क्या किसी हाईकोर्ट के न्यायाधीश के खिलाफ दर्ज की जा सकती है FIR?: समझिये न्यायमूर्ति एस. एन. शुक्ला मामला

क्या किसी हाईकोर्ट के न्यायाधीश के खिलाफ दर्ज की जा सकती है FIR?: समझिये न्यायमूर्ति एस. एन. शुक्ला मामला

मंगलवार (31-07-2019) को मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने CBI को इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ पीठ के जज न्यायमूर्ति एस. एन. शुक्ला(श्री नारायण शुक्ला) के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PCA) के तहत FIR दर्ज करने की अनुमति दे दी है। भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जहाँ किसी मौजूदा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के खिलाफ एक FIR दर्ज करने की अनुमति दी गयी है।

दिल्ली न्यायिक सेवा संघ तीस हजारी कोर्ट बनाम गुजरात राज्य (1991 AIR 2176) के मामले में यह अच्छी तरह से तय किया गया था कि कोई भी व्यक्ति चाहे उसका पद या पदनाम कुछ भी हो, कानून से ऊपर नहीं है और उसे आपराधिक कानून के उल्लंघन का दंड भुगतना होगा। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि एक मजिस्ट्रेट, न्यायाधीश या कोई अन्य न्यायिक अधिकारी किसी अन्य नागरिक की तरह अपराध के लिए आपराधिक मुकदमा चलाने के लिए उत्तरदायी है।
गौरतलब है की आज तक न तो किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के खिलाफ और न ही किसी उच्चतम न्यायालय के मौजूदा न्यायाधीश के खिलाफ FIR दर्ज की गयी है। हम इस लेख में हम समझेंगे कि आखिर कब किसी मौजूदा हाई कोर्ट के जज के खिलाफ FIR दर्ज की जा सकती है और क्या है उससे पहले अपनाई जाने वाली प्रक्रिया। इसके अलावा हम इस मुद्दे से जुड़े कुछ प्रमुख मामलों को भी समझेंगे, लेकिन आगे बढ़ने से पहले आइये न्यायमूर्ति एस. एन. शुक्ला के खिलाफ मामले को समझ लेते हैं।
न्यायमूर्ति एस. एन. शुक्ला: इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ पीठ के जज
न्यायमूर्ति एस. एन. शुक्ला ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से एलएलबी करने के बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट में वकालत शुरू की। उत्तर प्रदेश सरकार में वह अपर महाधिवक्ता भी रहे हैं। वर्ष 2005 में न्यायमूर्ति एस. एन. शुक्ला ने अडिश्नल जज का कार्यभार संभाला और 2 वर्ष बाद उन्हें वर्ष 2007 में स्थाई जज बना दिया गया। वह अगले साल (वर्ष 2020) में रिटायर होने वाले हैं, लेकिन उससे पहले ही उनके खिलाफ यह सख्त कार्रवाई की गई है।
इससे पहले उन्होंने इस साल मार्च में, सीजेआई गोगोई को पत्र लिख कर यह अनुरोध किया कि उन्हें न्यायिक कार्य का निर्वहन करने की अनुमति दी जाए। हालांकि, पिछले महीने, CJI गोगोई ने काम के पुन: आवंटन के लिए उनके अनुरोध को अस्वीकार कर दिया और प्रधान मंत्री को पत्र लिखा और न्यायमूर्ति शुक्ला को संसदीय प्रक्रिया के मुताबिक हटाने के लिए कहा।
न्यायमूर्ति एस. एन. शुक्ला के खिलाफ मामला
