पूर्व महिला जज की फिर से नियुक्ति की याचिका पर SC ने MP हाईकोर्ट रजिस्ट्रार को नोटिस जारी किया, हाईकोर्ट जज पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाकर दिया था महिला जज ने इस्तीफा

पूर्व महिला जज की फिर से नियुक्ति की याचिका पर SC ने MP हाईकोर्ट रजिस्ट्रार को नोटिस जारी किया, हाईकोर्ट जज पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाकर दिया था महिला जज ने इस्तीफा

न्यायमूर्ति एके सीकरी और न्यायमूर्ति अशोक भूषण की सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने शुक्रवार को मध्य प्रदेश की पूर्व अतिरिक्त जिला एवं सेशन जज की याचिका पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार को नोटिस जारी कर 6 हफ्ते में जवाब मांगा है। याचिका में पूर्व महिला जज ने फिर से अपनी नियुक्ति की मांग की है। महिला जज ने 2014 में हाईकोर्ट के जज न्यायमूर्ति एसके गैंगले पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था।पीठ 6 सप्ताह के बाद मामले को सुनेगी।

याचिकाकर्ता की ओर से उपस्थित वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने इस मामले की जल्द सुनवाई की मांग करते हुए कहा कि मामले में राहत की मांग वरिष्ठता के साथ बहाली के लिए की गई है।

पूर्व जज ने आरोप लगाया है कि उसका इस्तीफा "रचनात्मक बर्खास्तगी” के तहत हुआ और उन्हें ये इस्तीफा मजबूरी में देना पड़ा क्योंकि उन्होंने अपने वरिष्ठ की अनैतिक मांगों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था।

महिला जज ने 2014 में इस्तीफा देने के बाद न्यायमूर्ति गैंगले पर उत्पीड़न का आरोप लगाया था और तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढा और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जजों के पास विस्तृत शिकायत दर्ज कराई थी।अप्रैल 2015 में राज्यसभा अध्यक्ष हामिद अंसारी ने न्यायमूर्ति विक्रमजीत सेन की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय न्यायिक समिति को आरोपों की जांच करने के लिए गठित किया था।

 उसके बाद न्यायमूर्ति सेन की सेवानिवृत्ति के बाद न्यायमूर्ति रंजन गोगोई को फरवरी 2016 में पैनल का प्रमुख नियुक्त किया गया।हालांकि न्यायमूर्ति गोगोई ने जांच से खुद को अलग कर लिया था जिसके बाद न्यायमूर्ति आरएफ नरीमन की समिति के प्रमुख के तौर पर नियुक्ति हुई।

इसी तरह कई बदलाव के बाद अंतिम पैनल जिसमें न्यायमूर्ति आर बानुमति,  न्यायमूर्ति मंजुला चेल्लूर और वरिष्ठ वकील केके वेणुगोपाल शामिल थे, ने पिछले साल दिसंबर में पाया कि आरोप "साबित नहीं हुए" और ये कार्य उच्च न्यायालय द्वारा नियमित जिला प्रशासन / पर्यवेक्षी शक्ति के प्रयोग तहत न्यायमूर्ति गैंगले के आचरण का हिस्सा था। हालांकि यह निष्कर्ष भी निकाला गया था कि शिकायतकर्ता महिला जज एक अच्छी अधिकारी थी जो गलत इंप्रेशन का शिकार हो गई थी और  उच्च न्यायालय ने मध्य अवधि में उन्हें स्थानांतरित करने में मानवतावादी दृष्टिकोण दिखाने में कमी की थी। चूंकि शिकायतकर्ता महिला न्यायिक अधिकारी को दूर-दराज के नक्सल प्रभावित स्थान पर भेजा गया और उस वक्त उनकी बेटी बोर्ड परीक्षा के लिए बैठना था इसलिए भी उन्हें इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा। समिति का मानना ​​था कि अगर उनकी दिलचस्पी है तो उन्हें फिर से बहाल किया जा सकता है। हालांकि यह भी कहा गया कि ऐसे दिशानिर्देश देना उसके अधिकारक्षेत्र में नहीं है।