अनिश्चितता और डर के बीच न्याय का इंतज़ार करता जम्मू-कश्मीर

अनिश्चितता और डर के बीच न्याय का इंतज़ार करता जम्मू-कश्मीर

जो वक़ील ग़रीब हैं उनके लिए ज़िंदा बचे रहने का मामला सबसे बड़ा होता है। अधिकतर वक़ील जिसमें जूनियर भी शामिल हैं, छोटे-छोटे पेशेवर कार्य से होने वाली मामूली आय पर ज़िंदा रहते हैं। कर्फ़्यू ने उनके अस्तित्व को प्रभावित कर दिया है और उन्हें काम की तलाश में कहीं और जाने को बाध्य होना पड़ा है।

पीवी दिनेश

संविधान के अनुच्छेद 144 के अनुसार, "सभी अथॉरिटीज़ चाहे वो सिविल हो या न्यायिक, सुप्रीम कोर्ट की मदद के लिए कार्य करेंगे।" पर इस तरह की संवैधानिक ज़रूरतों के बावजूद जम्मू-कश्मीर में 5 अगस्त को जिस तरह केंद्रीय शासन का शिकंजा कसा गया उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में इसके बारे में होनेवाली कार्यवाही पर अगर कोई नज़र रख रहा है तो उसे संविधान का यह अनुच्छेद उलटा समझ में आएगा – क्या सुप्रीम कोर्ट ने प्रशासनिक अधिकारियों की मदद के लिए कुछ किया?

सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर में केंद्र सरकार की दख़ल के 43 दिन बाद एक सतर्कता भरा आदेश पास किया है जो स्वतंत्रता कि मांग की एक याचिका पर सुनाई गई। इस आदेश में कहा गया -

"…….राष्ट्रीय हित और आंतरिक सुरक्षा को देखते हुए जम्मू-कश्मीर राज्य कश्मीर में जन-जीवन को सामान्य बनाने के लिए हर संभव प्रयास करेगा; वह यह सुनिश्चित करेगा कि लोगों को स्वास्थ्य सेवाएं प्राप्त हों, स्कूल, कॉलेज और अन्य शैक्षिक संस्थाएं तथा सार्वजनिक परिवहन सामान्य रूप से काम करें। हर तरह की संचार व्यवस्था को राष्ट्रीय सुरक्षा को नज़रंदाज़ किए बिना सामान्य बनाया जाए और अगर ज़रूरी हुआ तो इसे चुनिंदा आधार पर किया जाए विशेषकर स्वास्थ्य सुविधाओं को"।

अपने नागरिकों को कश्मीर में अपने घर और अपने मां-बाप के घर आने-जाने जैसे विशिष्ट आदेश देने के बजाय ऊपर जिस आदेश की चर्चा की गई है उसे एक ऐसा आदेश कहा जा सकता है जिसमें नागरिकों को नज़रंदाज़ (order in rem) किया गया है। "राष्ट्रीय हित और आंतरिक सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए" और "राष्ट्रीय सुरक्षा की सर्वाधिक चिंता" जैसे शब्दों का इस आदेश में प्रयोग हमेशा ही प्रशासन को यह संकेत देना है कि वह कश्मीर के बारे में अपनी योजना के अनुसार काम करे।

परिणाम चाहे जो हो, पर तत्कालीन सरकार हमेशा ही अपने क़ानूनी क़दम को ऐसा मानती है जिस पर वह नाज़ कर सके। अभी तक उसे अदालत में कोई संवैधानिक बाधा का सामना नहीं करना पड़ा है हालांकि, अनुच्छेद 19 और 21 के मुद्दे उठाए जा रहे हैं।

एक और दिलचस्प बात यह हुई है कि अदालत ने जम्मू-कश्मीर में एक हाईकोर्ट होने की बात की याद दिलाई है। जब भी सीधे सुप्रीम कोर्ट में कोई याचिका दायर की जाती है तो जो पहला सवाल पूछा जाता है वह है "आप हाईकोर्ट क्यों नहीं गए?" पर इसे आप इत्तफ़ाक़ कह सकते हैं और वह भी निश्चित रूप से एक विशिष्ट इत्तफ़ाक़ कि कश्मीर में सामान्य जीवन बहाल करने का न्यायिक परिप्रेक्ष्य और प्रशासन का कुछ क्षेत्रों में क़ानून व्यवस्था में ढील देने का काम एक ही साथ हुआ और सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता से यह पूछा कि वे सुप्रीम कोर्ट आने से पहले हाईकोर्ट क्यों नहीं गए।

राज्य में सरकारी शिकंजे के बाद मोबाइल नेटवर्क को बंद कर देने की बात का जब वक़ील ने ज़िक्र किया तो अदालत की दिलचस्पी इस बात में जागी कि यह मोबाइल बंदी किस तरह से लागू हुई? कोर्ट ने यह पूछा कि निजी ऑपरेटरों ने इस मुद्दे को लेकर हाईकोर्ट का दरवाज़ा क्यों नहीं खटखटाया? उसके हिसाब से उन्हें इस बात पर गंभीरता से ग़ौर करना चाहिए।

