दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के अंतर्गत 'क्षमा-दान': परिस्थितयां, प्रावधान एवं कुछ जरुरी बातें

दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के अंतर्गत

एक अप्रूवर को क्षमा-दान देने की प्रक्रिया को हमारी दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के अंतर्गत जगह दी गयी है। आज इस लेख के माध्यम से हम उन परिस्थितियों के बारे में समझेंगे जहाँ क्षमा-दान दिया जा सकता है। इससे जरुरी हर वो बात हम आपको समझाने का प्रयास करेंगे, जो समझना आपके लिए आवश्यक है।

उपरोक्त विषय से संबंधित कानून के प्रावधान धारा 306 से 308 दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 में उपस्थित हैं। आइये हम इन प्रावधानों को समझते हैं जिसके बाद हम इससे जुडी अन्य जानकारी आपको देंगे, जिससे इस विषय के बारे में हमारी और आपकी समझ गहरी हो सके।
क्षमा दान की महत्वता?

इन प्रावधानों का मुख्य उद्देश्य किसी बेहद गंभीर किस्म के अपराध (जो कई लोगों द्वारा मिलकर किये गए हों अथवा उसमे कई लोगों की सहभागिता रही हो) की जड़ तक जाना है। क्षमा-दान का प्रावधान यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी व्यक्ति, जो किसी गंभीर अपराध में सम्मिलित रहा हो, वो क्षमा-दान का लाभ उठाकर उस अपराध से जुडी हर जानकारी/सबूत दे सके जिसकी मदद से उस अपराध में शामिल अन्य लोगों को उनकी सहभागिता के अनुसार सजा दी जा सके एवं पीड़ित/पीड़िता को न्याय दिलाया जा सके। आंध्र प्रदेश राज्य बनाम चीमलापति गणेश्वर राव, (1963) 2 Cri LJ 671 के मामले में अदालत ने भी क्षमा-दान के इस पहलू पर गौर किया है।

क्षमा-दान देने की अधिकारिता

धारा 306 (1) के अनुसार, किसी भी व्यक्ति से (जिस पर यह धारा लागू होती है) साक्ष्य प्राप्त करने की दृष्टि से, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी अपराध से संबंधित है, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट जांच (inquiry), अन्वेषण (investigation), या ट्रायल (विचारण) के किसी भी स्तर पर उस व्यक्ति को पूर्ण एवं सच्चे तौर पर उस अपराध से जुडी एवं उसकी जानकारी में मौजूद हर परिस्थिति बताने की शर्त पर क्षमा-दान दे सकते हैं।

वहीँ प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट, जांच या ट्रायल के किसी भी स्तर पर, ऐसे व्यक्ति को पूर्ण एवं सच्चे तौर पर उस अपराध से जुडी एवं उसकी जानकारी में मौजूद हर परिस्थिति एवं उस अपराध से जुड़े हर व्यक्ति के विषय में (भले उसने अपराध किया हो या उस व्यक्ति ने अपराध को abet किया हो) बताने की शर्त पर क्षमा-दान दे सकता हैं।
किसी व्यक्ति को क्षमा करने के पीछे का सिद्धांत गंभीर अपराध में सत्य को उजागर करना है, ताकि अपराध से संबंधित अन्य आरोपी व्यक्तियों के अपराध को उजागर किया जा सके। (महाराष्ट्र राज्य बनाम अबू सलेम अब्दुल कयूम अंसारी - (2010) 10 एससीसी 179)।
एक व्यक्ति को क्षमा-दान देने के खिलाफ कोई आपत्ति केवल इसलिए नहीं हो सकती है, क्योंकि वह अपने कबूलनामे में खुद को उसी हद तक आरोपित नहीं करता है, जैसा कि अन्य अभियुक्तों को करता है, क्योंकि धारा 306 के लिए केवल यह जरूरी है कि क्षमा किसी भी ऐसे व्यक्ति को दी जा सकती है जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से या निजी तौर पर अपराध में शामिल रहा हो। (सुरेश चंद्र बहरी बनाम बिहार राज्य - (1995) Supp (1) SCC 80 = AIR 1994 SC 2420)।
Accomplice कौन होता है?

