अमिकस क्यूरी ने सुप्रीम कोर्ट को सौंपे रिपोर्ट में कहा, विधायकों/सांसदों के ख़िलाफ़ लंबित हैं 4122 मामले

अमिकस क्यूरी विजय हंसारिया ने कहा कि वर्तमान (2324) और पूर्व (1675) सांसदों और विधायकों के ख़िलाफ़ कुल 4122 मामले विचाराधीन हैं। उन्होंने सुझाव दिया है कि हर जिले में सत्र और मजिस्ट्रेट स्तर की एक विशेष अदालत में इनके आपराधिक मामलों की सुनवाई कराई जाए और इसके लिए जजों को नामित किया जाए।

“…हाईकोर्ट विधायकों के ख़िलाफ़ लंबित मामलों की सुनवाई के लिए हर ज़िला/उप खंड में एक सत्र अदालत और एक मजिस्ट्रे अदालत का गठन कर उन्हें सिर्फ़ विधायक/सांसदों के ख़िलाफ़ आपराधिक मामलों की सुनवाई का आदेश दे और जब तक इन सभी मामलों की सुनवाई ना हो जाए उसे उन्हीं के मामले की सुनवाई करने की इजाज़त हो,” उन्होंने कहा।

भाजपा नेता अश्वनी कुमार उपाध्याय की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान यह मत व्यक्त किया गया।

1 नवंबर को हुई सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, यूयू ललित, केएम जोसफ़ की पीठ ने विधायकों के ख़िलाफ़ लंबित मामलों के बारे में आँकड़े पेश करने को कहा था।

इस बारे में पेश किए गए आँकड़ों से निम्नलिखित बातों का पता चलता है :

  • वर्तमान (2324) और पूर्व (1675) सांसदों और विधायकों के ख़िलाफ़ कुल 4122 मामले तीन दशक से अधिक समय से विचाराधीन हैं।
  • कुल 4122 मामलों में से 1991 मामलों में अभी तक अभियोग भी दर्ज नहीं किया गया है।
  • इन आँकड़ों में राज्यों के बारे में जो तस्वीर उभरकर आई है वह और भी ख़राब है। कई मामले ऐसे हैं जिसमें आजीवन कारावास तक की सज़ा हो सकती है पर अभी तक उन मामलों में अभी तक अभियोग भी निर्धारित नहीं हुआ है।

हंसारिया ने अपनी दलील में कहा कि पब्लिक इंटरेस्ट फ़ाउंडेशन बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद भी कि चुने हुए प्रतिनिधियों के ख़िलाफ़ मामले का अभियोग तय होने के एक साल के भीतर निस्तारन किया जाए, स्थितियाँ नहीं बदली हैं।

इस मामले में 12 विशेष अदालतों का गठन किया गया है, पर उन्होंने कहा कि ऐसा करते हुए लंबित मामलों की संख्या का ध्यान नहीं रखा गया है।

हंसारिया ने कहा कि हाइकोर्टों से कहा जाए कि वे इस तरह हर ज़िला/उप खंड में गठित सत्र और मजिस्ट्रे अदालत को ट्रांसफ़र करे और इनकी हर दिन सुनवाई की जाए और कोई भी स्थगन नहीं दिया जाए। उन्होंने यह सुझाव भी दिया कि जिन सांसदों या विधायकों के ख़िलाफ़ ऐसे मामले हैं जिनमें उनको आजीवन क़ैद या क़ैद की सज़ा हो सकती है उनमामलों की सुनवाई पहले की जाए।

हंसारिया ने कहा कि हर विशेष रूप से गठित अदालत को हर महीने स्थिति रिपोर्ट अपने-अपने हाइकोर्टों को देने को कहा जाए। उन्होंने कहा कि हाइकोर्टों से तीन महीने के भीतर यह बताने को कहा जाए कि उन्होंने जो अंतरिम आदेश दिया उसके बारे में क्या निर्णय लिया गया।

 

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