अपराधीकरण को सामाजिक समस्याओं के हल के रूप में पेश किया जा रहा हैः डॉ प्रभा कोटिस्वरन

अपराधीकरण को सामाजिक समस्याओं के हल के रूप में पेश किया जा रहा हैः डॉ प्रभा कोटिस्वरन

डॉ कोटिस्वरन किंग्स कॉलेज लंदन में कानून और सामाजिक न्याय की प्रोफेसर हैं, और उन्होंने नारीवादी कानूनी सिद्धांत, उत्तर औपनिवेशिक नारीवादी अध्ययन और आपराधिक न्याय के मुद्दों पर विस्तार से लिखा है।

हाल के दिनों में, महिलाओं और बच्चों के खिलाफ यौन हिंसा के मामलों में भारत सरकार एकमात्र प्रतिक्रिया नए और कठोर कानून पेश कर, कर रही है। ये आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम, 2013, आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम 2018 और मौजूदा वर्ष में यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO) के जरिए स्पष्ट है।

लाइव लॉ के साथ इस साक्षात्कार में डॉ प्रभा कोटिस्वरन, उन प्रक्रियाओं और आंदोलनों के बारे में बात की है, जिन्होंने विधायी साधनों के लिए रास्ता बनाया और उन निहितार्थों पर चर्चा की है, जो महिलाओं के कानून के भीतर अपने अधिकारों का उपयोग करने से जुड़े हो सकते हैं।

डॉ कोटिस्वरन किंग्स कॉलेज लंदन में कानून और सामाजिक न्याय की प्रोफेसर हैं, और उन्होंने नारीवादी कानूनी सिद्धांत, उत्तर औपनिवेशिक नारीवादी अध्ययन और आपराधिक न्याय के मुद्दों पर विस्तार से लिखा है। वह इस सप्ताह नई दिल्ली में हैं और 22 नवंबर 2019 (शुक्रवार) को शाम 6:30 बजे सिरी फोर्ट ऑडिटोरियम- II में प्रोजेक्ट 39 ए वार्ष‌िक लेक्चर में आपराधिक कानून पर बोलने वाली हैं।

आईपीसी और POCSO में संशोधन, महिलाओं और बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के लिए अनिवार्य न्यूनतम सजा बढ़ाने पर, आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि इन कमजोर समूहों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ये संशोधन आवश्यक थे?

हमारी किताबों में पर्याप्त कानून हैं, जिन्हें अक्षरसः उसी भावना से लागू किया जाए तो वे महिलाओं और बच्चों के खिलाफ यौन हिंसा का प्रतिकार कर सकते हैं। निश्चित रूप से कानून के कार्यान्वयन की सुनिश्चितता पीड़ितों के हितों की सुरक्षा का सबसे विश्वसनीय तरीका है। जब कानूनों को लागू नहीं किया जाता हैतो अधिक कड़े कानूनों का सहारा लेने का प्रलोभन होता है जो फेयर ट्रायल के अधिकार से समझौता करता है और जिन्हें और कम लागू किया जाता है क्योंकि यह जजों को दुविधा में डालता है। उदाहरण के लिए POCSO को लें, जिसमें बच्चों के अधिकार समूहों ने बार-बार फांसी की सजा शामिल के खिलाफ चेतावनी दी, ये देखते हुए कि ऐसे में पीड़ितों द्वारा अपराध रिपोर्ट करने की संभावना कम होगी क्योंकि अधिकांश अपराधी पीड़ितों के पर‌िचित होते हैं, मृत्युदंड अंतरराष्ट्रीय कानून और व्यवहार के खिलाफ भी है। ये भारत में मनमाने ढंग से इस्तेमाल किया जाता है। वे स्पष्ट थे कि संशोधन "बाल-विरोधी, प्रतिगामी और असहज" है। जज और वरिष्ठ वकील सहमत थे। जब POCSO का कार्यान्वयन अत्यधिक असंतोषजनक है, तो सजा में बढ़ोतरी संस्थागत विफलताओं को कैसे खत्म कर सकती है? इसके बावजूद पोस्को संशोधन अधिनियम, 2019 पारित किया गया था।

दिल्ली में दिसंबर 2012 के गैंगरेप के बाद, सरकार ने प्रतिक्रियास्वरूप जेएस वर्मा कमेटी और बाद में आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम, 2013 को लागू किया। इसी तरह, कठुआ की घटना के बाद 2018 में कानून में फिर से संशोधन किया गया। बड़े पैमाने पर विधायी परिवर्तनों को ट्रिगर करने वाली ऐसी इकलौती घटनाओं को आप क्या मानती हैं? क्या आप लगता है कि ये केवल राजनीतिक टोकनवाद से अधिक नहीं हैं?

