बीते दिनों सीबीआई में हुई उठापटक की सारी जानकारी जानिए संक्षेप में

बीते दिनों सीबीआई में हुई  उठापटक की सारी जानकारी जानिए संक्षेप में

सीबीआई में पिछले 3 महीनों से उठापटक का दौर चलता रहा। इस पूरे प्रकरण को संक्षेप में समझाने का यह हमारा प्रयास है। आइये समझते हैं यह पूरा मामला।

12 जुलाई 2018: केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) ने एक मीटिंग बुलाई जिसमे सीबीआई के अंदर प्रमोशन पर विचार विमर्श होना था। उस मीटिंग में अस्थाना को सीबीआई के नंबर 2 के अधिकारी के रूप में बुलाया गया। इस समय अलोक वर्मा विदेश दौरे पर थे, जब उन्हें इस बारे में जानकारी मिली तो उन्होंने सीवीसी को लिखा कि उन्होंने अस्थाना को अपनी ओर से इन बैठकों में भाग लेने के लिए अधिकृत नहीं किया है।

अगस्त 24 2018: अस्थाना ने सीवीसी और कैबिनेट सचिव को लिखते हुए वर्मा द्वारा कथित भ्रष्टाचार का विवरण दिया। अस्थाना ने पत्र में, वर्मा के करीबी और सीबीआई में अतिरिक्त निदेशक, ए. के. शर्मा द्वारा मिलकर कई आरोपी व्यक्तियों को बचाने के उनके प्रयासों का विवरण भी दिया। अस्थाना ने दावा किया कि हैदराबाद के व्यवसायी सतीश बाबू सना ने मोइन कुरैशी मामले में खुद को बचाने के लिए वर्मा को करोड़ों रुपये का भुगतान किया था।

सितम्बर-अक्टूबर 2018 में अस्थाना ने एक बार फिरसे सीवीसी को पत्र लिखकर कहा कि वो मोईन कुरैशी मामले में सना को गिरफ़्तार करना चाहते हैं पर वर्मा ऐसा होने नहीं दे रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि फरवरी 2018 में भी, जब उनकी टीम ने सना से पूछताछ करने की कोशिश की, तो वर्मा का फोन आया और उन्होंने ऐसा न करने के निर्देश दिए थे।

हालाँकि वर्मा की ओर से भी अस्थाना के खिलाफ कई कदम उठाये गए। अस्थाना द्वारा दिल्ली सरकार मामले, IRCTC घोटाला, पी चिदंबरम के खिलाफ जांच की जा रही थी, वर्मा के निर्देश पर इन सभी मामलों को अस्थाना से छीन कर शर्मा को सौंप दिया गया।

04 अक्टूबर 2018: सीबीआई ने सतीश बाबू सना को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया, और सना ने अपने बयान में यह दावा किया उसने 10 महीने की अवधि में अस्थाना को 3 करोड़ रुपये का भुगतान किया है। सना ने पुलिस उपाधीक्षक सीबीआई अधिकारी, देवेंद्र कुमार को भी रिश्वत देने की बात कही। बाद में देवेंद्र कुमार को गिरफ़्तार भी कर लिया गया।

15 अक्टूबर, 2018: वर्मा ने अस्थाना (सीबीआई में नंबर 2 के अधिकारी) के खिलाफ मामला दर्ज किया। उनपर यह आरोप लगा कि उन्होंने एक व्यापारी को, जिसके खिलाफ सीबीआई की जांच चल रही थी, राहत देने और बदले में क्लीन चिट देने हेतु रिश्वत के रूप में 3 करोड़ रुपये लिए। इन आरोपों के ठीक बाद, अस्थाना ने अपने ऊपर लगाए गए सभी आरोपों का खंडन किया और उल्टा अलोक वर्मा पर यह हमला किया कि उन्होने उसी व्यवसायी से 2 करोड़ रुपये की रिश्वत ली है। उनका यह भी कहना था कि वर्मा ने राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव के खिलाफ भी जांच रोकने की कोशिश की थी।

22 अक्टूबर 2018: वर्मा बनाम अस्थाना मामला एक अजूबे मोड़ पर पहुंच गया। दरअसल सीबीआई ने नई दिल्ली में अपने स्वयं के मुख्यालय की 10वीं मंजिल पर छापा मारा।

23 अक्टूबर 2018: अस्थाना ने सीबीआई द्वारा अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द करवाने के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख किया। दिल्ली उच्च न्यायालय ने सीबीआई को अपने विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के खिलाफ कोई भी कठोर कार्रवाई करने से रोक दिया, कोर्ट ने अगली सुनवाई की तारीख 29 अक्टूबर तक यथास्थिति बनाए रखने का आदेश भी दिया।