एक "Accomplice", अपराध में एक सहयोगी है, चाहे वो प्रिंसिपल के तौर पर हो या सहायक के रूप में। ब्लैक लॉ शब्दकोश एक "Accomplice" को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित करता है, जो किसी भी तरह से अपराध के कमीशन में किसी अन्य के साथ शामिल है, चाहे वह पहले या दूसरे डिग्री में एक प्रिंसिपल के रूप में हो या एक सहायक के रूप में।
दूसरे शब्दों में, एक व्यक्ति अपराध करने में किसी दूसरे व्यक्ति का साथी या Accomplice है, अगर वह, अपराध के कमीशन को बढ़ावा देने या उसे सुविधाजनक बनाने के इरादे से, दूसरे व्यक्ति से इसे करने के लिए आग्रह करता है या आदेश देता है एवं अपराध की योजना बनाने या करने में दूसरे व्यक्ति का साथ देता है।
एम. ओ. शमसुद्दीन बनाम केरल राज्य [(1995) 3 एससीसी 351] में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह देखा गया था कि "साधारण अर्थ में प्रयुक्त होने पर" Accomplice शब्द का अर्थ "अपराध में भागीदार या सहयोगी" है।

किस प्रकार के अपराधों में दिया जा सकता है क्षमा-दान?

निम्नलिखित 2 मामलों में क्षमा-दान दिया जा सकता है:-
(a) विशेष रूप से सत्र न्यायालय या आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम, 1952 (1952 का 46) के तहत नियुक्त एक विशेष न्यायाधीश की अदालत द्वारा विचरण किया जा सकने वाला अपराध।
(b) ऐसे कारावास से, जिसकी अवधि 7 वर्ष तक की हो या अधिक कठोर दंड से दंडनीय कोई अपराध।
हालाँकि हम यह जानते हैं की कई बार अपराध की एक श्रृंखला में तमाम ऐसे अपराध भी होते हैं जो ऊपर बताई गयी दोनों ही श्रेणी में नहीं आते हैं, हालाँकि अगर उस श्रृंख्ला का कोई एक भी अपराध इस श्रेणी में आता है और अगर अन्य अपराध उसी श्रृंख्ला का हिस्सा हैं तो वे ऊपर बताई गई श्रेणी में समझे जायेंगे। यह स्थिति हसमुखलाल बनाम भैरवनाथ सिंह [1972 Cri LJ 560 (Guj)] के मामले में भी साफ़ की गयी है।
उदहारण के तौर पर अगर कोई अपराध विशेष रूप से केवल सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय है और अगर उस अपराध की श्रृंख्ला में कुछ ऐसे अपराध भी किये गए हैं जो मजिस्ट्रेट द्वारा भी विचारणीय हैं तो मजिस्ट्रेट, धारा 209 एवं जोइंडर ऑफ़ चार्जेज की अन्य धाराओं के चलते ऐसे मामले को सत्र न्यायालय के समक्ष पेश करदेगा और इस वजह से उस अपराध की श्रृंखला के अन्य अपराध भी सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय हो जायेंगे और इसलिए यह उपधारा उन अपराधों पर भी लागू होगी।
मजिस्ट्रेट का अनिवार्य कर्त्तव्य

