वायु प्रदूषण और सुप्रीम कोर्ट : वेहिकुलर पॉल्यूशन केस (१९८५-२०१९) की एक समीक्षा

वायु प्रदूषण और सुप्रीम कोर्ट : वेहिकुलर पॉल्यूशन केस (१९८५-२०१९) की एक समीक्षा

'बीटिंग एयर पॉल्यूशन' इस वर्ष के पर्यावरण दिवस की थीम है. इसी बात को ध्यान में रखते हुए वैश्विक स्तर पर पर्यावरण और वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य सम्बन्धी खतरों के प्रति जागरूकता फ़ैलाने की ओर प्रयास किये जा रहे है. यह थीम भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि IQ AIR, AIR VISUAL एवं GREEPEACE के सर्वे के मुताबिक़ विश्व के ३० सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में से २२ शहर भारत में है. यह बात अविलम्ब और प्रभावी रूप से प्रदूषण रोकने के लिए कदम उठाने की जरुरत का एहसास करवाती है.

प्रदूषण रोकने हेतू कानूनी प्रयास १९८१ में ही वायु प्रदूषण (निवारण और नियंत्रण) अधिनियम , १९८१ लागू करने के साथ ही शुरू हो गए थे. वायु प्रदूषण पर विशिष्ट कानून होने के बावजूद प्रदूषण पर रोकथाम नहीं लगाई जा सकी. यह मुद्दा एक बहुआयामी विषय है और हानिकारक गैसें छोड़ने वाले कई स्त्रोत हैं जिन पर सरकार का अपेक्षित ध्यान नहीं गया है. इसी बात ने कई लोगों को हमारी सक्रीय जुडिशियरी का दरवाज़ा खटखटाने के लिए प्रेरित किया होगा. लगभग ३ दशकों से सुप्रीम कोर्ट ने वायु प्रदूषण से सम्बंधित कई मुद्दे सुने है जिनमें वाहनों, उद्योगों से प्रदूषण, कृषि सम्बन्धी परिशिष्टों, पटाखों से प्रदुषण, सार्वजानिक स्थानों पर धूम्रपान जैसे मुद्दे शामिल हैं. न्यायतंत्र ने सरकारों को वायु प्रदूषण ख़त्म करने के लिए कई नीतियों, कार्यक्रमों को विकसित करने और उन्हें लागू करने की ओर प्रेरित किया है. सुप्रीम कोर्ट को अपना अधिकार क्षेत्र बढ़ाने और नीति निर्माता/ मॉनीटरिंग एजेंसी की भूमिका ले लेने के लिए आलोचना भी झेलनी पड़ी.

वर्तमान लेख उन्हीं में से एक महत्वपूर्ण केस- एम. सी. मेहता बनाम भारत सरकार (सामान्यत: वेहिकुलर पॉल्यूशन केस के नाम से प्रसिद्ध) (W.P. 13029 of 1985) पर चर्चा करता है. वाहनों द्वारा छोड़ा गया धुआँ वायु प्रदुषण का सबसे बड़ा कारण माना जाता है क्योंकि वाहन कई ऐसी गैसें उत्सर्जित करते हैं जिन्हें पर्यावरण, स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए हानिकारक माना जाता है जैसे नाइट्रोजन डाई-ऑक्साइड, सल्फर डाई-ऑक्साइड, कार्बन- मोनो ऑक्साइड, पार्टिकुलेट मैटर.

नियोजन और एक्शन के लिए आह्वान -१४ मार्च १९९१ का आर्डर

वेहिकुलर पॉल्यूशन केस में याचिका, दिल्ली में वाहनों के प्रयोग से होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए दायर की गयी थी. कई तरह का डाटा का उल्लेख करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि प्रदूषण को रोकने के लिए उठाये गए सामान्य कदम अपर्याप्त थे. इन कदमों में शामिल था- उत्सर्जन की जाँच, अभियोग चलाना, पंजीकरण रद्द करना. कोर्ट ने कहा कि प्रदूषण नियंत्रण के चुनौतीपूर्ण मामले को स्पष्ट समझ और कल्पनाशील नियोजन की आवश्यकता है. साथ ही निरंतर प्रयास और परिणामोन्मुख युक्तिपूर्ण एक्शन की भी आवश्यकता है. जवाब में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने एक कमिटी के गठन का सुझाव दिया जो कि दिल्ली में प्रदूषण नियंत्रण हेतु नियमों/प्रणालियों पर प्रकल्पना करेगी. यह इस केस का एक महत्वपूर्ण नतीजा था क्योंकि यही से आगे चलकर दिल्ली - एनसीआर क्षेत्र के लिए पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, १९८६ के तहत पर्यावरण प्रदूषण (निवारण एवं नियंत्रण) अथॉरिटी का गठन हुआ.