23-24 अक्टूबर (रात): केंद्र सर्कार द्वारा वर्मा और अस्थाना को छुट्टी पर जाने के लिए कहा गया। वर्मा ने इस सरकारी आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। केंद्र सरकार ने वर्मा के स्थान पर एम. नागेश्वर राव, आईपीएस को सीबीआई निदेशक का प्रभार दे दिया। कैबिनेट की नियुक्ति समिति ने संयुक्त निदेशक एम. नागेश्वर राव को तत्काल प्रभाव से जांच एजेंसी के अंतरिम निदेशक के रूप में नियुक्त करदिया।

वर्मा को निदेशक पद से हटाने के पीछे का तर्क

वर्मा को हटाते हुए कहा गया कि, सीवीसी को 24 अगस्त, 2018 को एक शिकायत प्राप्त हुई जिसमे CBI के वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ विभिन्न आरोप थे। इसी क्रम में 11 सितंबर, 2018 को तीन अलग-अलग नोटिस (CVC अधिनियम, 2003 की धारा 11 के तहत) निदेशक को दी गयी और उनसे इस सम्बन्ध में आयोग के समक्ष पेपर और डॉक्यूमेंट पेश करने के लिए कहा गया। यह फाइलें और दस्तावेज, 14 सितंबर, 2018 को आयोग के समक्ष पेश किये जाने थे।

सीवीसी का कहना है कि कई बार नोटिस भेजे जाने के बावजूद, सीबीआई निदेशक की ओर से कोई जवाब नहीं आया। इसके पश्च्यात सीवीसी ने यह माना कि सीबीआई निदेशक, गंभीर आरोपों से संबंधित आयोग द्वारा मांगे गए रिकॉर्ड/फाइलें उपलब्ध कराने में सहयोग नहीं कर रहे हैं।

असाधारण परिस्थितियों को देखते हुए, DPSE (CBI) की कार्यप्रणाली पर अधीक्षण की अपनी शक्तियों (CVC अधिनियम, 2003 की धारा 8) की कवायद में केंद्रीय सतर्कता आयोग द्वारा, जहाँ तक की इसकी जाँच, भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम, 1988 के तहत किए गए अपराध से संबंधित है, श्री आलोक कुमार वर्मा, निदेशक, सीबीआई और श्री राकेश अस्थाना, को उनके कार्यभार से मुक्त करने के आदेश पारित किये गए।

इसके बाद भारत सरकार ने सीवीसी द्वारा उपलब्ध कराई गई सामग्री का सावधानीपूर्वक परीक्षण और मूल्यांकन किया और सरकार इस बात को लेकर संतुष्ट हो गयी की सीबीआई में असाधारण स्थिति उत्पन्न हुई है, जो यह मांग करती है कि भारत सरकार डीपीएसई की धारा 4 (2) के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करे। इन शक्तियों का प्रयोग करते हुए वर्मा और अस्थाना को उनके पद से हटा दिया गया।

आगे यह भी कहा गया कि यह कदम एक अंतरिम उपाय के रूप में उठाया गया है और जब तक कि सीवीसी उन सभी मुद्दों पर अपनी जांच समाप्त नहीं कर देता है, जिन्होंने वर्तमान में असाधारण स्थिति को जन्म दिया है, तबतक यह आदेश जारी रहेगा।

सुप्रीम कोर्ट में दी गयी ये दलीलें

सुप्रीम कोर्ट में अपनी याचिका में वर्मा ने कहा कि सीबीआई निदेशक की नियुक्ति एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति द्वारा की जाती है जिसमें डीपीएसई अधिनियम की धारा 4 ए के अनुसार प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल होते हैं। सीबीआई निदेशक के स्थानांतरण के लिए, इस समिति की स्वीकृति आवश्यक है (धारा 4 बी (2)) के अनुसार। आगे यह भी कहा गया कि उनके स्थानांतरण का आदेश, इस समिति को दरकिनार करते हुए पारित किया गया है। एनजीओ, कॉमन कॉज ने भी ऐसे ही तर्कों के साथ एक याचिका दायर की।

अदालत ने वर्मा के खिलाफ सीवीसी की चल रही जांच की निगरानी के लिए पूर्व शीर्ष अदालत के न्यायाधीश ए. के. पटनायक को नियुक्त किया था। वर्मा की याचिका पर केंद्र और सीवीसी को नोटिस जारी करने के अलावा, शीर्ष अदालत ने 26 अक्टूबर को सीबीआई निदेशक के खिलाफ प्रारंभिक जांच पूरी करने के लिए सीवीसी को दो सप्ताह की समय सीमा में रिपोर्ट दाखिल करने को कहा था। अदालत ने आईपीएस अधिकारी, एम. नागेश्वर राव को, जिन्हे सीबीआई निदेशक का अंतरिम प्रभार मिला था, कोई भी बड़ा फैसला लेने से रोक दिया था।

