कोर्ट आदेशों का पालन ना करने पर सुप्रीम कोर्ट ने आम्रपाली निदेशकों को पुलिस हिरासत में भेजा, कहा फोरेंसिक ऑडिट के लिए कागजात ना देने तक रहेंगे हिरासत में

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक बड़ा कदम उठाते हुए आम्रपाली ग्रुप के तीन निदेशकों को तब तक के लिए पुलिस हिरासत में भेज दिया जब तक कि वो अपने खातों के दस्तावेज फोरेंसिक ऑडिट के लिए ऑडिटर्स को ना दे दें।

जस्टिस अरूण मिश्रा और जस्टिस यू यू ललित की पीठ ने 26 सितंबर के आदेश का पालन ना करने पर अनिल शर्मा, शिवप्रिय और अजय कुमार को अवमानना नोटिस भी जारी कर दिए।

सुनवाई के दौरान जस्टिस मिश्रा ने कहा कि अदालत ने 26 सितंबर को 24 घंटे के भीतर ये रिकॉर्ड ऑडिटर्स को देने के लिए कहा था लेकिन इन आदेशों का पालन नहीं किया गया। ये निदेशक अदालत के साथ हाईड एंड सीक खेल रहे हैं। ये कोर्ट की कार्रवाई का मखौल है।

पीठ ने कहा कि दस्तावेज देने में एक दिन लगे या फिर एक महीना, तीनों पुलिस हिरासत में ही रहेंगे।

पीठ ने तीनों के पासपोर्ट भी जब्त करने के आदेश जारी किए हैं। कोर्ट अगली सुनवाई 24 अक्तूबर को करेगा।

दरअसल रियल इस्टेट फर्म आम्रपाली  में फ्लैट बुक कराने वाले सैंकड़ों खरीददारों ने अपने हितों की रक्षा की गुहार लगाते हुये सु्प्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। इन खरीददारों का अनुरोध है कि उन्हें भी बैंकों और वित्तीय संस्थानों की तरह ही सुरक्षित देनदार माना जाये। उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में आम्रपाली सेन्चूरियन पार्क-लो राइज परियोजना, आम्रपाली सेन्चूरियन पार्क-टेरेस होम्स और आम्रपाली सेन्चूरियन पार्क-ट्रापिकल गार्डन परियोजना में फ्लैट खरीदने वालों को न तो अभी तक घर मिले हैं और न ही इनमे निवेश की गयी उनकी गाढ़ी कमाई ही वापस मिली है। इन परियोजनाओं में चरणबद्ध तरीके से करीब 40 टावरों में पांच हजार से अधिक फ्लैट का निर्माण होना था।

याचिका बिक्रम चटर्जी और अन्य खरीददारों ने दायर की है। इसमें आम्रपाली सिलकन सिटी  को दिवालिया घोषित करने के लिये बैंक आफ बड़ौदा के मामले में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल का आदेश रद्द करने की मांग की गई है। ट्रिब्यूनल ने पिछले साल चार सितंबर को बैंक ऑफ बड़ौदा की याचिका पर इस फर्म के खिलाफ दिवालिया घोषित करने संबंधी कानून के तहत कार्रवाई शुरू करने का आदेश दिया था। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल में रियल इस्टेट फर्म के खिलाफ दिवालिया घोषित करने की कार्रवाई शुरू होने के बाद धन वसूलने के लिये दीवानी अदालतों की डिक्री और उपभोक्ता आयोग के आदेशों पर अमल नहीं हो सकता है।

याचिका में रियल एस्टेट फर्मों का ‘फारेन्सिक आडिट’ करा कर मकान खरीदारों के योगदान का पता लगाने और उनके द्वारा निवेश किए गए धन की रक्षा करने का भी अनुरोध किया गया है।

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