१९९१ से ही सुप्रीम कोर्ट ने प्रदूषण कम करने के लिए विविध गुटों/ समूहों- ऑटो मोबाइल एसोसिएशन, मंत्रालयों और विभागों, न्याय मित्रों के सुझावों को सुना। ये सुझाव थे - प्रदूषण फ़ैलाने वाले डीजल के स्थान पर स्वच्छ ईंधन सीएनजी का इस्तेमाल, exhaust system में catalytic converter लगवाना ताकि वायु प्रदूषकों का उत्सर्जन कम किया जा सके, लेड रहित पेट्रोल की पूर्ति, पुराने प्रदूषण फ़ैलाने वाले वाहनों को चरणबद्ध रूप से हटाना आदि. अगला फैसला जो शायद सबसे महत्वपूर्ण फैसला है वह है २८ जुलाई १९९८ का फैसला.

दिल्ली सार्वजनिक यातायात के साधनों को सीएनजी आधारित करवाना, पुराने वाहनों को चरणबद्ध तरीके से हटवाना- २८ जुलाई १९९८ का फैसला

यह फैसला श्री भूरेलाल की अगुवाई में कार्यरत पर्यावरण प्रदूषण (निवारण एवं नियंत्रण) अथॉरिटी को एनसीआर में वाहनों द्वारा किये गए प्रदूषण की रोकथाम पर एक रिपोर्ट और एक्शन प्लान प्रस्तुत करने के निर्देशन के बाद दिया गया था. कोर्ट ने भूरेलाल कमिटी के सुझावों को स्वीकार किया और क्षेत्र में प्रदूषण रोकने हेतू लगभग १७ समयबद्ध निर्देशन दिए. इनमें से महत्वपूर्ण थे- १५ साल पुराने कमर्शियल वाहनों के प्रयोग पर रोक, समस्त सिटी बसों (सरकारी या निजी) को सीएनजी आधारित बनाना, १९९० से पुरानी टैक्सियों और ऑटो को स्वच्छ ईंधन से चलने वाले वाहनों से स्थानांतरित करवाना, सीएनजी और स्वच्छ ईंधन से चलने वाली बसों के अतिरिक्त ८ साल पुरानी बसों पर रोक.

इन समयबद्ध निर्देशनों को लेकर काफी हंगामा और विरोध हुआ तथा अगले २-३ सालों में कई याचिकाएँ कोर्ट में दायर की गयी. कई ऑटोमोबाइल डीजल बनाने वाले निर्माताओं और वाहन मालिकों ने कुछ राहत के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. समय सीमा को बढ़ाने के लिए कुछ तब्दीलियां स्वीकार की गयी. कुछ वाहन जिन्होंने सीएनजी के लिए या नए वाहन के लिए आर्डर कर दिया था उनके उपयोग के सम्बन्ध में रियायत दी गयी. सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्देशनों का व्यापक प्रभाव पड़ा, खासकर सार्वजनिक परिवहन पर. अत: सरकार ने वायु प्रदूषण रोकने और परिवहन के सार्वजानिक साधनों के हितों के बीच संतुलन बनाने की प्रार्थना के साथ कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. इससे ५ अप्रैल २००२ को एक और फैसला कोर्ट द्वारा दिया गया.

५ अप्रैल २००२ का फैसला-

यह फैसला महत्वपूर्ण है क्योंकि कोर्ट सरकार की प्रार्थना सुन रही थी कि माशेलकर कमिटी की सिफारिशों के आधार पर उपयोगकर्ता को अपने चुनाव के अनुसार ईंधन चुनने का हक़ है जब तक की चुने गए ईंधन में सल्फर ०.०५% मात्रा में ही हो. कोर्ट ने इस प्रार्थना को खारिज कर दिया और केंद्र को आगाह किया कि वह पर्यावरण संरक्षण और जन-स्वास्थ्य के प्रति अपना संवैधानिक और वैधानिक कर्तव्य नहीं भूल सकती. बी. एन. किरपाल, वी. एन. खरे और अशोक भान की तीन जज पीठ ने स्वास्थ्य के अधिकार एवं स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार के सम्बन्ध को पुन: दोहराया. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सीएनजी एक स्वच्छ ईंधन माना जाता है और यातायात के क्षेत्र में सीएनजी की आपूर्ति सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए. कोर्ट ने डीजल पर चलने वाली बसों के प्रयोग को समाप्त करने की समयसीमा बढ़ाने की प्रार्थना को खारिज कर दिया और ऐसी बसों के इस्तेमाल पर प्रति दिन ५०० रूपए का जुर्माना लगाने का आदेश देते हुए सख्त आर्डर जारी किये. यह जुर्माना ३० दिनों बाद १००० रूपए प्रति दिन बढ़ा दिया जाना था. कोर्ट ने सुझाव दिया कि भूरेलाल कमिटी द्वारा सिफारिश किये गए एलपीजी या दूसरे अन्य ईंधनों पर भी विचार किया जा सकता है. ऑटो मोबाइल फ्यूल पॉलिसी के कई बिंदु भी सरकार के समक्ष विचार हेतु रखे गए.

