विश्वास है कि मोदी सरकार भारत को एक और इस्लामिक देश नहीं बनने देगी : मेघालय हाईकोर्ट

विश्वास है कि मोदी सरकार भारत को एक और इस्लामिक देश नहीं बनने देगी : मेघालय हाईकोर्ट

“मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि किसी को भी भारत को एक और इस्लामिक देश में तब्दील करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए क्योंकि अगर ऐसा किया जाता है तो यह भारत और पूरी दुनिया के लिए एक क़यामत का दिन होगा। मुझे पूरा विश्वास है कि सिर्फ़ श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में वर्तमान सरकार इस मुद्दे की गम्भीरता को समझेगी और आवश्यक क़दम उठाएगी जैसा कि इस अदालत ने …सुझाव दिया है और हमारी मुख्यमंत्री ममताजी हर तरह से राष्ट्रीय हितों का सम्मान करेंगीं।”

उपरोक्त बयान को पढ़ने के बाद यह विश्वास करना मुश्किल है कि यह बयान एक जज ने दिया है और वह भी किसी निचली अदालत के जज ने नहीं बल्कि हाईकोर्ट के जज ने दिया है - मेघालय हाईकोर्ट के जज ने और वह भी किसी ग़ैर-अदालतीय मंच से नहीं बल्कि एक मामले में फ़ैसला सुनाते हुए दिया है।

 मेघालय हाईकोर्ट ने सोमवार को केंद्र से कहा कि वह पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान से आए हिंदूओं, सिखों, जैनों, बौद्धों, पारसियों, ईसाइयों, खासियों, जैनतीयों और गारो लोगों को बिना किसी प्रश्न या किसी दस्तावेज़ की ज़रूरत के नागरिकता देने के लिए क़ानून बनाए।

यह फ़ैसला सुनाने वाले जज हैं न्यायमूर्ति एसआर सेन। न्यायमूर्ति सेन ने निर्देश दिया है कि इस फ़ैसले की एक प्रति देश के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और क़ानून मंत्री को भेजी जाए ताकि वे इसका अध्ययन करने के बाद इन समुदायों की भलाई के लिए आवश्यक क़दम उठा सकें।



न्यायमूर्ति सेन ने कहा “इस अदालत को यह उम्मीद है कि भारत सरकार इस फ़ैसले पर ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में ग़ौर करेगी और इस देश को और इसके लोगों की रक्षा करेगी।”

अदालत ने मेघालय सरकार को निर्देश दिया कि वह रब्बे आलम बनाम मेघालय राज्य एवं अन्य मामले में दिए गए निर्देशों का पालन करे और इस आधार पर रिहाईश प्रमाणपत्र जारी करे। कोर्ट ने कहा की मेघालय राज्य में स्थाई रूप से या फिर पिछले पाँच सालों से रह रहे सभी लोगों को रिहाईश प्रमाणपत्र प्राप्त करने का अधिकार है।

जहाँ तक स्थाई निवासी प्रमाणपत्र (पीआरसी)  की बात है, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पिछले 12 सालों से राज्य में स्थाई रूप से रह रहे किसी भी व्यक्ति को यह प्रमाणपत्र आगे कोई प्रश्न पूछे बिना जारी किया जाना चाहिए।

“हालाँकि, अगर कोई संदेह पैदा होता है तो उपायुक्त पुलिस सत्यापन का आदेश दे सकता है ताकि यह पता किया जा सके कि संबंधित व्यक्ति कितने समय से राज्य में रह रहा है और पीआरसी सिर्फ़ शैक्षिक उद्देश्यों के लिए जारी नहीं किया जा सकता है बल्कि यह सभी उद्देश्यों के लिए होना चाहिए। मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि रिहाईश प्रमाणपत्र या पीआरसी सिर्फ़ सेना या अर्धसैनिक बलों में भर्ती होने के लिए या शैक्षिक उद्देश्यों के लिए ही नहीं है, इसे हर उद्देश्यों के लिए जारी किया जाना चाहिए।

कोर्ट ने अमोन राना की याचिका पर सुनवाई करते हुए उपरोक्त फ़ैसला सुनाया। राना भारतीय सेना में शामिल होना चाहता था पर उसे रिहाईशी प्रमाणपत्र नहीं दिया गया इसलिए वह ऐसा नहीं कर पाया।

भारत को हिन्दू देश घोषित कर देना चाहिए

न्यायमूर्ति सेन ने फ़ैसला सुनाने से पहले इस देश के बँटवारे के इतिहास को उकेरा और कहा कि चूँकि इस देश का बँटवारा धार्मिक आधार पर हुआ, इसलिए भारत को हिन्दू देश घोषित कर दिया जाना चाहिए था।

उन्होंने पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान में हिंदूओं, सिखों, जैनों, बौद्धों, पारसियों, ईसाइयों, खासियों, जैनतीयों और गारो लोगों के साथ जिस तरह से व्यवहार होता है उस पर अफ़सोस ज़ाहिर किया।

“आज भी  पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान में हिंदूओं, सिखों, जैनों, बौद्धों, पारसियों, ईसाइयों, खासियों, जैनतीयों और गारो लोगों को प्रताड़ित किया जाता है और वे कहीं नहीं जा सकते और जो हिन्दू बँटवारे के समय भारत आए उन्हें आज भी विदेशी माना जाता है जो कि मेरे समझ में काफ़ी अतार्किक, ग़ैर क़ानूनी और प्राकृतिक न्याय के ख़िलाफ़ है।”

इसके बाद कोर्ट ने प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, क़ानून मंत्री और संसद के सदस्यों से क़ानून बनाकर पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान से आए सभी हिंदूओं, सिखों, जैनों, बौद्धों, पारसियों, ईसाइयों, खासियों, जैनतीयों और गारो लोगों को बिना किसी दस्तावेज़ दिखाने की अनिवार्यता के भारत का नागरिक बनाने के लिए क़ानून में संशोधन करने की अपील की।

एनआरसी में मूल हिंदुओं को स्थान नहीं

असम में नेशनल रजिस्टर अव सिटिज़ेन (एनआरसी) की प्रक्रिया के बारे में न्यायमूर्ति सेन ने कहा कि यह प्रक्रिया दोषपूर्ण है क्योंकि इसकी वजह से बहुत सारे विदेशी भारतीय नागरिक बन रहे हैं जबकि मूल भारतीय पीछे छूट रहे हैं जो कि बहुत ही दुखद है।

जज ने कहा की असम के डिटेन्शन केंद्रों में लोग काफ़ी अमानवीय स्थिति में रह रहे हैं और उन्होंने बराक घाटी और असम घाटी के हिंदुओं से अपील की कि वे इसका अनुकूल समाधान ढूँढें क्योंकि “हमारी संस्कृति, हमारी परम्पराएँ और हमारा धर्म एक ही है।”