प्रत्येक मजिस्ट्रेट जो उप-धारा (1) के तहत क्षमा प्रार्थना करता है, रिकॉर्ड करेगा-
(a) ऐसा करने के लिए उसके कारण;
(b) क्या क्षमा-दान उस व्यक्ति द्वारा स्वीकार किया गया था या नहीं किया गया था, और आरोपी द्वारा किए गए आवेदन पर, उसे इस तरह के रिकॉर्ड की एक प्रति प्रस्तुत करनी होगी। [देखें धारा 306 (3) दंड प्रक्रिया संहिता]
यहाँ यह ध्यान रखने वाली बात है कि अगर मजिस्ट्रेट ने क्षमा-दान करने के पीछे के कारण का उल्लेख अपने आदेश में नहीं किया तो मजिस्ट्रेट का यह पूरा आदेश इसी आधार पर निष्क्रिय किया जा सकता है [देखें उत्तर प्रदेश राज्य बनाम कैलाश नाथ अग्रवाल, (1973) 1 SCC 751]।
धारा 306 (3) (b) में भले ही आरोपी को उसके आवेदन पर क्षमा-दान के रिकॉर्ड की कॉपी देनी होगी लेकिन एक आरोपी क्षमा-दान पर सवाल उठा नहीं सकता है [देखें राय अम्ब्रीश बनाम पश्चिम बंगाल राज्य 2003 Cri LJ 3830 (Cal)]

जिस समय एक आरोपी को क्षमा किया जाता है, उसे आरोपों से मुक्ति दे दी जाती है और वह अभियोजन का गवाह बन जाता है। उसे डिस्चार्ज करने का कोई औपचारिक आदेश आवश्यक नहीं है। (ए. जे. पीरिस बनाम मद्रास राज्य - AIR 1954 SC 616)
Accomplice के अभियोजन गवाह बनने के बाद की प्रक्रिया

जब धारा 303 (3) दंड प्रक्रिया संहिता के तहत एक मजिस्ट्रेट क्षमा-दान करता है तो वही मजिस्ट्रेट धारा 306 (4) (a) दंड प्रक्रिया संहिता के तहत उस व्यक्ति को गवाह के रूप में जांचे, ऐसा आवश्यक नहीं है। इसका सीधा सा मतलब है की यदि किसी Accomplice ने धारा 306 (1) दंड प्रक्रिया संहिता के तहत निर्दिष्ट शर्त को स्वीकार कर लिया है और वह अप्रूवर बन गया है तो, उसे धारा 306 (4) (a) दंड प्रक्रिया संहिता के तहत गवाह के रूप में जांचना आवश्यक है। और यह जांच, अपराध का संज्ञान लेने के लिए उपयुक्त मजिस्ट्रेट के समक्ष और मामले का विचरण करने वाले या विचारण के लिए भेजने वाले मजिस्ट्रेट द्वारा किया जा सकता है।
आइये समझते हैं धारा 306 (4) (a) दंड प्रक्रिया संहिता
(4) प्रत्येक व्यक्ति जो उप - धारा (1) के तहत किए गए क्षमा-दान को स्वीकार करता है -
(a) अपराध का संज्ञान लेने वाले मजिस्ट्रेट (और अगर आगे कोई विचारण होगा तो उसमें) द्वारा उस व्यक्ति की एक गवाह के रूप में जांच की जाएगी;
उदहारण के तौर पर, यदि कोई मामला JFCM द्वारा ट्रायल योग्य है और मामले में अन्वेषण लंबित है, तो क्षमा केवल CJM/MM द्वारा निविदा की जा सकती है। लेकिन CJM/MM धारा 164 सीआरपीसी के तहत अप्रूवर के कबूलनामे को दर्ज करने का कार्य JFCM को सौंप सकते हैं। CJM/MM, इसके बाद जब पुलिस द्वारा अपेक्षित हो, JFCM द्वारा दर्ज किए गए बयान पर विचार करके धारा 306 (3) दंड प्रक्रिया संहिता के संदर्भ में एक इस बाबत जानकारी दर्ज कर सकते हैं। CJM/MM द्वारा क्षमा-दान करने की इस शक्ति का उपयोग उनके द्वारा तब भी किया जा सकता है जब JFCM द्वारा विचारणीय केस JFCM के समक्ष जांच या विचरण के लिए लंबित हो। धारा 306 (3) दंड प्रक्रिया संहिता के तहत जानकारी दर्ज करने के बाद CJM/MM, JFCM को धारा 306 (3)दंड प्रक्रिया संहिता के तहत जानकारी सहित पूरे रिकॉर्ड को अग्रेषित करना चाहिए। धारा 306 (4) (a) दंड प्रक्रिया संहिता के तहत गवाह के रूप में अप्रूवर का परिक्षण JFCM द्वारा अपराध का संज्ञान लेते हुए कार्रवाई की जाएगी।
दूसरे शब्दों में, यदि क्षमा-दान को अनुमोदनकर्ता (अप्रूवर) द्वारा स्वीकार कर लिया गया है, तो उस व्यक्ति की धारा 306 (4) दंड प्रक्रिया संहिता के मद्देनजर अपराध के संज्ञान लेने और बाद के मुकदमे में उसकी, मजिस्ट्रेट की अदालत में गवाह के रूप में जांच की जानी चाहिए।
इसके आगे की प्रक्रिया