दरअसल पूर्व CJI दीपक मिश्रा द्वारा जस्टिस शुक्ला के खिलाफ प्रारंभिक जांच का आदेश यूपी के एडवोकेट जनरल राघवेंद्र सिंह की उस शिकायत पर दिया गया था, जिसमें जस्टिस शुक्ला पर गंभीर न्यायिक कदाचार का आरोप लगाया गया था। न्यायमूर्ति शुक्ला पर लगे आरोप मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के रिश्वतखोरी के मामले से जुड़े हैं। कथित घोटाले में कुछ मेडिकल कॉलेज शामिल हैं, जिन्हें मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा कार्य करने की अनुमति से इनकार कर दिया गया था। एक बिचौलिए ने कथित रूप से कॉलेजों को यह आश्वासन दिया कि न्यायपालिका उन्हें कॉलेज चालू रखने की अनुमति देगी। इसके बाद संस्थानों ने कथित तौर पर बिचौलिए को ऐसा करने हेतु पैसों का भुगतान किया।
इन आरोपों की जांच के लिए 3 उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के एक पैनल का गठन किया गया था। तीन न्यायाधीशों वाली समिति, जिसमें मुख्य न्यायाधीश इंदिरा बनर्जी (मद्रास HC), एस. अग्निहोत्री (सिक्किम HC) और पी. के. जायसवाल (मध्यप्रदेश HC) शमिल थे, ने जनवरी 2018 में यह निष्कर्ष निकाला कि न्यायमूर्ति शुक्ला के खिलाफ शिकायत में आरोपों में पर्याप्त गंभीरता मौजूद थी और यह कि उन्हें हटाने के लिए कार्यवाही शुरू करने के लिए पर्याप्त कारण मौजूद हैं। इस समिति ने उन्हें सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का उल्लंघन करते हुए छात्रों के प्रवेश की समय सीमा बढ़ाकर एक निजी मेडिकल कॉलेज को फायदा पहुंचाने का दोषी पाया।
जांच समिति ने यह पाया कि न्यायमूर्ति शुक्ला ने "न्यायिक जीवन के मूल्यों को छोटा किया, एक न्यायाधीश के स्तर के विपरीत कार्य किया, अपने कार्यालय की महिमा, गरिमा और विश्वसनीयता को कम किया"। यह कहा गया कि न्यायमूर्ति शुक्ला ने 1 सितंबर, 2017 को पारित एक आदेश में 3 दिन बाद सुधार किया था, जिससे जीसीआरजी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस को शैक्षणिक सत्र 2017-18 के लिए नए छात्रों को स्वीकार करने की अनुमति मिली। इसके अलावा, यह आरोप लगाया गया था कि न्यायमूर्ति शुक्ला ने सुप्रीम कोर्ट की CJI मिश्रा की अगुवाई वाली पीठ द्वारा पारित आदेशों का उल्लंघन किया था, जो मेडिकल कॉलेज खोलने के मामलों की सुनवाई कर रही थी।
पैनल की रिपोर्ट देखने के बाद CJI मिश्रा ने उन्हें इस्तीफा देने या जल्दी सेवानिवृत्ति लेने के लिए कहा था लेकिन न्यायमूर्ति शुक्ला ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। इसके बाद तत्कालीन CJI दीपक मिश्रा ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को न्यायाधीश शुक्ला से न्यायिक कार्य वापस लेने के लिए कहा। तत्कालीन CJI मिश्रा ने इसके बाद से उनसे सभी न्यायिक कार्य वापस ले लिए।
CJI मिश्रा ने राष्ट्रपति सचिवालय को भी पत्र लिखा, जिसमें न्यायाधीश के खिलाफ निष्कासन की कार्यवाही शुरू करने का अनुरोध किया गया। हालांकि, कुछ दिनों बाद, उत्तर प्रदेश के राज्यपाल की मंजूरी के साथ, न्यायमूर्ति शुक्ला ने 90 दिनों की छुट्टी पर जाना चुना। इसके बाद न्यायमूर्ति शुक्ला द्वारा वर्तमान CJI के समक्ष अपने न्यायिक कार्य को फिर से आवंटित करने का अनुरोध किया गया, जिसे अस्वीकार कर दिया गया था। इसके बाद CJI गोगोई ने न्यायिक अनियमितताओं और दुर्भावनाओं के कारण न्यायमूर्ति शुक्ला को उनके पद से हटाने के लिए संसद में एक प्रस्ताव लाने के लिए प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा था।
हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज के खिलाफ FIR
संबधित कानून एवं प्रावधान
वर्ष 1985 में अधिनियमित क़ानून, न्यायाधीश (संरक्षण) अधिनियम न्यायाधीशों को अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करता है और यह कहता है कि कोई भी अदालत किसी ऐसे व्यक्ति के खिलाफ, जो न्यायाधीश था या है, कोई नागरिक या आपराधिक कार्यवाही नहीं करेगी या जारी रखेगी, जो उसके द्वारा अपने आधिकारिक या न्यायिक कर्तव्य या कार्य के निर्वहन में कार्य करने के दौरान किये गए किसी भी कार्य, बात या बोले गए शब्द से सम्बंधित हो। लेकिन अधिनियम यह भी बताता है कि यह संरक्षण किसी भी तरह से केंद्र सरकार या राज्य सरकार या भारत के सर्वोच्च न्यायालय या किसी भी उच्च न्यायालय या किसी भी कानून के तहत अन्य प्राधिकरण द्वारा, किसी भी व्यक्ति के खिलाफ जो एक न्यायाधीश है या था, की गयी कार्रवाई (सिविल, आपराधिक, या विभागीय कार्यवाही या अन्यथा के माध्यम से) पर लागू नहीं होगा।
इसके अलावा भारतीय दंड संहिता की धारा 77 कहती है कि, "कोई बात अपराध नहीं है, जो न्यायिकतः कार्य करते हुए न्यायाधीश द्वारा ऐसी किसी शक्ति के प्रयोग में की जाती है, जो या जिसके बारे में उसे सद्भावपूर्वक विश्वास है कि वह उसे विधि द्वारा दी गयी है."
FIR दर्ज करने की शर्तें
हमारे सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पुलिस या कोई भी जांच एजेंसी किसी सिटिंग (मौजूदा) हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज और यहां तक कि भारत के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ पहली सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज कर सकती है? इसका उत्तर के. वीरस्वामी बनाम भारत संघ और अन्य, 1991 SCC (3) 655 के मामले में उच्चतम न्यायालय की पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ द्वारा दिए गए बहुमत के फैसले में मिल सकता है।
गौरतलब है कि वीरस्वामी निर्णय, मद्रास उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश के। वीरस्वामी के खिलाफ दिया गया था, जिन्होंने वर्ष 1976 में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दायर अपने खिलाफ एक प्राथमिकी को इस आधार पर चुनौती दी थी कि उक्त अधिनियम न्यायाधीशों पर लागू नहीं होता है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में यह फैसला सुनाया था कि जांच एजेंसियों को शीर्ष अदालत या उच्च न्यायालयों के सिटिंग जज के खिलाफ मामला दर्ज करने से पहले सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को सबूत दिखाना होगा। वर्ष 1991 से पहले किसी भी अन्वेषण एजेंसी द्वारा एक मौजूदा HC या SC जज के खिलाफ FIR दर्ज करने पर कोई रोक नहीं थी। हालाँकि यह स्थिति वर्ष 1991 के बाद सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट फैसले के बाद बदल गयी है।
