सुप्रीम कोर्ट का एलजी/दिल्ली सरकार को निर्देश, शादियों में खाने की वस्तुओं और पानी की बर्बादी रोकने के लिए व्यापक नीति बनाएँ [आर्डर पढ़े]

सुप्रीम कोर्ट का एलजी/दिल्ली सरकार को निर्देश, शादियों में खाने की वस्तुओं और पानी की बर्बादी रोकने के लिए व्यापक नीति बनाएँ [आर्डर पढ़े]

सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली और उसके लेफ़्टिनेंट गवर्नर को एक पूर्ण और व्यापक नीति बनाने को कहा है ताकि मोटलों, फ़ार्म हाउसों के शादी समारोहों में खाने पीने की वस्तुओं की बर्बादी रोकी जा सके।

न्यायमूर्ति एमबी लोकुर,न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता की पीठ ने यह भी कहा कि सम्भावित नीति में मेहमानों की संख्या पर नियंत्रण लगाने की संभावना की भी तलाश की जाए। कोर्ट ने यह बाई कहा है कि नीति में इस बात का भी उल्लेख हो कि शादी के कारण शहर में ट्रैफ़िक की समस्या पैदा ना हो और जाम नहीं लगे इसको कैसे सुनिश्चहित किया जा सकता है।

पृष्ठभूमि

पिछली सुनवाई में पीठ ने कहा था कि राजधानी में होने वाली शादियों में भारी मात्रा में खाने पीने की वस्तुओं  की बर्बादी होती है।

“राज्य और राज्य के अथॉरिटीज़ जिसमें नगर निगम भी शामिल हैं, का व्यवहार मोटलों और फ़ार्म हाउस मालिकों के पक्ष में लगता है जो कि सार्वजनिक हितों के ख़िलाफ़ है,” पीठ ने कहा। कोर्ट ने यह भी कहा कि दिल्ली में जो लोग प्रशासन से जुड़े हुए हैं उन्हें जनता के हितों का ख़याल रखना चाहिए ना कि मोटल या फ़ार्म हाउस मालिकों के वित्तीय हितों का।

कोर्ट ने कहा, “यह आम जानकारी की बात है कि पेय जल और खाने की वस्तुओं की उपलब्धता एक स्वाभाविक मानव अधिकार है और दिल्ली में जो भी प्रशासन देख रहे हैं उन्हें इसका आदर करना चाहिए।”

पीठ ने मुख्य सचिव को अगली सुनवाई के दिन कोर्ट में मौजूद रहने का निर्देश दिया और कहा, “जीवन में पैसा ही सब कुछ नहीं होता”।

मंगलवार को मुख्य सचिव ने पीठ से कहा कि इस बारे में विकल्पों की चर्चा की जा रही है और सरकार दो-तरफ़ा रणनीति पर ग़ौर किया जा रहा है ताकि किसी समारोह में खाने पीने की वस्तुओं की उपलब्धता और उसमें आनेवाले मेहमानों को सीमित किया जा सके और खाद्य वस्तुओं की गुणवत्ता को भी बनाया रखा जा सके। मुख्य सचिव ने यह भी कहा कि यह नीति छह सप्ताह के भीतर तैयार की जा सकती है।

इस मामले की अगली सुनवाई अब 5 फ़रवरी 2019 को होगी। कोर्ट ने कहा, “दिल्ली के लेफ़्टिनेंट गवर्नर और मुख्य सचिव को 31 जनवरी 2019 तक इस बारे में नीति बनाने और इसे कठोरता से लागू करने का समय दिया जा रहा है ताकि दिल्ली के लोगों का भला हो सके।”