जहाँ किसी व्यक्ति ने उप-धारा (1) के तहत की गई क्षमा की निविदा स्वीकार कर ली है और उप-धारा (4) के तहत उसकी जांच की गई है, तो अपराध का संज्ञान लेने वाला मजिस्ट्रेट, मामले में कोई और जाँच किए बिना , -
(ए) विचारण के लिए प्रतिबद्ध करेगा-
(i) सत्र न्यायालय को, यदि अपराध उस न्यायालय द्वारा विशेष रूप से विचरण योग्य है या यदि संज्ञान लेने वाला मजिस्ट्रेट मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट है;
(ii) आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम, 1952 (1952 का 46) के तहत नियुक्त विशेष न्यायाधीश की अदालत में, यदि अपराध उस अदालत द्वारा विशेष रूप से विचरण योग्य है;
(ख) किसी अन्य मामले में, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को मामला सौंपना चाहिए जो स्वयं मामले का विचारण करेगा।
मामले की सुपुर्दगी (Commitment) के बाद की स्थिति में क्षमा-दान
किसी मामले की सुपुर्दगी के बाद, किसी भी समय लेकिन निर्णय पारित होने से पहले, जिस न्यायालय को मामला सुपुर्द किया जाता है, वह इस दृष्टिकोण से, की किसी व्यक्ति से उस मामले के साक्ष्य हासिल किये जा सकें जिससे वह व्यक्ति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संबंधित है या निजी तौर पर किसी भी अपराध में सम्मिलित रहा है, ऐसे व्यक्ति को इस शर्त पर क्षमा-दान दे सकता है। [देखें धारा 307 दंड प्रक्रिया संहिता]
धारा 307 के तहत, न्यायालय की वह शक्ति जिसे मामला सुपुर्द किया जाता है, धारा 306 दंड प्रक्रिया संहिता में निहित प्रावधानों से स्वतंत्र है। हालाँकि धारा 307 दंड प्रक्रिया संहिता में उल्लिखित शर्त, धारा 306 (1) दंड प्रक्रिया संहिता में निर्धारित शर्त को संदर्भित करती है, अर्थात्, जिस व्यक्ति के पक्ष में क्षमा-दान दिया गया है, वह अपने ज्ञान के अंतर्गत पूरी परिस्थितियों का पूर्ण और सच्चा खुलासा करेगा [देखें संतोष कुमार सतीश भूषण बरियार बनाम महाराष्ट्र राज्य - (2009) 6 एससीसी 498 मामला]।
अप्रूवर द्वारा दिए गए साक्ष्य की वैधता एवं विश्वसनीयता