वर्ष 1991 के वीरस्वामी मामले में यह फैसला दिया गया कि उच्च न्यायपालिका के सदस्यों के खिलाफ आरोपों को केवल भारत के मुख्य न्यायाधीश से पूर्व अनुमति के साथ ही जांचा जा सकता है। वीरस्वामी का निर्णय यह कहता है कि "यह आवश्यक और उचित होगा कि मंजूरी का प्रश्न भारत के मुख्य न्यायाधीश की सलाह के अनुसार निर्देशित किया जाए"। संविधान पीठ में बहुमत का निर्णय एक न्यायाधीश को "लोक सेवक" के रूप में वर्गीकृत करता है।
ऐसा साफ़ किया गया कि किसी न्यायाधीश, चाहे वह उच्च न्यायालय का न्यायाधीश हो या उच्चतम न्यायालय का, के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करते समय CJI के साथ परामर्श, न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अनिवार्य किया गया। बहुमत के फैसले में यह माना गया है कि कोई आपराधिक मामला आपराधिक प्रक्रिया संहिता (एफआईआर) की धारा 154 के तहत उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के खिलाफ पंजीकृत नहीं किया जाएगा जब तक कि सरकार पहले "उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से सलाह" न कर ले। यह तर्क दिया गया कि भारत के मुख्य न्यायाधीश की सहमति इसलिए अनिवार्य है क्योंकि न्यायाधीशों की नियुक्ति में उनकी सहभागिता रहती है।
यह कहा गया कि यदि मुख्य न्यायाधीश की यह राय है कि यह अधिनियम के तहत कार्यवाही के लिए एक उपयुक्त मामला नहीं है, तो मामला पंजीकृत नहीं होगा। यदि भारत के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ आपराधिक कदाचार के आरोप प्राप्त होते हैं, तो सरकार सर्वोच्च न्यायालय के किसी अन्य न्यायाधीश या न्यायाधीशों से परामर्श करेगी। अभियोजन के लिए स्वीकृति प्रदान करने के प्रश्न की जांच के चरण में भी समान रूप से मंजूरी के प्रश्न का भारत के मुख्य न्यायाधीश की सलाह के अनुसार मार्गदर्शन किया जाए। तदनुसार निर्देश सरकार के पास जाएंगे।
हालाँकि इस मामले में बहुमत के फैसले से असहमति रखते हुए जस्टिस जे. एस. वर्मा ने इस निर्णय की व्यावहारिक कठिनाइयों की ओर इशारा करते हुए अपने 70 पृष्ठ के फैसले में उस परिस्थिति को लेकर इस फैसले की अस्पष्टता को दर्शाया जहाँ "इस तरह की कार्रवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ लायी जाए।" उनके अनुसार, भारत के मुख्य न्यायाधीश "अपने सहयोगियों पर केवल नैतिक प्राधिकार का प्रयोग करते हैं" और वह उन पर कोई न्यायिक प्राधिकार का उपयोग नहीं कर सकते हैं।
यह कहा जा सकता है कि सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायमूर्ति वीरस्वामी मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था, जिससे उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के दायरे में लाया गया। इससे पहले तक उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों पर अधिनियम के तहत भ्रष्टाचार के लिए मुकदमा नहीं चलाया जा सकता था, जो केवल लोक सेवकों के लिए लागू था। हालाँकि वर्ष 2017 के निर्णय [कामिनी जायसवाल बनाम भारत संघ (WRIT PETITION [CRIMINAL] NO।176 OF 2017)] के बाद अब किसी मौजूदा SC या HC जज के खिलाफ FIR दर्ज करने के लिए केवल भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत मामला होना आवश्यक नहीं, यह कोई भी आपराधिक मामला हो सकता है।
न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ FIR और उनकी गिरफ्तारी: पूर्व शर्तें?