जब सीवीसी की यह रिपोर्ट अदालत के समक्ष पेश हुई तो मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि, "सीवीसी ने दस्तावेजों के साथ अपनी रिपोर्ट दर्ज की है। न्यायमूर्ति (ए. के.) पटनायक (सेवनिर्वित्त), जिन्हें जांच का पर्यवेक्षण करने के लिए कहा गया था, अपने नोट में कहते हैं कि आलोक कुमार वर्मा, विशिष्ट तारीखों पर उपस्थित हुए थे और यह उनकी उपस्थिति में हुआ। रिपोर्ट को चार बिंदुओं में वर्गीकृत किया जा सकता है- कुछ आरोपों पर, यह पूरक है, कुछ पर, इतनी पूरक नहीं है, कुछ पर, यह बिलकुल भी पूरक नहीं है, और दूसरे मुद्दों पर, आगे जांच की आवश्यकता है।

वर्मा के लिए उपस्थित हुए वकील फली एस. नरीमन ने यह दलील दी कि सीबीआई निदेशक को पीएम पैनल की स्वीकृति के बिना हटाया नहीं जा सकता था और चूँकि सीबीआई निदेशक का पद 2 वर्ष के सुरक्षित होता है, और फिर भी अगर स्थानांतरण की स्थिति उत्पन्न होती है तो उसके लिए पीएम हाई पावर पैनल को इसपर निर्णय लेना होगा।

केंद्र की ओर से पेश हुए AG, के. के वेणुगोपाल ने अदालत में यह दलील दी की यह दावा करना पूरी तरह से अनुचित था कि वर्मा को 'स्थानांतरित' कर दिया गया है क्योंकि अगर कोई पूछता है कि सीबीआई निदेशक कौन है तो जवाब 'आलोक वर्मा' है। बस यह हुआ है कि उनकी शक्तियों और कार्यों को फ़िलहाल वापस ले लिया गया है ताकि इस मामले में निष्पक्ष जांच हो सके (सीवीसी द्वारा)।

विपक्ष में सबसे बड़ी पार्टी के नेता, मल्लिकार्जुन खड़गे भी इस मामले को लेकर शीर्ष अदालत पहुंच थे। खड़गे, जो तीन सदस्यीय वैधानिक समिति (पीएम हाई पावर पैनल) में भी है, ने कहा कि 23 अक्टूबर के आदेश डीएसपीई अधिनियम की धारा 4 ए और 4 बी के तहत वैधानिक समिति द्वारा प्रदान की गई शक्तियों के उल्लंघन में पारित किए गए थे, जो यह प्रावधान करता है कि सीबीआई निदेशक, पैनल की सिफारिशों पर नियुक्त होता है और उसका स्थानांतरण भी इसी पैनल की सहमति से किया जाएगा।

दोनों पक्षों को सुनने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने 6 दिसंबर को इस मामले पर फैसला सुरक्षित रखा था।

और फिर आया यह फैसला

फिर 8 जनवरी 2019 को एक अहम आदेश में 23-24 अक्टूबर 2018 की रात को सीबीआई निदेशक के रूप में आलोक वर्मा के "रातोंरात" छुट्टी पर भेजे जाने के केंद्र सरकार और सीवीसी के आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर उन्हें संस्थान के निदेशक पद पर फिर से बहाल कर दिया था। हालांकि पीठ ने कहा था कि हाईपावर कमेटी का फैसला आने तक वर्मा, निदेशक में तौर पर कोई भी बड़ा नीतिगत व संस्थानिक फैसला या नया कदम नहीं उठाएंगे।

फैसला सुनाते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अगुवाई वाली तीन जजों की पीठ ने कहा कि क़ानून न तो सरकार को और न ही केंद्रीय सतर्कता आयोग को यह अधिकार देता है कि वो सीबीआई प्रमुख के कार्यकाल में बाधा पहुंचाएं। ये फैसला मुख्य न्यायाधीश गोगोई द्वारा लिखा गया जो फैसले वाले दिन छुट्टी पर थे। जस्टिस एस। के। कौल और जस्टिस के। एम। जोसेफ ने खुली अदालत में यह फैसला सुनाया था। न्यायमूर्ति कौल ने इस फैसले के अंश पढ़े।