दोनों उदाहरणों में काफी टोकनवाद है जो यह दर्शाता है कि सरकारें, चाहे उनकी राजनीतिक दृढ़ता जैसी भी हो, अपराधीकरण में एक आसान सहयोगी पा लेती हैं। 2013 के संशोधनों को दिल्ली सामूहिक बलात्कार और हत्या के विरोध में प्रदर्शनों के जवाब में तेजी से अपनाया गया था। हालांकि 2018 के संशोधनों को भी कठुआ मामले ने ट्रिगर किया था, मेरा मानना है कि 5 साल के अंतराल में राज्य ने एक उच्च स्तर की कैदवादी मानसिकता विकसित की है जिसे हम अन्य क्षेत्रों जैसे तस्करी में देख सकते हैं। आपराधिक कानून संशोधन विधेयक पर हुई बहस में सांसद किरण खेर ने दरअसल लोकसभा में जो कहा वो " सोच-समझ नहीं बोला गया था।" इस विधेयक के प्रावधान "निस्संदेह सुविचारित" हैं; इस सरकार में "इस प्रकार के अपराधों के लिए जीरो टॉलरेंसहै।" हमें इसे ध्यान में रखना चाहिए और टोकनवादी मानने की तुलना में अधिक कैदवादी कदम के रूप में देखना चाहिए।

गवर्नेंस फेमिनिज्म पर आपके काम में, आपने भारतीय महिला आंदोलन (IWM) की जांच की है, जिसमें वो यौन हिंसा पर कानूनों के बदलाव और कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने में राज्य तंत्र, विशेष रूप से वर्मा कमेटी के साथ शामिल है। क्या आप हमें इसके बारे में थोड़ा बता सकती हैं, और आप इस तरह के जुड़ाव के निहातार्थ क्या देखती हैं? इसके अलावा, आपको को कैसे लगता है कि ऐसे ही मुद्दों पर दुनिया भर में महिलाओं के समूहों ने राज्य के साथ जैसे बातचीत की है, उससे ये अलग है?

2018 की पुस्तक गवर्नेंस फेमिनिज्म: एन इंट्रोडक्शन में, मैंने 1979 से 2013 तक के बलात्कार कानूनों में संशोधन करने में शामिल रहे नारीवादियों प्रयासों को चिन्ह‌ित किया है, ये तर्क देने के लिए कि भारतीय नारीवाद ने आपराधिक कानून पर निर्भरता बढ़ाई है, यौन हिंसा के लैंगिक विमर्श के प्रति उसकी गहरी प्रतिबद्धता है, और स्टेट पावर के समक्ष उसका महीन विरोधी रुख भी है। जहां वे आंदोलन की स्थिति में राज्य की शक्तियों के प्रति अत्यधिक संदिग्ध थे, आपराधिक कानून के खिलाफ उनका विरोध आज मृत्युदंड के खिलाफ उनके तर्कों में प्रकट होता है। मैं यह नहीं कह रही हूं कि आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013 बिल्कुल भी फायदेमंद नहीं है, मैं केवल ये कह रही हूं कि केवल यही अपेक्षित परिणाम कई अनपेक्षित परिणामों के साथ सन्‍नद्घ हैं, जिन पर हमें विशेष रूप से विचार करने की आवश्यकता है। भारतीय नारीवादी हालांकि ऐसी रणनीतियों को अपनाने में अकेली नहीं हैं। दुनिया भर के नारीवादियों ने यौन दुर्व्यवहार को रोकने के लिए आपराधिक कानूनों को पारित कराने में राज्य के साथ जुड़ाव किया है, लेकिन अक्सर, इसके परिणाम खुद यौन शोषण के शिकार लोगों के लिए खराब रहे हैं, हालांकि इस प्रक्रिया में राज्य के कैदवादी हाथों को मजबूती मिली है।

आपने मानव तस्करी और यौनकर्मियों के अधिकारों पर भी बड़े पैमाने पर काम किया है। क्या आप हमें एक तरफ यौन हिंसा से निपटने में और दूसरे पर मानव तस्करी और सेक्स वर्क के मामले में आईडब्ल्यूएम के दृष्टिकोण में अंतर के बारे में बता सकती हैं?

