AFSPA प्रभावित क्षेत्रों में सशस्त्र बलों के खिलाफ मुठभेड़ की जांच के खिलाफ दायर सैन्यकर्मियों की याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की

AFSPA प्रभावित क्षेत्रों में सशस्त्र बलों के खिलाफ मुठभेड़ की जांच के खिलाफ दायर सैन्यकर्मियों की याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की

सेना के करीब 350 जवानों और अधिकारियों की वो याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी जिसमें कहा गया था कि  आंतकवाद निरोधक अभियान के दौरान की गई कार्रवाई की CBI या पुलिस जांच नहीं होनी चाहिए।

शुक्रवार को हुई सुनवाई में जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस यूयू ललित की पीठ ने टिप्पणी की , ‘‘जब जीवन की हानि हो, भले ही मुठभेड़ में हो तो क्या मानवीय जीवन में यह अपेक्षा नहीं की जाती कि इसकी जांच होनी चाहिए।”

पीठ ने ने केन्द्र की इस संबंध में अपील को नहीं माना।केन्द्र की ओर से सालिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि इस विषय पर चर्चा की जानी चाहिए ताकि एक ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जिसमें आतंकवाद का मुकाबला करते हुए हमारे सैनिक कांपे नहीं। सशस्त्र बल गड़बड़ी वाले इलाकों में एकदम अलग किस्म के माहौल में अभियान चलाते हैं और इसलिए संतुलन बनाने की आवश्यकता है।

लेकिन पीठ ने कहा, ‘‘इस तरह की व्यवस्था तैयार करने से आपको किसने रोका है? आपको हमारे हस्तक्षेप की आवश्यकता क्यों है? ये ऐसे मुद्दे हैं जिन पर आपको ही चर्चा करनी होगी, अदालत को नहीं।”

वहीं सालिसीटर जनरल ने कहा कि उन्हें सुना जाना चाहिए।मानव जीवन मूल्यवान होता है और इसे लेकर कोई विवाद नहीं हो सकता। उन्होंने कहा, ‘‘ हमारे देश के तीन सौ से अधिक सैनिकों का इसके लिए अनुरोध करना अपने आप में ही दुर्भाग्यपूर्ण है। इसका हतोत्साहित करने वाला असर होगा। देश यह बर्दाश्त नहीं कर सकता कि हमारे जवान हतोत्साहित हों। कृपया बहस को मत रोकिए।”

सैन्यकर्मियों की ओर से पेश ऐश्वर्या भाटी ने पीठ से कहा कि इस याचिका पर मुख्य मामले के साथ सुनवाई की जानी चाहिए लेकिन पीठ ने भाटी से कहा कि सैन्यकर्मियों की याचिका मुख्य मुद्दे से ‘पूरी तरह अलग' है ओर इसे लंबित मामले के साथ संलग्न नहीं किया जा सकता। पीठ ने कहा कि यदि प्राधिकारी सैन्य कानून के तहत कोई कार्रवाई ही नहीं करेंगे तो आप यह नहीं कह सकते कि कोई जांच नहीं होनी चाहिए।

दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल दिए फैसले में कहा था कि AFSPA (आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट) वाले इलाकों में हुई मुठभेड़ की भी पुलिस/सीबीआई जांच हो सकती है। सेना के लोगों पर भी सामान्य अदालत में मुकदमा चल सकता है।

गौरतलब है कि 350 वरिष्ठ सेना अधिकारियों के एक समूह ने सुप्रीम कोर्ट में आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट ( AFSPA) के तहत सैनिकों की भरोसेमंद कार्रवाई में सरंक्षण के लिए दिशानिर्देश निर्धारित करने के  लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी ताकि कोई भी सैनिक अपनी ड्यूटी के दौरान अच्छे विश्वास में किए गए कार्य के लिए आपराधिक कार्यवाही या गिरफ्तार किए जाने जैसी कार्रवाई का शिकार ना हो।

याचिकाकर्ता कर्नल अमित कुमार और 350 अन्य ने अपनी याचिका में कहा था कि इस तरह के दिशानिर्देश देश की संप्रभुता, अखंडता और गरिमा की सुरक्षा के लिए आवश्यक हैं। यह कहा गया कि  प्रॉक्सी दुश्मन और विद्रोहियों से लड़ रहे सैनिकों की सुरक्षा के लिए AFSPA के तहत अच्छे विश्वास में कार्रवाई करना जरूरी है।अपने कर्तव्य निभाने के दौरान किए गए कार्यों पर  सेनाकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की घटनाओं पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा था कि  रिट याचिका भारतीय सेना के अधिकारियों व सैनिकों द्वारा सामूहिक रूप से दायर की गई है जो राष्ट्र की संप्रभुता, ईमानदारी, सुरक्षा और गौरव की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं और उन्हें संरक्षण देना भारतीय सेना के सैनिकों के आत्मविश्वास और मनोबल को बहाल करने के लिए जरूरी है।

यह कहा गया कि सैनिकों को अपनी कार्रवाई में  बाधाओं और मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है जबकि वो  ध्वज की गरिमा को बनाए रखने के लिए कर्तव्य की पंक्ति में अपने जीवन को न्यौछावर करने में भी संकोच नहीं करते।

यह इंगित किया गया है कि किसी भी आपराधिक इरादे के बिना अच्छे विश्वास में किए गए कार्य के संबंध में भी उनके सहयोगियों को सताया जा रहा है और उन पर मुकदमा चलाया जा रहा है।

याचिका में कहा गया था कि यदि हमारे सशस्त्र बलों को सरंक्षण नहीं दिया जाता तो उन्हें  सीमावर्ती इलाकों में दुश्मनों के साथ लड़ने के साथ- साथ देश के भीतर मुकदमा चलाने से भारी दिक्कत होगी और ये  हमारी संप्रभुता के लिए गंभीर संकट का कारण बनेगा। साथ ही ये संवैधानिक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में हमारे अस्तित्व को खतरे में डालता है।

इससे AFSPA  (असम और मणिपुर) और AFSPA  (जे एंड के) की धारा 6 और 7 के तहत परिभाषित अभियोजन पक्ष से उनकी सुरक्षा के संबंध में भ्रम की असाधारण स्थिति उत्पन्न हुई है। ऐसे परिचालन कानून और व्यवस्था स्थितियों से भौतिक रूप से काफी अलग हैं। इस असाधारण स्थिति में सैनिकों के भरोसेमंद कार्यों के लिए पूर्ण सुरक्षा और  सैनिक को अपने कर्तव्यों को प्रभावी ढंग से और कुशलता से पूरा करने में सक्षम बनाना आवश्यक है जो बदले में राष्ट्र की संप्रभुता और गौरव की सुरक्षा के लिए अपना जीवन भी न्यौछावर कर देते हैं।

यह प्रस्तुत किया गया था कि तत्काल याचिका, अन्य बातों के साथ सार्वजनिक महत्व के कानून के बेहद गंभीर सवाल उठाती है, जिसके लिए इस अदालत द्वारा विचार की आवश्यकता है। इरादे से संबंधित तथ्यों का पता लगाने के लिए प्रारंभिक जांच के बिना या कर्मियों को उचित मौका दिए बिना एफआईआर दर्ज करना प्राकृतिक न्याय और AFSPA की  धारा 4 के दायरे के खिलाफ है।याचिका में एफआईआर और गिरफ्तारी को लेकर दिशानिर्देशों के लिए भी प्रार्थना की गई थी।