हर मामले में ‘मौत की सजा’ देना उचित नहीं है, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने धारा 376 के तहत मौत की सजा को फिर बदला [निर्णय पढ़ें]

हमारी राय में संबंधित मामले में कथित अपराध नृशंस तरीके से नहीं हुआ और इसलिए यह विरलों में विरल मामले मामला नहीं है जिसे लिए मौत की सजा दी जाए”

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने के बार फिर, एक आरोपी को आईपीसी की धारा 376 के तहत मिली मौत की सजा को बदल दिया है। आरोपी पर तीन साल की एक बच्ची के साथ बलात्कार का आरोप है।

एक ही महीने में मौत की सजा को हाईकोर्ट द्वारा बदलने की यह तीसरी घटना है।

तीन साल की एक बच्ची के साथ बलाताकार करने के दोषी तौहीद को निचली अदालत ने मौत की सजा सुनाई थी। कोर्ट ने कहा था कि प्रत्यक्ष गवाहों ने इस बात की पुष्टि की कि वह बलात्कार का दोषी है और इसकी पुष्टि डीएनए जांच और अन्य चिकित्सा जाँचों से भी हुई है। उसे आईपीसी की धारा 376एबी और 450 के तहत दोषी पाया गया और मौत की सजा सुनाई गई।

उसको दोषी करार दिये जाने के निचली अदालत के फैसले को न्यायमूर्ति एसके सेठ और न्यायमूर्ति अंजुली पालो की पीठ ने सही ठहराया पर कहा कि हर मामले में मौत की सजा देना उचित नहीं है।

“हमारी राय में यह अपराध बहुत ही नृशंस और क्रूर तरीके से नहीं हुआ; और इसलिए यह विरलों में से भी विरल मामलों में नहीं आता कि इसके लिए मौत की सजा दी जा सके,” पीठ ने कहा।

कोर्ट ने कहा कि मौत की सजा देने के लिए कुछ बातों को ध्यान में रखना जरूरी है जैसे कि आरोपी की उम्र, अपराध करने के तरीके और उसमें सुधार की संभावना आदि।

 

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