एनसीएलटी को सदस्यों के रजिस्टर में शेयर पूंजी आवंटन, परिवर्तन और उसमें संशोधन करने का अधिकार दिया: दिल्ली हाईकोर्ट [निर्णय पढ़ें]

दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) को किसी कंपनी के सदस्यों के रजिस्टर में शेयर पूंजी आवंटन, परिवर्तन और उसमें संधोधान का अधिकार है और इस बारे में कोई सिविल मुकदमा हाईकोर्ट में नहीं सुना जाएगा।

न्यायमूर्ति प्रतिभा एम सिंह एसएएस होस्पिटेलिटी प्राइवेट लिमिटेड से जुड़े एक मुकदमे की सुनवाई कर रही थीं। इस मामले में यह घोषणा करने की मांग की गई कि कुछ प्रतिवादियों को आवंटित शेयर को अवैध घोषित किया जाए। प्रतिवादी ने दलील दी थी कि कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 430 और धारा 434 (1) (सी) में निहित इस बारे में प्रतिबंध को देखते हुए उच्च न्यायालय में यह मुकदमा नहीं सुनी जानी चाहिए।

कंपनी अधिनियम, 2013 के प्रावधानों का जिक्र करते हुए अदालत ने पाया कि एनसीएलटी न केवल नए अधिनियम के तहत कंपनी अदालत के अधिकार क्षेत्र का प्रयोग कर रहा है, बल्कि उसके पास अवमानना के लिए दंडित करने का अधिकार भी है। यह कहा गया है कि एनसीएलटी को सिविल कोर्ट जैसे सभी अधिकार मिले हुए हैं और नवीनतम संशोधन के तहत धारा 430 के तहत प्रतिबंध को सक्रिय किया गया है।

अदालत ने अभियोगी कंपनी के तर्क को भी खारिज कर दिया जिसने कहा था की अगर रजिस्टर में सुधार की जरूरत है तो यह सिर्फ सिविल कोर्ट के समक्ष ही हो सकता है।

न्यायाधीश ने कहा: “वर्तमान मामले में आरोप 2013 अधिनियम की धारा 62 की शर्तों का अनुपालन नहीं करने से संबंधित हैं…इन आरोपों की पड़ताल करने का अधिकार क्षेत्र, 2013 अधिनियम की धारा 242 के तहत ट्रिब्यूनल को है… ये शक्तियां बेहद व्यापक हैं और सिविल कोर्ट जो कर सकती है उससे ज्यादा हैं। यहां तक कि वर्तमान मामले में, अदालत अगर अभियोगी को पूरी सुनवाई के बाद मांगी गई राहत दे देती है, तो कंपनी के विनियमन और उसके प्रशासन के बारे में प्रभावी आदेश इस सुनवाई में नहीं दिया जा सकता। ऐसे आदेश केवल एनसीएलटी ही दे सकता है जिसके पास कंपनी के मामलों को निपटाने का क्षेत्राधिकार है”।

मुकदमे को खारिज करते हुए, अदालत ने कहा कि, 2013 अधिनियम की धारा 242 (2) के तहत, हस्तांतरण या शेयरों के आवंटन पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं और ऐसे आदेश देने केअधिकार एनसीएलटी को प्राप्त हैं।

 

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