मामले के तथ्य कहाँ हैं? सुप्रीम कोर्ट ने धारा 482 के तहत इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को निरस्त किया [निर्णय पढ़ें]

“हमें तथ्य चाहिए”, चार्ल्स डिकेंस का नॉवल ‘हार्ड टाइम्ज़’ इसी तरह शुरू होता है।

सुप्रीम कोर्ट का भी इस मामले में कहना कुछ। ऐसा ही था। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट के जज एएम सप्रे ने इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दिए गये आदेश को ख़ारिज कर दिया क्योंकि उसमें मामले के तथ्यों का उल्लेख नहीं था।

न्यायमूर्ति सप्रे और न्यायमूर्ति इन्दु मल्होत्रा की पीठ ने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने इस फ़ैसले में इस मामले से संबंधित तथ्यों का भी उल्लेख नहीं किया है और उसने सिर्फ़ सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का ज़िक्र किया है।

कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट की एकल पीठ को पहले इस मामले के बारे में संक्षेप में बताना चाहिए और फिर इस अदालत द्वारा निर्धारित किए गए क़ानून के सिद्धांतों के आलोक में इस मामले की प्रक्रिया को दी गई चुनौती का ज़िक्र करना चाहिए था।

“यह न्यूनतम ज़रूरत है जो हर आदेश के साथ होना ही चाहिए ताकि मामले के निस्तारन के लिए दिए गये तर्कों का वह समर्थन कर सके। इससे हाईकोर्ट को इस बात की जाँच करने में मदद मिलती है कि कोर्ट ने जो कारण बताए हैं वे तथ्यात्मक और क़ानूनी रूप से टिक सकते हैं या नहीं”, कोर्ट ने कहा।

पीठ ने इसके बाद इस मामले को पुनर्विचार के लिए वापस कर दिया।

 

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