मौत की सज़ा पाए क़ैदियों को अपने सगे संबंधियों, वकीलों और चिकित्सकों से मिलने की अनुमति होनी चाहिए : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]

मौत की सज़ा पाए क़ैदियों को अपने सगे संबंधियों, वकीलों और चिकित्सकों से मिलने की अनुमति होनी चाहिए : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मौत की सज़ा पाए क़ैदियों को उनके सगे संबंधियों, अपने वकीलों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों से मिलने की अनुमति होनी चाहिए।

न्यायमूर्ति एमबी लोकुर, एस अब्दुल नज़ीर और दीपक गुप्ता की पीठ 1382 जेलों में अमानवीय स्थितियों से संबंधित मामले पर ग़ौर कर रहे थे।

आवेदन में माँग की गई कि किसी भी अदालत द्वारा मौत की सज़ा पाए किसी भी क़ैदी से उसी तरह से व्यवहार होना चाहिए जैसे किसी अन्य क़ैदी से और उन्हें भी वही सारी सुविधाएँ मिलनी चाहिए जैसी किसी अन्य क़ैदियों को मिल रही हैं। आवेदन में यह भी कहा गया है कि फाँसी पर लटकाए जाने की प्रतीक्षा कर रहे क़ैदियों को अलग से किसी कालकोठरी में क़ैद करने के नियम को असंवैधानिक क़रार दिया जाना चाहिए।

सुनील बत्रा मामले की चर्चा करते हुए कोर्ट ने कहा कि अगर किसी क़ैदी को मौत की सज़ा मिली है तो उसका अर्थ सिर्फ़ यह है कि क़ैदी को अंततः और निष्कर्षतः मौत की सज़ा मिली है और इसे किसी भी न्यायिक या संवैधानिक प्रक्रिया द्वारा बदला नहीं जा सकता।

पीठ ने कहा कि मौत की सज़ा पाए क़ैदी को जेल परिसर में आजीवन कारावास की सज़ा पाए किसी अन्य क़ैदी की तरह घूमने फिरने की इजाज़त होनी चाहिए।

कोर्ट ने फ़्रैन्सेस मुलिन बनाम प्रशासक, केन्द्रशासित प्रदेश दिल्ली मामले में कहा था कि क़ैदी को अपने सगे सम्बंधियों से मिलने का अधिकार है और अगर जेल का कोई नियम अगर इसके ख़िलाफ़ है तो उसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत सही नहीं कहा जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि “इस बात में कोई संदेह नहीं है कि क़ैदी को अपने वकीलों से बात करने की अनुमति होनी चाहिए ताकि उसे प्रभावी क़ानूनी मदद मिल सके…हमारी राय में फ़्रैन्सेस मुलिन बनाम प्रशासक, केन्द्रशासित प्रदेश दिल्ली में जो फ़ैसला दिया गया है वह उन क़ैदियों पर भी लागू होता है जिन्हें मौत की सज़ा मिली है…”

पीठ ने कहा कि क़ैदियों को ये अधिकार सिर्फ़ किसी विशेष राज्य में ही नहीं मिलेगा बल्कि सभी देश के राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में मिलेगा। पीठ ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासकों को निर्देश दिया कि वे जेल के मैन्यूअल, विनियमों और नियमों को इसके अनुरूप संशोधित करें।

इसके बाद पीठ ने न्यायमूर्ति अमितावा रॉय समिति से आग्रह किया कि वे उन सभी मुद्दों की गहराई से पड़ताल करें जिसे इस आवेदन में उठाया गया है।