इसी तरह जब एक वरिष्ठ वक़ील ने नाबालिगों को हिरासत में लेने में पेश आने वाली कठिनाई और न्याय पाने के लिए हाईकोर्ट जाने में पेश आने वाली मुश्किलों की बात कही तो यह सुनकर भारत के मुख्य न्यायाधीश को झटका सा लगा। थोड़ा विस्मित होते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से इस बारे में तत्काल रिपोर्ट तलब की है। इन मामलों में हिरासत की प्रकृति को जानना ज़रूरी है – भले ही वह एहतियातन हिरासत की बात हो या फिर गिरफ़्तारी की। इस तरह के मामलों में अनुच्छेद 22 के प्रावधानों को लागू किए जाने के बारे में सूचना बहुत ही महत्त्वपूर्ण है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश के अलावा इस देश को जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से ऐसी स्थिति के बारे में जानना है जब किसी को उसके अधिकारों से वंचित किया गया हो।

इससे बड़ी विडम्बना और क्या हो सकती है कि जिस प्रशासन से उम्मीद की जाती है कि वह जम्मू-कश्मीर में संविधान को पूरी तरह लागू करेगा, वहाँ संविधान की आत्मा, मौलिक अधिकार से ही लोगों को वंचित कर दिया है। जैसा कि मीडिया की रिपोर्टों में कहा गया है, जम्मू-कश्मीर में केंद्र सरकार के क़ानूनी शिकंजे के बाद हाईकोर्ट ने जो आदेश पास किए हैं वे अमूमन 'सिर्फ़ स्थगन' आदेश रहे हैं। कर्फ़्यू के कारण मुक़दमादार, वक़ील और अन्य संबंधित लोग न्याय की शरण में जाने से दूर ही रहे हैं।

फ़्री होकर घूम-फिर नहीं सकने और संचार माध्यमों को बंद कर दिए जाने के कारण वक़ील अपनी पेशेगत ज़िम्मेदारियों को नहीं निभा पा रहे हैं। बहुत सारे वकीलों को सरकार की कार्रवाई के ख़िलाफ़ बोलने के कारण हिरासत में ले लिया गया है, जिसमें बार एसोसिएशन ऑफ़ कश्मीर के अध्यक्ष अब्दुल क़यूम भी शामिल हैं जिन्हें इस समय आगरा जेल में रखा गया है। राज्य में हर जगह भय पसरा हुआ है।

हिरासत में लिया गया हर व्यक्ति अपनी हिरासत को अदालतों में चुनौती नहीं दे पाया है। इसके बावजूद कि ऐसे लोगों के निकट संबंधी वक़ीलों से मदद के लिए संपर्क कर पा रहे हैं, पर वकीलों में इस क़दर डर समाया हुआ है कि वे बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) के मामलों को अपने हाथ में लेने से कतरा रहे हैं। चूँकि बंदी प्रत्यक्षीकरण की याचिका सीधे-सीधे 'राज सत्ता' के ख़िलाफ़ होता है, वक़ील डरे हुए हैं और वे नहीं चाहते कि उनपर 'भारत-विरोधी' होने का ठप्पा लगे। 'व्यावहारिक वक़ील' इस तरह के किसी भी ठप्पों से दूर ही रहना चाहता है।

चूंकि वकील किस तरह का केस उठाते हैं इस आधार पर उनका प्रोफ़ाइल तैयार होता है और इस वजह से उनकी न तो किसी महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति होती है और न ही वे जज के रूप में पदोन्नति पाते हैं, लेकिन इसके बावजूद 'असहज मामलों' से दूरी बनाकर रखना ही बुद्धिमानी मानी जा रही है। वकीलों के मन में यह डर घर कर गया है।

दूसरी ओर, जो वक़ील ग़रीब हैं उनके लिए ज़िंदा बचे रहने का मामला सबसे बड़ा होता है। अधिकतर वक़ील जिसमें जूनियर भी शामिल हैं, छोटे-छोटे पेशेवर कार्य से होने वाली मामूली आय पर ज़िंदा रहते हैं। कर्फ़्यू ने उनके अस्तित्व को प्रभावित कर दिया है और उन्हें काम की तलाश में कहीं और जाने को बाध्य होना पड़ा है।

राज्य में केंद्र सरकार की नाकेबंदी के कारण जिन अन्य लोगों पर सर्वाधिक असर पड़ा है उनमें अधिकतर ऐसे लोग हैं जो क़ानूनी पेशे के हाशिए पर मौजूद हैं। स्टांप बेचने वाले, आवेदन लिखने वाले, टाइपिस्ट, क्लर्क, कार्यालय सहायक, फ़ोटोकॉपी करने वाले, अनुवादक, ड्राइवर और इसी तरह के अनेक लोग जो अदालत परिसर में दैनिक मज़दूरी करते हैं और सरकारी क़दम के कारण भुखमरी के कगार पर पहुंच गए हैं। राज्य में जिस तरह की अनिश्चितता और भय का वातावरण पसरा हुआ है, उसे देखते हुए न्याय का विचार खोखला लग रहा है और जीविकोपार्जन की आशा टूट चुकी है।

(अधिवक्ता पीवी दिनेश सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करते हैं)