जीवन के संध्याकाल में माँ-बाप का उत्पीड़न होने देना क्रूरता है; बॉम्बे हाईकोर्ट ने बहू को घर छोड़ने को कहा [निर्णय पढ़ें]

जीवन के संध्याकाल में माँ-बाप का उत्पीड़न होने देना क्रूरता है; बॉम्बे हाईकोर्ट ने बहू को घर छोड़ने को कहा [निर्णय पढ़ें]

बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में एक वरिष्ठ दंपति के पक्ष में फैसला दिया जो अपने बेटे और उसकी पत्नी के साथ खार, मुंबई के एक फ्लैट में रह रहे हैं।

न्यायमूर्ति शलिनी फनसालकर जोशी ने वरिष्ठ दंपति की बहू सिमरन को उस फ्लैट से निकल जाने का आदेश दिया। जज ने कहा की उम्र के संध्याकाल में वह बूढ़े दंपति के उत्पीड़न की इजाजत नहीं दे सकतीं और बहू को आदेश दिया की वह अपने लिए कोई वैकल्पिक आवास ढूंढ ले।

पृष्ठभूमि

इससे पहले निचली अदालत ने उनके बेटे को 19 जुलाई 2018 को इस फ्लैट को छह माह के भीतर खाली करने का आदेश दिया था पर इस नोटिस को ठुकरा दिये जाने के बाद उन्होंने इसकी तामील के लिए अपील की।

हालांकि, राजेश (अपीलकर्ता के बेटे) ने 45 से अधिक घर दिखाने के बाद भी सिमरन उनमें से किसी भी घर को रहने के लिए नहीं चुना।

अपीलकर्ता के अनुसार, घर से सिमरन को निकालने के बहुत ही बाध्यकारी कारण हैं। यह फ्लैट अपीलकर्ता ने खरीदा था और राजेश को इस घर में हिस्सेदारी उसी स्थिति में दी गई जब वह इस बात पर सहमत हुआ की वह बाद में इसे चुका देगा। पर वह ऐसा करने में विफल रहा। महत्त्वपूर्ण यह है कि 23 मार्च 2015 को राजेश ने एक उपहार करार किया और फ्लैट में अपनी हिस्सेदारी अपनी माँ को हस्तांतरित कर दिया।

70 साल पूरे कर लेने के बाद वरिष्ठ दंपति ने कहा कि उनके लिए अब अपनी बहू के साथ रहना संभव नहीं है क्योंकि वह गाली देती है और बहुत ही आक्रामक है और उनका उत्पीड़न करती है।

सिमरन ने 72-वर्षीय श्वसुर के खिलाफ आपराधिक और छेड़छाड़ का मामला भी दायर कर दिया। इसकी वजह से इस फ्लैट के आम क्षेत्र में सीसीटीवी कैमरे लगवाने पड़े।

सिमरन ने अपने बचाव में कहा कि उसे इस घर से बेदखल नहीं किया जा सकता।

फैसला

कोर्ट ने इस बात पर गौर किया कि कैसे सिमरन ने मध्यस्थता के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था और किसी अन्य आवास में चले जाने के प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया था।

इस स्थिति में, अपीलकर्ताओं को, जो कि अपने जीवन के अंतिम चरण में हैं, इस तरह प्रतिवादी नंबर दो के हाथों उत्पीड़ित होने की अनुमति नहीं दी जा सकती और क्योंकि ऐसा करना उनके खिलाफ क्रूरता होगी। फिर, अगर प्रतिवादी नंबर 2 प्रतिवादी नंबर 1 के हाथों यौन उत्पीड़न के आरोप लगा रही है तो उस स्थिति में फिर यह समझना मुश्किल हो जाता है कि वह उस घर में रहना क्यों चाहती है। उनके घर में लगे सीसीटीवी कैमरे को भी चलाने के स्थिति में नहीं रहने दिया जा रहा है। यह कोर्ट इस बात को कह चुका है कि प्रतिवादी नंबर 2 ने जिस तरह के आरोप प्रतिवादी नंबर 1 के खिलाफ लगाए हैं, दोनों ही पक्षों के लिए साथ रहना इनमें से किसी के भी हित में नहीं होगा”

इस तरह कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली और सिमरन को इस मकान से एक महिना के भीतर निकल जाने को कहा है।