भीमा कोरेगांव हिंसा: महाराष्ट्र सरकार ने SC में कहा, निजी स्वतंत्रता के नाम पर चीखना- चिल्लाना आजकल का फैशन

भीमा कोरेगांव हिंसा:  महाराष्ट्र सरकार ने SC में कहा, निजी स्वतंत्रता के नाम पर चीखना- चिल्लाना आजकल का फैशन

भीमा कोरेगांव हिंसा में आरोपी सामाजिक कार्यकर्ता गौतम नवलखा के मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जनवरी 2019 तक टल गई है।

सोमवार को महाराष्ट्र सरकार ने चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस के एम जोसेफ की पीठ से सहमति जताई कि आरोपी फिलहाल हिरासत में नहीं है इसलिए याचिका पर सुनवाई बाद में हो सकती है।

इससे पहले महाराष्ट्र सरकार ने एक्टिविस्ट गौतम नवलखा के खिलाफ कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर चीखना- चिल्लाना आजकल का फैशन बन गया है। महाराष्ट्र पुलिस एक्टिविस्ट को गिरफ्तार करने का अधिकार रखती है और उसके खिलाफ आरोप गंभीर हैं।

पुणे पुलिस की ओर से दाखिल हलफनामे में कहा गया है कि पुलिस नवलखा को हिरासत में लेकर पूछताछ करना चाहती है।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार की अर्जी पर गौतम नवलखा को नोटिस जारी तक जवाब मांगा था। महाराष्ट्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। इसमें ट्रांजिट रिमांड रद्द करने और हाउस अरेस्ट हटाने के फैसले को चुनौती दी गई है।

महाराष्ट्र सरकार की ओर से मुकुल रोहतगी ने कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट ने हाउस अरेस्ट के आदेश दिए थे तो दिल्ली हाईकोर्ट ने हैबियस कारपस याचिका कैसे सुनी ? याचिका में हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाकर तुरंत हाउस अरेस्ट के आदेश बहाल करने की मांग की गई है।

याचिका में कहा गया है कि दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला गलत है। हाईकोर्ट में दाखिल याचिका में ट्रांजिट रिमांड को चुनौती नहीं दी गई थी। ये हैवियस कॉरपस याचिका थी जिसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने ही आदेश दिया है कि गिरफ्तारी और निचली अदालत के आदेश के खिलाफ हैवियस कॉरपस याचिका दाखिल नहीं हो सकती।

गौरतलब है कि नवलखा को दिल्ली में 28 अगस्त को गिरफ्तार किया गया था। अन्य चार कार्यकर्ताओं को देश के विभिन्न हिस्सों से गिरफ्तार किया गया था। सुप्रीम कोर्ट  ने 29 सितंबर को पांचों कार्यकर्ताओं को फौरन रिहा करने की याचिका खारिज करते हुए कहा था कि महज असहमति वाले विचारों या राजनीतिक विचारधारा में अंतर को लेकर गिरफ्तार किए जाने का यह मामला नहीं है। पीठ ने कहा था कि आरोपी और चार हफ्ते तक नजरबंद रहेंगे, जिस दौरान उन्हें उपयुक्त अदालत में कानूनी उपाय का सहारा लेने की आजादी है।