हाईकोर्ट ऑर्डर शीट में कही गई बातों का उल्लंघन नहीं हो सकता; सुप्रीम कोर्ट ने कहा – मुकदमादार एक ही मुकदमे में परस्पर विरोधी रुख अख़्तियार नहीं कर सकता [निर्णय पढ़ें]

सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट के एक आदेश को खारिज करते हुए कहा कि हाईकोर्ट में क्या हुआ इस बारे में अदालत के ऑर्डर शीट में जो बातें कही गई होती हैं वे पवित्र होती हैं और उसका उल्लंघन नहीं हो सकता।

सुज़ुकी परसरामपुरिया सूटिंग्स प्राइवेट लिमिटेड ने कंपनी जज के समक्ष एक आवेदन देकर एमपीएल के सुरक्षित ऋणदाता के रूप में आईएफसीआई के बदले किसी और को नियुक्त करने की मांग की। पर कंपनी जज ने यह कहते हुए यह आवेदन अस्वीकार कर दिया कि कंपनी न तो बैंक है, न बैंकिंग कंपनी, न कोई वित्तीय कंपनी या फिर प्रतिभूतिकरण कंपनी और न पुनर्संरचना कंपनी और इस तरह एसएआरएफएईएसआई अधिनियम के उद्देश्य से आईफसीआई के बदले किसी और को नहीं नियुक्त कर सकता। कंपनी जज ने कहा कि इस उद्देश्य के लिए कंपनी को ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट की धारा 130 के तहत कोई लाभ नहीं मिल सकता है।

पुनर्विचार याचिका में कंपनी ने कहा कि एक सुरक्षित ऋणदाता के रूप में उसने कभी भी स्थानापन्न की मांग नहीं की और वह सिर्फ ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट की धारा 130 के तहत  कार्रवाई होने लायक दावे के अंतरिती के रूप में स्थानापन्न चाहती थी।  कंपनी की पुनर्विचार याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि इस आवेदन के द्वारा एक पूर्णतः नया मामला बनाए जाने की मांग की गई।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष वरिष्ठ वकील हरिन पी रावल ने कहा कि उसने कभी भी आईएफसीआई के बदले किसी सुरक्षित ऋणदाता की मांग नहीं की।

पर मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, नवीन सिन्हा और केएम जोसफ की पीठ ने हाईकोर्ट के ऑर्डर शीट और दलील को पढ़ने के बाद कहा, “अपीलकर्ता का यह कहना कि उसने कभी भी एसएआरएफएईएसआई अधिनियम के तहत एक सुरक्षित ऋणदाता के रूप में स्थानापन्न की मांग नहीं की, 7 सितंबर 2015 के आदेश में जो बातें कही गई हैं उससे अतिरिक्त रूप से झूठा साबित हुआ है। इस अदालत ने कई बात इस बात को दुहराया है कि हाईकोर्ट में क्या हुआ इस बारे में ऑर्डर शीट में जो बातें कही गई हैं वे अलंघनीय हैं”।

न्यायमूर्ति सिन्हा जिन्होंने इस फैसले को लिखा, अमर सिंह बनाम भारत संघ मामले में आए फैसले को इस बारे में उद्धृत किया : “कोई मुकदमादार अलग अलग समय पर अलग अलग रुख अख़्तियार कर सकता है पर वह उसी मामले में परस्पर विरोधी रुख नहीं अख़्तियार कर सकता…”।

 

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