घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं के अधिकार एवं संरक्षण अधिनियम (भाग-1)

घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं के अधिकार एवं संरक्षण अधिनियम (भाग-1)

इक्कीसवीं शताब्दी के उन्नीसवें वर्ष में दाखिल होने के बाद भी भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में कोई कमी नहीं आई है| देश के किसी भी कोने से कोई भी अखबार उठा कर देख लीजिये, महिलाओं के खिलाफ अपराध की कोई ना कोई खबर अवश्य पढने को मिल जाएगी| व्यथा तो यह है कि बाहर तो दूर, महिलाएं अपने घर की चारदीवारी में भी अपराधों का शिकार हो जाती हैं| महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा के मामले भी आये दिन सामने आते हैं| वर्ष 2005 से पूर्व घरेलू हिंसा के खिलाफ महिलाओं के पास आपराधिक मामला दर्ज़ करने का अधिकार था| ऐसे मामलों में भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 498A के अंतर्गत कार्यवाही होती थी| 2005 में 'घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं का संरक्षण अधिनियम' पारित हुआ जिसमें कई नए तरीके के अधिकार महिलाओं को दिए गए| धारा 498A का उद्देश्य अपराधी को दण्डित करना है जबकि घरेलू हिंसा अधिनियम का उद्देश्य पीड़ित महिला को रहने की जगह, गुजारा भत्ता, इत्यादि दिलाना है| घरेलू हिंसा अधिनियम पूर्णतया गैर अपराधिक ढंग का कानून है| घरेलू हिंसा अधिनियम का सबसे बड़ा फायदा ये हुआ है की जो महिलाएं पारिवारिक या सामजिक दवाब एवं पुलिस थाने के चक्करों से बचने के कारण अपराधिक कार्यवाही नहीं चाहती हैं वे अब अपने लिए प्रभावी संरक्षण का उपाय कर सकती हैं|

तो आइये जानते है इस अधिनियम के मुख्य बिंदु-

घरेलू हिंसा क्या है?

अधिनियम की धारा 3 के अंतर्गत घरेलू हिंसा को बहुत विस्तृत परिभाषा दी गई है| निम्नलिखित कार्य घरेलू हिंसा की परिभाषा में आते हैं-

  • शारीरिक हिंसा- कोई ऐसा कार्य या आचरण जो महिला शारीरिक पीड़ा, स्वास्थ्य या शरीर को खतरा या महिला के स्वास्थ या शारीरिक विकास को हानि पहुँचाता है वो महिला का शारीरिक हिंसा माना जायेगा| महिला के ऊपर हमला या अपराधिक बल का प्रयोग भी शारीरिक हिंसा माना जायेगा| उदाहरण स्वरुप- महिला के साथ मारपीट करना, बीमार महिला का इलाज न करवाना, इत्यादि|
  • लैंगिक हिंसा- कोई ऐसा कार्य या आचरण तो लैंगिक तरीके से महिला का अपमान या तिरस्कार करता हो अथवा महिला की गरिमा को हानि पहुंचता हो वो लैंगिक हिंसा माना जायेगा| जबरन सम्भोग और वैवाहिक बालात्कार भी लैंगिक हिंसा के दायरे में आयेंगे|
  • मौखिक और भावनात्मक हिंसा- महिला का अपमान या उपहास या तिरस्कार करना और लड़का या संतान न होने को लेकर अपमान करना या उपहास करना मौखिक और भावनात्मक हिंसा माना जायेगा| महिला से गाली गलौज करना, अभद्र भाषा का प्रयोग करना या उसके रिश्तेदारों को नुकसान पहुँचाने की धमकी देना भी इस दायरे में आएगा|
  • आर्थिक दुरुपयोग- किसी भी वित्तीय या आर्थिक संसाधन जिसकी महिला कानूनन रूप से हक़दार या स्त्रीधन या संयुक्त स्वामित्व वाली संपत्ति इत्यादि से महिला को वंचित करना आर्थिक हिंसा माना जायेगा| आसान शब्दों में समझा जाए तो कोई भी ऐसी संपत्ति जिसमे महिला का मालिकाना हक हो उसे बेचना या aमहिला का मालिकाना हक समाप्त करना भी इसी दायरे में आएगा| ऐसे किसी संसाधन या सुविधा से महिला को वंचित करना या इस्तेमाल में बाधा उत्पन्न करना जिसके इस्तेमाल के लिए महिला हक़दार है, ऐसे कार्य भी इसी दायरे में आते हैं| उदाहरण स्वरुप- साझी गृहस्थी में महिला को पानी, बिजली इत्यादि के उपयोग से रोकना|
  • दहेज़ की मांग- दहेज़ या किसी मूल्यवान संपत्ति की गैर कानूनी मांग करना भी घरेलू हिंसा के दायरे में आता है| इस सम्बन्ध में महिला को क्षति पहुँचाना या उत्पीडन करना भी घरेलू हिंसा के दायरे में आता है| इस सम्बन्ध में महिला के रिश्तेदारों को धमकाने की दृष्टी से महिला का उत्पीडन करना भी घरेलू हिंसा के दायरे में आता है|