किसी गवाह की विश्वसनीयता के बारे में सामान्य परीक्षणों को लागू करके, साक्ष्य की विश्वसनीयता निर्धारित की जानी चाहिए। (ए. पी. बनाम चेमलापति गणेश्वर राव AIR 1963 SC 1696)। साक्ष्य अधिनियम की धारा 133 के अनुसार जो कानून का एक नियम है, बताता है की एक Accomplice सबूत देने के लिए सक्षम है।
साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 के अनुसार उदाहरण (बी) के अनुसार जो एक नियम है कि अकेले Accomplice की गवाही पर अभियुक्त को दोषी ठहराना लगभग हमेशा असुरक्षित होता है। हालांकि एक Accomplice की गवाही पर एक अभियुक्त की सजा को अवैध नहीं कहा जा सकता है, हालाँकि ऐसे मामलों में उचित सावधानी बरती जानी चाहिए (देखें भिवा डोलु पाटिल बनाम महाराष्ट्र राज्य - AIR 1963 SC 599)।
एक अप्रूवर के मामले में लागू किया जाने वाला एक नियम यह भी है की उसके द्वारा दिए गए साक्ष्य की पर्याप्त रूप से पुष्टि की जानी चाहिए (देखें लच्छी राम बनाम पंजाब राज्य - AIR 1967 SC 792 मामला)।
क्षमा-दान की शर्तों का पालन न करने के परिणाम

यदि एक अप्रूवर जिसे धारा 306 अथवा 307 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत क्षमा-दान दिया गया है और यदि वह व्यक्ति क्षमा-दान की शर्तों का पालन नहीं करता है, गलत साक्ष्य देता है या जानबूझकर कोई चीज़ छुपता जो उसे 306 (1) दंड प्रक्रिया संहिता के सापेक्ष बतानी चाहिए, और लोक अभियोजक धारा 308 (1) दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत इस बाबत सर्टिफिकेट देता है तो ऐसे व्यक्ति को उस अपराध हेतु, जिसके लिए उस क्षमा-दान दिया गया था या उससे जुड़े किसी अपराध के लिए एवं झूठे साक्ष्य देने के लिए (हाई-कोर्ट की पूर्व स्वीकृति से) उसके खिलाफ विचरण किया जा सकता है।
एक बार जब लोक-अभियोजक द्वारा दिए गए प्रमाण पत्र पर व्यक्ति से क्षमा-दान वापस ले लिया जाता, तो वह अभियुक्त की स्थिति में वापस कर दिया जाता है। वह अलग से उत्तरदायी हो जाता है और सबूत, यदि कोई है, तो वह सबूत सह-अभियुक्त के खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जाता है। हालांकि इस तरह के सबूत का उपयोग, इस व्यक्ति के खिलाफ (जिसे क्षमा-दान दिया गया था) अलग मुक़दमे में किया जा सकता है, जहाँ उसे यह दिखाने का अवसर मिलता है कि उसने क्षमा की शर्त का अनुपालन किया था। इस सम्बन्ध में धारा 308 दंड प्रक्रिया संहिता को पढ़ा जा सकता है।
अंत में, यह कहना आवश्यक है की क्षमा-दान का प्रावधान गंभीर अपराधों को उजागर करने एवं न्याय दिलाने में मुख्य रूप से सहायक होते हैं। इन प्रावधानों के चलते किसी व्यक्ति को यह मौका मिलता है कि वह सामने आकर किसी अपराध से जुड़े साक्ष्य देने में अदालत की मदद करे एवं इसके बदले वो कुछ लाभ भी उठाये।
इन प्रावधानों के पीछे का प्रमुख मकसद, यह सुनिश्चित करना था कि जघन्य और गंभीर अपराधों के अपराधी, बिना सजा बचकर न निकल जाएं। क्षमा-दान का आधार उस व्यक्ति की दोषीता का परिमाण नहीं है, जिसे क्षमा प्रदान किया जा रहा है, बल्कि इसका उद्देश्य जघन्य अपराधों के मामले में, सबूतों के अभाव में अपराधियों को सजा से बचने से रोकना है।