सबरीमला मंदिर पर पुनर्विचार याचिकाओं पर 13 नवंबर को होगी खुली अदालत में सुनवाई

केरल के सबरीमला मंदिर में सभी आयु की महिलाओं को प्रवेश के फैसले पर दाखिल पुनर्विचार याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट 13 नवंबर को सुनवाई करेगा। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि मामले की सुनवाई खुली अदालत में होगी।

दरअसल सोमवार को नेशनल अयप्पा डिवोटी एसोसिएशन की अध्यक्ष शैलजा विजयन की ओर से वकील मैथ्यूज नंदूपरा ने इस मामले में जल्द सुनवाई की गुहार लगाई थी तो चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा था, “ हमें पता है कि इस फैसले पर 19 पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल हुई हैं। हम कल तक ये तय करेंगे कि इन्हें सुनवाई के लिए कब सूचीबद्ध किया जाए। “

इन याचिकाओं में कहा गया है कि  संविधान पीठ का 28 सितंबर का फैसला सही नहीं है। इसने तर्क दिया है कि न तो अदालत और न ही विधायिका एक धर्म या अभ्यास या पंरपरा या उपयोग या “अस्तित्व से बाहर” विश्वास को “सुधार” कर सकती है। याचिकाकर्ता  इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन, केवल एक तीसरा पक्ष है।भगवान अयप्पा के महिला भक्तों के मतभेद न्याय के विरोध में उठ गए हैं।

 वकील मैथ्यूज नंदूपरा के माध्यम से दाखिल याचिका में  कहा गया है कि  जो महिलाएं आयु पर प्रतिबंध लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट आईं थीं वे अयप्पा भक्त नहीं हैं। ये फैसला लाखों अयप्पा भक्तों के मौलिक अधिकारों को प्रभावित करते हैं और इस फैसले को वापस लिया जाना चाहिए।

एक अन्य याचिका में कहा गया है कि सबरीमला देवता के भक्त कोई अलग नहीं हैं। याचिका में दलील दी गई कि किसी भी धार्मिक विश्वास या प्रथाओं को चुनौती देने के लिए  ये फैसला “दरवाजा खोलता” है।

गौरतलब है कि  28 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए केरल के सबरीमला मंदिर में महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दे दी। 4:1 के बहुमत से हुए फैसले में पांच जजों की संविधान पीठ  ने साफ कहा कि हर उम्र वर्ग की महिलाएं अब मंदिर में प्रवेश कर सकेंगी। 10 से 50 साल की उम्र की महिलाओं के प्रवेश की सैंकडों साल पुरानी परंपरा को असंवैधानिक करार दिया गया।

अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश की संस्कृति में महिला का स्थान आदरणीय है। यहां महिलाओं को देवी की तरह पूजा जाता है और मंदिर में प्रवेश से रोका जा रहा है। तत्कालीन

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने फैसला सुनाते हुए कहा कि धर्म के नाम पर पुरुषवादी सोच ठीक नहीं है। उम्र के आधार पर मंदिर में प्रवेश से रोकना धर्म का अभिन्न हिस्सा नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धर्म एक है गरिमा और पहचान है।अयप्पा कुछ अलग नहीं हैं। जो नियम जैविक और शारीरिक प्रक्रिया पर बने हैं वो संवैधानिक टेस्ट पर पास नहीं हो सकते।

वहीं जस्टिस आरएफ नरीमन ने भी अपने फैसले में कहा कि मंदिर में महिलाओं को भी पूजा का समान अधिकार है। ये मौलिक अधिकार है। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि क्या संविधान महिलाओं के लिए अपमानजनक बात को स्वीकार कर सकता है ? पूजा से इनकार करना महिला गरिमा से इनकार करना है। महिलाओं को भगवान की कमतर रचना की तरह बर्ताव संविधान से आंख मिचौली है।पहले के दिनों में प्रतिबिंध प्राकृतिक कारणों से था जब महिलाओं को कमजोर माना गया था।

हालांकि जस्टिस इंदू मल्होत्रा की अलग राय थी। उन्होंने कहा कि कोर्ट को धार्मिक परंपराओं में दखल नहीं देना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे का दूर तक असर जाएगा।धार्मिक परंपराओं में कोर्ट को दखल नहीं देना चाहिए। अगर किसी को किसी धार्मिक प्रथा में भरोसा है तो उसका सम्मान हो। ये प्रथाएं संविधान से संरक्षित हैं। समानता के अधिकार को धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के साथ ही देखना चाहिए। कोर्ट का काम प्रथाओं को रद्द करना नहीं है।

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