राष्ट्रिय उत्सर्जन एवं फ्यूल स्टैण्डर्ड - भारत स्टेज (BS- BS I- IV)

वायु प्रदूषण ख़त्म करने के लिए फ्यूल स्टैण्डर्ड सबसे महत्वपूर्ण नीतियों में से एक है. यह भी वेहिकुलर पॉल्यूशन केस में प्रभावित हुए. यूरो मॉडल के आधार पर भारत ने भी स्वयं के उत्सर्जन मानदंड निर्धारित किये, जिन्हें भारत स्टेज(BS) कहा गया. ये मानदंड Internal combustion engine से उत्सर्जित वायु प्रदूषकों जैसे पार्टिकुलेट मैटर, नाइट्रोज़न डाई-ऑक्साइड कार्बन मोनो-ऑक्साइड का उत्सर्जन कम करने वाले बेहतर ईंधन के उत्पादन के सन्दर्भ में नए मानदंड लेकर आये. सुप्रीम कोर्ट ने २९ अप्रैल १९९९ को आर्डर दिया कि एनसीआर में सभी नॉन- कमर्शियल निजी वाहनों को EURO-II मानदंडों का अनुसरण करना होगा. भारत सरकार ने २००३ में ऑटो फ्यूल पॉलिसी पास की जिसमें कहा गया कि २०१० तक BS-IV की ओर स्थानांतरित होना होगा. शुरुआत में BS-IV कुछ मेट्रो शहरों पर लागू होना था और फिर २०१७ तक सारे भारत में.

एनवायरमेंट कंपनसेशन चार्ज के सम्बन्ध में कई आर्डर-

वेहिकुलर पॉल्यूशन केस इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि सुप्रीम कोर्ट ने हर लाइट या हैवी ड्यूटी कमर्शियल वाहन जो बाहर से दिल्ली में प्रवेश करते है, उन पर एनवायरमेंट कंपनसेशन चार्ज(ECC) लगाया. और जो धन राशि एकत्र हुई उसे एकमात्र रूप से सार्वजानिक परिवहन बेहतर बनाने, सडकों को सुधारने, खास कर सबसे असुरक्षित वर्ग साईकिल सवार और पैदल यात्रियों के लिए. बाद में कई वाहनों- यात्री वाहन, एम्बुलेंस, आवश्यक वस्तुएँ( खाद्य सामग्री, तेल) लाने- ले वाले वाहनों को ECC से छूट दे दी थी. ये नियम बहुत कड़े थे. ऐसे वाहन जो २००५ या उससे पहले पंजीकृत हैं वे प्रवेश के पात्र ही नहीं थे. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सीएनजी पर चलने वाले वाहनों को ECC देने की आवश्यकता नहीं है. साथ ही २००० CC वाले निजी वाहनों को दिल्ली में इस्तेमाल करने के लिए ex show room price का १% देना पड़ेगा.

यूनिफार्म फ्यूल क्वालिटी स्टैण्डर्ड नॉर्म : सम्पूर्ण भारत में ३१ मार्च २०२० तक BS IV से BS VI की ओर परिवर्तन

कोर्ट का नवीनतम फैसला २४ अक्टूबर २०१८ को आया. इस मामले में जस्टिस मदन लोकुर, जस्टिस दीपक गुप्ता, और जस्टिस अब्दुल नज़ीर की पीठ उस याचिका की सुनवाई कर रही थी जिसमें विषय यह था कि क्या मार्च 2020 तक निर्मित बीएस IV अनुपालन वाले वाहनों के संचित स्टॉक को वर्ष 2020 के सितंबर तक पंजीकृत किया जा सकता है। नियम 115 के उप-नियम 21 में यह कहा गया है कि 1 अप्रैल 2020 से पहले निर्मित बीएस IV अनुपालन वाले वाहनों का संचित स्टॉक (accumulated stock), जो ड्राइव अवे चेसिस में बेचा गया है उसे सितंबर 2020 तक पंजीकृत किया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने उद्देश्यपूर्ण व्याख्या (purposive interpretation) पर भरोसा करते हुए, मोटर वाहन नियम,1989 के नियम 115 के उप-नियम 21 को रीड डाउन (Read down) कर दिया। न्यायालय ने यह फैसला सुनाया कि 1 अप्रैल 2020 से किसी भी बीएस IVअनुपालन वाले वाहन को बेचा या पंजीकृत नहीं किया जा सकता। यह फैसला यह सुनिश्चित करने के लिए है कि 1 अप्रैल 2020 तक पूरा भारत BS IV से BS VIमानक पर स्थानांतरित हो जाएगा।गौरतलब है कि कोर्ट ने कहा कि किसी को भी प्रदूषण फ़ैलाने वाले वाहन निर्माण करने का अधिकार है जब कम प्रदुषण फ़ैलाने वाली तकनीकी उपलब्ध हो.

उपर्युक्त चर्चा से साफ़ है कि जुडिशरी ने वाहनों द्वारा उत्सर्जित प्रदूषण के सन्दर्भ में कड़े मानदंड बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. वाहनों द्वारा प्रदूषण का मुद्दा मात्र दिल्ली का मुद्दा नहीं रहा है बल्कि यह सारे भारत को बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है.