उच्चतम न्यायालय के दिल्ली न्यायिक सेवा संघ तीस हजारी कोर्ट बनाम गुजरात राज्य (1991 AIR 2176) निर्णय में गुजरात पुलिस के अधिकारियों द्वारा गुजरात के नाडियाद के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के साथ अनुचित व्यवहार किया गया था। इस मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा न्यायिक अधिकारी को गिरफ़्तार करते हुए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया के निर्देशों को जारी किया गया। मुख्य रूप से, अदालत ने यह कहा कि एक न्यायिक अधिकारी को "जिला न्यायाधीश या उच्च न्यायालय को सूचित करते हुए" गिरफ्तार किया जाना चाहिए"।
यह भी कहा गया कि तत्काल गिरफ्तारी केवल एक "तकनीकी या औपचारिक गिरफ्तारी" होगी, जिसके बाद इसे तुरंत संबंधित जिले के जिला और सत्र न्यायाधीश और उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को सूचित किया जाना चाहिए। गिरफ्तार न्यायिक अधिकारी को जिला न्यायाधीश के पूर्व आदेश के बिना किसी पुलिस थाने में नहीं ले जाया जाएगा और एक वकील की उपस्थिति को छोड़कर उसके या उसके पास से कोई बयान दर्ज नहीं किया जाएगा। उसे हथकड़ी नहीं पहनाई जाएगी।
इसके साथ ही वर्ष 2017 में कामिनी जायसवाल बनाम भारत संघ (WRIT PETITION [CRIMINAL] NO।176 OF 2017) के मामले में वीरस्वामी निर्णय को उचित एवं तर्कसंगत ठहराते हुए यह कहा गया कि उच्च न्यायालय या इस न्यायालय के किसी भी मौजूदा न्यायाधीश के खिलाफ कोई भी प्राथमिकी दर्ज करने का कोई प्रश्न नहीं उठता है क्योंकि न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए यह आवश्यक है। अदालत ने यह माना कि ऐसा इसलिए जरुरी है क्यूंकि कार्यपालिका द्वारा न्यायाधीशों के खिलाफ मुकदमा चलाने की शक्ति का दुरुपयोग होने की संभावना रहती है।
अदालत ने कहा कि एक जज के खिलाफ किसी भी शिकायत और CBI द्वारा उसकी जांच को यदि प्रचारित किया जाता है तो यह जज और जनता पर दूरगामी प्रभाव डालेगा। इसलिए, अधिनियम के तहत कार्रवाई का विवेकपूर्ण उपयोग आवश्यक है। इसके बाद अदालत ने वीरस्वामी मामले के निर्णय को दोहराते हुए कहा कि भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश के परामर्श के बिना उच्च न्यायालय के न्यायाधीश या उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश या उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के खिलाफ कोई भी एफआईआर का पंजीकरण नहीं हो सकता है और यदि माननीय मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ कोई आरोप है तो निर्णय माननीय राष्ट्रपति द्वारा उक्त निर्णय में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार लिया जायेगा।
उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की भूमिका है अहम्
मुख्यतः तीन मामलों (वीरास्वामी, दिल्ली न्यायिक सेवा संघ एवं कामिनी जायसवाल) पर गौर करने पर यह मालूम चलता है कि अदालतों ने कार्यपालिका की शक्तियों पर अंकुश लगाने हेतु यह प्रबंध किया है कि किसी भी मौजूदा SC या HC जज के खिलाफ मामले को तब तक न दर्ज किया जाए जबतक कि न्यायपालिका के भीतर से ही इस मामले को लेकर स्वीकृति न आ जाए।
यह आवश्यक प्रतीत होता है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश को किसी न्यायाधीश के विरूद्ध शुरू किये जाने वाले किसी आपराधिक मामले की जानकारी तस्वीर से बाहर नहीं रखा जाए। दरअसल वह ऐसे मामले में अपनी राय देने के लिए एक बेहतर स्थिति में होते हैं और भारत के मुख्य न्यायाधीश के साथ परामर्श करके सही निष्कर्ष पर आने में सरकार की अपार सहायता होगी।
FIR को, जैसा कि हम जानते हैं, किसी भी अपराध को लेकर अन्वेषण प्रक्रिया को आगे बढ़ने हेतु एक प्रथम कदम के तौर पर देखा जा सकता है। चूँकि जस्टिस शुक्ला के खिलाफ मामला गंभीर प्रकृति का है, और 2 CJI के अलावा एक पैनल ने भी उनकी इस मामले में भूमिका को संदिग्ध पाया है इसलिए यह एक उचित मामला बनता है जहाँ एक मौजूदा हाई कोर्ट के जज के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही की जांच को अन्वेषण एजेंसी द्वारा आगे बढ़ाये जाने की अनुमति दी जाए।
हालाँकि, जस्टिस शुक्ला को उनके पद से हटाने की शक्ति न्यायपालिका में निहित नहीं है क्यूंकि यह कार्य संसद का है। अब देखना यह होगा कि क्या संसदीय कार्यवाही के जरिये जस्टिस शुक्ला को उनके पद से हटाए जाने का निर्णय लिया जाता है या नहीं।