रिय रूप से समाज में घुलने मिलने और किसी भी तरह के संवाद से ख़ुद को अलग रखते है।

जजों से उम्मीद की जाती है कि सिर्फ़ उनका फ़ैसला बोलेगा। अब नए युग की अव्यवस्था पर ज़रा ग़ौर कीजिए जब आपको "वार एंड पीस" जैसे बयान सुनने को मिलते हैं जब पूरे दिन भर बॉम्बे हाईकोर्ट के एक जज पर सोशल मीडिया पर तब तक साहित्यिक प्रहार होते रहे जब तक कि कुछ वकीलों ने उसी जज के समक्ष इस मामले को मेंशन करते हुए जज को इस बारे में स्पष्टीकरण देने का मौक़ा दिया कि टोलस्टोय ख़ुद उनके पसंदीदा लेखक रहे हैं और वे इसी तरह के नाम वाले किसी अन्य पुस्तक की चर्चा कर रहे थे ।

एक ऐसे समय ऐसा कहना राजनीतिक रूप से ग़लत होगा जब यह कहा जाता है कि "सूर्य की रोशनी सबसे बड़ा संक्रमणरोधी है", जब सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम जो कि जजों के ट्रान्स्फ़र और उनकी नियुक्ति के विवरणों को अपलोड करता है जिसे बाद में डाउनलोड किया जाता है और जो फिर रिकॉर्ड समय में रिकॉर्ड संख्या वाले वकीलों के व्हाट्सएप समूहों में वितरित हो जाता है। यही फ़ैसला कोई 20 स्रोतों से भी आपके इन्बॉक्स में आ जाता है। अगर यह अच्छी बात है तो इसके बुरे पक्ष भी हैं।

कई बार जज सवाल इसलिए पूछते हैं ताकि मामलों से जुड़े अन्य पक्षों की भी तहक़ीक़ात हो सके। ज़रूरी नहीं है कि ये प्रश्न जजों की सोच को प्रदर्शित करे। इस बारे में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न अटर्नी जनरल डे से 1975 में बंदी प्रत्यक्षीकरण अदालत ने पूछा। अटर्नी की पत्नी विदेशी थीं और वह वीज़ा पर इस देश में रह रही थीं। अदालत ने पूछा, "अटर्नी, क्या आप यह कहना चाहते हैं कि अगर कोई पुलिस वाला अपनी मर्ज़ी से अंधाधूँध गोली चलाता है, तो हम शक्तिहीन हो जाएँगे"। "हाँ, जब आपातकाल लगा हो तो, माननीय जज कुछ भी नहीं कर सकते," अटर्नी ने कहा। जैसा कि बाद में दावा किया गया, अटर्नी को उम्मीद थी कि अदालत ग़ुस्से में इस पर कार्रवाई करेगा । पर हम सब जानते हैं कि इसके बाद क्या हुआ। कहने का मतलब यह कि जो पूछा गया था उसको अंतिम फ़ैसले में उसे जगह नहीं मिली।

अगर जजों पर लगातार नज़र रखी जा रही है और सुनवाई के दौरान उनके एक-एक शब्द की चीड़-फाड़ की जाती है तो कई लोग अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के जज क्लैरेन्स टॉमस की तरह पेश आना चाहेंगे। उनके बारे में कहा जाता है कि वे बेंच में सबसे कम बोलने वाले जजों में थे। अगर किसी जज को बेचैन करने वाला सवाल पूछने के कारण "क्रोधी" कहा जाए या उसका प्रश्न अगले दिन यह कहते हुए अख़बारों की सुर्ख़ियाँ बने कि यह न्याय की सोच है, तो इससे फ़ैसले के सुकराती तरीक़े (Socratic method) को बहुत बड़ा धक्का लगता है, क्योंकि इस तरीक़े को न्यायिक फ़ैसले करने में कई बार आज़माया जाता है।हाल ही में, अयोध्या मामले में, जस्टिस चंद्रचूड़ को, यह स्पष्ट करना पड़ा कि जज एक कानूनी मुद्दे के हर पहलू पर पूर्ण रूपेण विचार करने की दृष्टि से ही सवाल पूछते है।

निस्सन्देह, इस बात का वकीलों पर भी असर होता है। भारतीय संदर्भों में जब अदालत न तो परिवादों को पेश करने में की गयी गड़बड़ियों गंभीरता से दंडित नहीं करता है या समय को बहुत ही सख़्ती से लागू नहीं करता जब कि अमेरिका में कोई मामला चाहे कितना ही महत्वपूर्ण क्यों न हो, सुप्रीम कोर्ट किसी पक्ष को 30 मिनट से अधिक नहीं देता है। अगर भारत में इस तरह की अदालती कार्यवाहियों की रिकॉर्डिंग होती है या इसे फ़िल्म किया जाता है और इसको बहुत ही सूक्ष्मता से कवर किया जाता है, तो वकील जो आम तौर पर किसी बहस में कई इश्यू/ बिंदु/तर्क उठाते है पर अनौपचारिक तौर पर अपनी और से पेश किये गए कमजोर मुद्दों को स्वीकार भी कर लेते, अब हर बिंदु/ हर इश्यू को स्वीकार कर बहस करने के लिए बाध्य होंगे।