यौन हिंसा के संबंध में, IWM ने आपराधिक कानून पर भरोसा किया है। तस्करी और सेक्स वर्क के संबंध में ऐसा नहीं है। सेक्स वर्क के सवाल पर IWM लंबे समय से दुविधा में है; वे सेक्स वर्करों के अधिकारों का समर्थन करना चाहते हैं, लेकिन सेक्स वर्क के अधिकार को नहीं ये देखते हुए भी कि भारत में महिलाओं को किन आर्थिक स्थितियों में सेक्स वर्क का सहारा लेना पड़ता है। इसका मतलब यह है कि उन्होंने आम तौर पर इस मुद्दे पर वकालत के स्थान को त्याग किया है, जिसे कट्टरपंथी नारीवादी और ट्रैफिकिंग-रोधी एनजीओ ने कब्जा कर लिया है। इन समूहों ने ट्रैफिकिंग ऑफ पर्सन्स (प्रिवेंशन, प्रोटेक्शन एंड रिहैबिलिटेशन) बिल, 2018 के पारित होने का दबाव बनाया है, जिसे पिछले साल लोकसभा में पारित किया गया, वो भी उच्च स्तर का कैदवादी कानून था, हालांकि राज्यसभा में पेश हाने से पहले ही उसे समाप्त कर दिया गया था। हालांकि, भारतीय महिला आंदोलनकारियों ने यौनकर्मियों के समूहों का विशेष रूप से समर्थन, किया जब वर्मा समिति ने तस्करी के अपराध की सिफारिश की थी, जिसमें तस्करी के साथ स्वैच्छिक सेक्स कार्य को स्वीकार कर लिया। वर्मा समिति ने तब एक स्पष्टीकरण जारी किया कि तस्करी के अपराध में स्वैच्छिक सेक्स कार्य शामिल नहीं होंगे।

आपके आगामी व्याख्यान से क्या उम्मीद की जाए, इस बारे में विचार कर सकते हैं क्या कि विशेष रूप से आपराधिक कानून तंत्र सामाजिक वास्तविकताओं के साथ कैसे बातचीत करता है? आपको कैसे लगता है कि यह उन वकीलों के लिए प्रासंगिक हो सकता है जो भारतीय अदालतों से प्रैक्टिस करते हैं, और रोजमर्रा कई ऐसी मुद्दों का सामना करते हैं, जिन्हें आपने उठाया है?

अपने व्याख्यान में मैं आपराधिक कानून की राजनीतिक अर्थव्यवस्था के बारे में बोलती हूं, इस बारे में हमें क्यों ध्यान देने की आवश्यकता है कि कानूनों को कैसे बनाया जाता है, बजाय कि केवल ये देखने के कि उसे कैसे लागू किया जाता है; इस बारे में कि हमें व्यापक समझ की आवश्यकता है ये समझने के लिए कि विभिन्न आपराधिक कानून को एक-दूसरे को कैसे प्रभावित करते हैं; कैसे हमने संस्थागत, शासन और सामाजिक सुधार में निवेश के करने के बजाए नए कानूनों को पारित करने को प्राथमिकता दी है और कैसे अपराधीकरण को सामाजिक समस्याओं के समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है जिससे यह प्रशासनिक कानून, श्रम कानून और सामाजिक कल्याण कानून जैसे अन्य नियामक दृष्टिकोणों को विस्थापित कर चुका है। मुझे उम्मीद है कि इससे वकीलों को व्यापक संदर्भ को समझने में मदद मिलेगी, जिसमें ये कानून बने हैं और इसलिए उन्हें रणनीतिक और नैतिक विकल्प बनाने में मदद मिलेगी, व‌िशेषकर तब जब वे यौन हिंसा के मामलों में पीड़ित के लिए न्याय और आरोपित के लिए निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने का प्रयास करेंगे।