सुप्रीम कोर्ट ने गवाह सुरक्षा योजना, 2018 को स्वीकृति दी; केंद्र, राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों से एक साल के अंदर सभी जिलों में वलनेरबल विट्नेस डिपोज़िशन कॉम्प्लेक्स तैयार करने को कहा [निर्णय पढ़ें]

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को गवाहों की सुरक्षा के लिए गवाह सुरक्षा योजना, 2018 को मंज़ूरी दे दी है। यह योजना केंद्र सरकार ने तैयार की है। कोर्ट ने अब केंद्र, राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों से इसे पूरी तरह लागू करने को कहा है।

न्यायमूर्ति एके सीकरी और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नज़ीर की पीठ ने कहा कि यह योजना अनुच्छेद 141/142 के तहत तब तक क़ानून होगा जब तक कि संसद इस मुद्दे पर कोई क़ानून नहीं पास करती। पीठ ने देश के सभी राज्यों को निर्देश दिया कि वे वर्ष 2019 के अंत तक कमज़ोर गवाहों की सुरक्षा के लिए कॉम्प्लेक्स की स्थापना करें।

गवाह सुरक्षा योजना, 2018

पीठ ने कहा कि इस योजना की महत्त्वपूर्ण बातें हैं गवाहों को होने वाले ख़तरों की पहचान करना, पुलिस प्रमुखों द्वारा ख़तरों का विश्लेषण रिपोर्ट तैयार करना, इस तरह का क़दम उठाना कि गवाह और आरोपी जाँच के दौरान आमने-सामने ना हो पाएँ, पहचान की सुरक्षा, पहचान को बदलना, गवाहों को अन्यत्र ले जाना, गवाहों को योजनाओं के बारे में बताना, गोपनीयता, रिकॉर्ड की सुरक्षा और ख़र्च की वसूली शामिल है।

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने जो योजना बनाई है उसमें गवाहों की तीन श्रेणियाँ बनाई गई हैं –

  • ऐसा मामला जिसमें मामले की सुनवाई या उसके बाद गवाह या उसके परिवार के सदस्यों को जान का ख़तरा
  • ऐसा मामला जिसमें गवाह या उसके परिवार के सदस्यों की सुरक्षा, उसकी प्रतिष्ठा और उसकी परिसंपत्ति को ख़तरा।
  • ऐसी स्थिति जिसमें मामले की सुनवाई या उसके बाद गवाह या उसके परिवार के लोगों को उत्पीड़ित करने या डराने धमकाने तक सीमित है।

नई योजना में गवाह अपनी सुरक्षा के लिए उचित अधिकारी या उस ज़िला में आवेदन कर सकता है जहाँ अपराध हुआ है। इस अथॉरिटी का अध्यक्ष ज़िला या सत्र जज होगा और ज़िला के पुलिस प्रमुख इसके सदस्य और अभियोजन का प्रमुख इसका सदस्य सचिव होगा।

किसी गवाह से सुरक्षा का आवेदन मिलने के बाद उसकी सुरक्षा के ख़तरे का आकलन होगा। योजना में इस बात का भी उल्लेख है कि किस तरह की सुरक्षा का आदेश दिया जा सकता है। अथॉरिटी को पहचान सुरक्षा, पहचान को बदलने और गवाह को कहीं और ले जाने का भी अधिकार दिया गया है। इस पूरी योजना का फ़ैसले में ज़िक्र (पृष्ठ संख्या 23-26) किया गया है।

कोर्ट ने इस योजना के बारे में कहा : “चूँकि यह लाभकारी और कल्याणकारी योजना है और इसका उद्देश्य देश में आपराधिक न्याय प्रणाली को मज़बूत बनाना है…”

 

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