फैसले में वर्मा के उस तर्क को सही ठहराया गया था जिसमे उन्होंने कहा था कि उन्हें प्रधान मंत्री, भारत के मुख्य न्यायाधीश और विपक्ष के नेता की उच्चाधिकार प्राप्त समिति की, जिसे डीएसपीई अधिनियम के तहत सीबीआई निदेशक की नियुक्ति की सिफारिश करने का वैधानिक अधिकार है, पूर्वानुमति के बिना सीबीआई के निदेशक पद से हटाया नहीं जा सकता है। क़ानून ने न तो सीवीसी को और न ही सरकार को उनके कार्यों और कर्तव्यों से विमुख करने की शक्ति दी है।

कोर्ट ने यह भी कहा था कि वर्मा पर फैसला करने के लिए उच्चाधिकार प्राप्त समिति को एक सप्ताह के भीतर बैठक करनी है। अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि डीएसपीई अधिनियम में संशोधन करने और सीबीआई निदेशक की नियुक्ति की सिफारिश करने के लिए पीएम पैनल को सशक्त बनाने के पीछे की विधायी मंशा, राज्य और राजनीतिक दबाव से सीबीआई के कामकाज को मुक्त करना है।

इस बीच कोर्ट ने डीएसपीई एक्ट के अनुसार सीबीआई निदेशक के 'स्थानांतरण' की व्याख्या को भी विस्तारित कर दिया था, जिसका अर्थ है उनकी शक्तियों को सीमित करना। अधिनियम की धारा 4 में उनके वैधानिक दो साल के कार्यकाल समाप्त होने से पहले, सीबीआई से स्थानांतरित करने के लिए पीएम पैनल की पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता है। उनके कार्यकाल में कोई भी बदलाव, चाहे सीबीआई निदेशक का स्थानांतरण हो या उनका अधिकार सीमित करने का कदम हो, पीएम पैनल की पूर्व स्वीकृति के साथ ही लिया जाएगा।

फिर हुई पीएम पैनल की बैठक (10-01-2019)

सुप्रीम कोर्ट के बहाल करने के कुछ ही घंटे बाद आलोक वर्मा को सीबीआई के निदेशक पद से हटा दिया गया। प्रधान मंत्री, सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस ए के सीकरी और विपक्ष में सबसे बड़ी पार्टी के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे की उच्चाधिकार प्राप्त समिति ने गुरुवार को हुई मीटिंग में ये फैसला लिया।

हालांकि खड़गे की राय इस मामले में अलग रही। इससे पहले आलोक वर्मा पर फैसले के लिए प्रधानमंत्री और नेता विपक्ष की हाई पावर कमेटी की बैठक में चीफ जस्टिस ने सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठता में दूसरे क्रम के जज जस्टिस ए के सीकरी को नामांकित किया था। समझा जाता है कि चीफ जस्टिस ने इसलिए ये फैसला किया है क्योंकि उन्होंने आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजे जाने का फैसला सुनाया था।

अलोक वर्मा ने दिया इस्तीफ़ा (11-01-2019)

हाई पावर कमेटी द्वारा सीबीआई निदेशक के पद से हटाए जाने के बाद आलोक वर्मा ने इस्तीफा दे दिया। हालांकि कमेटी ने उन्हें फायर सेफ्टी, सिविल डिफेंस व होम गार्डस का महानिदेशक बनाया गया था और 31 जनवरी को वो रिटायर होने वाले थे। DoPT के सचिव को लिखे अपने इस्तीफे में वर्मा ने कहा है कि हाई पावर कमेटी ने उन्हें सीवीसी रिपोर्ट पर पक्ष रखने का मौका नहीं दिया जो कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है। यहां तक कि जस्टिस पटनायक के सामने भी वो सीवीसी जांच के दौरान शामिल नहीं हुए थे।

उन्होंने कहा कि वो चार दशक के कार्यकाल के दौरान दिल्ली, अंडमान निकोबार, मणिपुर और पुदुचेरी के अलावा तिहाड़ जेल व सीबीआई के निदेशक रह चुके हैं और उनके कार्यकाल में उनपर किसी तरह के आरोप नहीं लगे। सीबीआई के निदेशक के तौर पर उन्होंने संस्थान के हित के लिए कदम उठाए लेकिन जिस तरह संस्थान को तोड़ने के लिए सीवीसी का सहारा लिया गया, उसके बाद इस पहलू पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है।

पत्र में ये भी कहा गया है कि भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी के तौर पर तो वो 31 जुलाई, 2017 को ही रिटायर हो चुके हैं। वो सीबीआई निदेशक के पद के दो साल के कार्यकाल के लिए ही सेवा में थे। अब उनको फायर सेफ्टी, सिविल डिफेंस व होम गार्डस का महानिदेशक बनाया गया है जबकि इस पद के कार्यकाल का वक्त वो पार कर चुके हैं।सीबीआई में हालिया उठापटक की सारी जानकारी, संक्षेप में