चैंड्लर बनाम फ़्लोरिडा 449 U.S. 560 (1981), मामले में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य आपराधिक मामलों के प्रसारण और उसके फ़ोटो लेने की अनुमति दे सकता है। वर्ष 1991 और 1994 के बीच कई अदालतों ने अदालत में कैमरों से प्रयोग करना शुरू किया। कई लोगों को जज ईटो की अदालत में ओजे सिंपसन का मुक़दमा याद होगा जिसमें ओजे ने लोगों को टीवी कैमरे में दिखाया कि हत्या में जिस ग्लव्ज़ का प्रयोग हुआ वह उसके हाथ में फ़िट नहीं होता। इस मामले से अदालत लोगों के ड्रॉइंग रूम तक पहुँच गई।

इसकी वजह से जो मजमा लगा उससे अदालती मामलों के सीधा प्रसारण की अनुमति पर पुनर्विचार के लिए लोगों को बाध्य होना पड़ा है कि कहीं अदालती कार्रवाई टीवी पर प्राइम टाइम शो नहीं बन सकता। अमेरिकी संघीय नियम में अदालती कार्रवाई का फ़ोटो लेने की मनाही है, 48 राज्यों ने कैमरे के प्रयोग की अनुमति दे रखी है; 36 राज्यों ने ट्रायल और अपील कोर्ट में इसकी अनुमति दे रखी है जबकि तीन राज्यों – माईने, ओरेगन और पेंसिलवेनिया सिर्फ़ ट्रायल के स्तर पर ही कैमरे के प्रयोग की अनुमति देता है। यूएसएससी की कार्यवाही के ऑडीओ उपलब्ध होते हैं।

यूके में क्राउन कोर्ट की कार्यवाही में फ़ोटोग्राफ़ी और इसका प्रसारण क्रिमिनल जस्टिस ऐक्ट की धारा 41 के तहत 1925 से ग़ैरक़ानूनी है। सुप्रीम कोर्ट ने 2009 से इसकी फ़िल्मिंग की अनुमति दे रखी है जबकि अपीली अदालत ने 2013 से इसकी नियमित अनुमति दे रखी है। ऑस्ट्रेलिया की हाईकोर्ट ने 2013 से कैन्बरा में होने वाले पूर्ण अदालती सुनवाई की ऑडीओ/विजुअल रिकॉर्डिंग की अनुमति दे रखी है। अदालती कार्यवाही को अदालत के वेबसाइट पर उचित परिवर्तन के साथ प्रकाशित किया जाता है। हालाँकि, कार्यवाहियों के सीधा प्रसारण की अनुमति नहीं है।

ब्राज़ील में सुप्रीम कोर्ट का अपना टीवी चैनल "टीवी जस्टिका" है जो अदालती मामलों को कवर करता है। सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाहियों का 2002 से सीधा प्रसारण हो रहा है। ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही का प्रसारण नहीं होता है।

जर्मनी में 2017 के एक क़ानून के तहत कोर्ट की कार्यवाहियों के ऑडीओ रिकॉर्डिंग के प्रसारण की अनुमति है। ऐसे मामलों के प्रसारण की अनुमति है जो "ऐतिहासिक महत्व" के हों। कनाडा की सुप्रीम कोर्ट 2009 से ऑडीओ/विजुअल रिकॉर्डिंग को अपने वेबसाइट पर प्रकाशित कर रहा है।

विशेष ओलम्पिक खिलाड़ी ऑस्कर पिस्टॉरीयस हत्या कांड (2014) की सुनवाई को दक्षिण अफ़्रीका में प्रसारित किया गया। टेलीविज़न पर इसे देखकर लोगों में भयंकर प्रतिक्रिया हुई और उनको लगा कि इसके माध्यम से उसको अदालत में मजमा लगाने की अनुमति दी गई है। 2017 की हेनरी वान ब्रेडा मामले के बाद पता चला कि दक्षिण अफ़्रीका के संविधान ने ही अदालतों में कैमरों की इजाज़त दी है ताकि खुली न्याय को समर्थन दिया जा सके और जनता को यह देखने का मौक़ा दिया जा सके कि अदालत में क्या हो रहा है।

भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने स्वप्निल त्रिपाठी मामले (2018) में "खुली न्याय" के प्रति प्रतिबद्धता जताई और इंटरनेट पर "सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही के सीधा प्रसारण के लिए पूर्ण मोड्यूल और तरीक़ा" विकसित करने की बात कही। उसने कहा कि अदालत एक तकनीकी समिति नियुक्त कर सकती है जो इस बात की जाँच करेगी कि सीधा प्रसारण तकनीकी रूप से संभव है कि नहीं।

तो फिर भारत के लिए क्या रास्ता बचा है? काश मैं आपको बता पाता। पर एक बात मैं ज़रूर जानता हूँ कि, सीधा प्रसारण हो सकता है कि अभी लागू नहीं हो और शायद यह कुछ हद तक एक अतिशय कदम भी हो, पर जजों और वकीलों को इस बात के प्रति सजग होना चाहिए कि हम सार्वजनिक समय में जी रहे हैं। हर मामले में बेंच और बार दोनों ही कसौटी पर होते हैं।

(लेखक सुप्रीम कोर्ट में वक़ील हैं और ये उनके निजी विचार हैं)