अन्य किसी तरीके से महिला को मानसिक या शारीरिक क्षति पहुँचाना भी घरेलू हिंसा के दायरे में आता है|

पीड़ित महिला कौन है?

घरेलू हिंसा अधिनियम केवल शादीशुदा महिलाओं के लिए नहीं बल्कि किसी भी महिला पर लागू होता है| बहनें, माता, भाभी, इत्यादि रिश्तों से जुडी महिलाएं भी इस अधिनियम के तहत पीड़ित महिला की परिभासा में आती हैं| कोई भी महिला जो किसी भी पुरुष के साथ घरेलू सम्बन्ध में रहती हो या रह चुकी हो और घरेलू हिंसा का शिकार हो वो इस अधिनियम के तहत किसी भी समाधान या राहत की मांग कर सकती है| अधिनियम के अंतर्गत घरेलू सम्बन्धका मतलब है की दो व्यक्ति जो एक ही घर में रहते हो या रह चुके हों और रक्त सम्बन्ध, विवाह या एडॉप्शन का रिश्ता रखते हों वे घरेलू सम्बन्ध में माने जायेंगे| संयुक्त परिवार जो एक ही घर में रहता हो वो भी इस परिभाषा के अंतर्गत आएगा| लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिला भी घरेलू हिंसा के खिलाफ इस अधिनियम के अंतर्गत अपने अधिकारों की मांग कर सकती है| सुप्रीम कोर्ट ने 2010 में डी. वेलुसामी बनाम डी. पत्चैअम्मल मामले में इस बात की पुष्टि की है|

किसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई जा सकती है?

अधिनियम के अंतर्गत पीड़ित महिला किसी भी व्यस्क पुरुष के खिलाफ शिकायत दर्ज करा सकती है जिसके साथ वो घरेलू सम्बन्धमें रही हो या रहती हो| शादीशुदा महिला या लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिला अपने पति या लिव इन पार्टनर या उसके रिश्तेदारों के खिलाफ शिकायत दर्ज करा सकती है| रिश्तेदारों में पुरुष एवं महिला रिश्तेदार दोनों सम्मिलित हैं| घरेलू हिंसा में सम्मिलित व्यक्ति को प्रत्यर्थी या प्रतिवादी बोलते हैं|

किसके द्वारा और किसे दर्ज करायी जाये शिकायत?

घरेलू हिंसा की शिकायत का अधिकार केवल पीड़ित महिला को ही नहीं है| पीड़ित महिला की ओर से कोई भी व्यक्ति इसके खिलाफ शिकायत दर्ज करवा सकता है| पीड़ित महिला के अलावा उसका कोई भी रिश्तेदार, सामजिक कार्यकर्ता, NGO, पडोसी, इत्यादि भी महिला की ओर से शिकायत दर्ज करवा सकते हैं|

शिकायत दर्ज करने के लिए यह ज़रूरी नहीं है की घरेलू हिंसा की घटना हो चुकी हो| अगर किसी को यह अंदेशा है की किसी महिला के ऊपर घरेलू हिंसा की जा सकती है तो इसकी भी शिकायत दर्ज करवाई जा सकती है|

इसके अलावा राष्ट्रीय महिला आयोग की वेबसाइट http://ncwapps.nic.in/onlinecomplaintsv2/ पर भी शिकायत दर्ज करवाई जा सकती है| इस वेबसाइट पर शिकायत पंजीकरण करने के साथ ही शिकायत की स्तिथि भी जांच सकते हैं| इसके अलावा 1091 पर भी कॉल करके इसकी शिकायत करी जा सकती है|

घरेलू हिंसा की समाधान प्रक्रिया में सरकारी अधिकारियों के अलावा कुछ संस्थाएं भी शामिल होती हैं| समाधान प्रक्रिया की शुरुआत शिकायत से की जाती है| घरेलू हिंसा की शिकायत किसी भी पुलिस अधिकारी, संरक्षण अधिकारी, मजिस्ट्रेट और सेवा प्रदाता के समक्ष की जा सकती है| सेवा प्रदाता वे स्वैच्छिक संस्थाएं एवं कंपनियां हैं जो महिलाओं के हित में कार्य करने के लिए रजिस्टर्ड हैं और अधिनियम के अंतर्गत सेवा रादाता के रूप में रजिस्टर्ड हैं| सेवा प्रदाता के पास घरेलू हिंसा रिपोर्ट बनाने का, पीडिता की चिकित्सीय जांच करने का और पीड़ित महिला को आश्रय दिलाने का अधिकार होता है| मजिस्ट्रेट से आशय है की कोई भी न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम वर्ग जिसके कार्य क्षेत्र के अधीन हिंसा करने वाला व्यक्ति निवास करता हो या जिसके कार्य क्षेत्र के अधीन हिंसा की घटना घटित हुयी हो| संरक्षण अधिकारीइस अधिनियम के अंतर्गत नियुक्त किये जाते हैं और सामान्यतः हर जिले में एक संरक्षण अधिकारी अवश्य होता है|

पुलिस अधिकारी, मजिस्ट्रेट और सेवा प्रदाता के कर्त्तव्य

जब उपरिलिखित कोई भी व्यक्ति घरेलू हिंसा की कोई शिकायत प्राप्त करता है तो उसके निम्नलिखित कर्त्तव्य हैं-

  • पीड़ित महिला को उसके अधिकारों की जानकारी देना जैसे निवास स्थान का अधिकार, गुजारे भत्ते का अधिकार, क्षतिपूर्ति का अधिकार, संरक्षण का अधिकार और बच्चों की कस्टडी का अधिकार|
  • पीड़ित महिला को उसके निशुल्क कानूनी और विधिक सहायता के अधिकार से अवगत कराना|
  • धारा 498A के अंतर्गत अपराधिक मुकदमा दर्ज करवाने के अधिकार से अवगत कराना|
  • पीड़ित महिला को संरक्षण और सेवा प्रदाताओं की उपलब्धता से अवगत कराना|

संक्षेप में कहा जाए तो घरेलू हिंसा अधिनियम एक सिविल (गैर अपराधिक) क़ानून है| इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति को सज़ा देना नहीं है बल्कि पीड़ित महिला को त्वरित राहत दिलाना है| इसका उद्देश्य पीड़ित महिला की समस्याएं जैसे आर्थिक समस्याएं, रहने की समस्या, सुरक्षा की समस्या, इत्यादि का समाधान करना है| इसके अलावा जानने की बात यह है की घरेलू हिंसा का पैमाना शारीरिक प्रताड़ना से बढ़कर है| मानसिक प्रताड़ना, आर्थिक दुरुपयोग और भावनात्मक उत्पीडन भी इसी दायरे में आते हैं| एक ख़ास बात यह भी है कि अधिनियम के अंतर्गत केवल शादीशुदा महिला या पत्नियां ही नहीं बल्कि बाकी महिला रिश्तेदार भी राहत की मांग कर सकती हैं|

नोट- ये लेख घरेलू हिंसा श्रृंखला का भाग 1 है| भाग 2 में विभिन्न प्रकार के आदेश एवं पीड़ित महिला के अधिकारों के बारे में जानकारी दी जाएगी|

लेखक मयंक साहू डॉ राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, लखनऊ के छात्र हैं|