हर मामले में गैर-न्यायिक कबूलनामे की पुष्टि की जरूरत नहीं : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]

सुप्रीम कोर्ट ने बैंक के एक चपरासी को मिली सजा को सही ठहराते हुए कहा कि आरोपी के गैर न्यायिक कबूलनामे को हर मामले में अलग से स्वतंत्र रूप से सत्यापित करने की जरूरत नहीं है।

“अगर कोर्ट इस बारे में आश्वस्त है कि कबूलनामा स्वैच्छिक है, तो इस आधार पर सजा सुनाई जा सकती है। विवेक यह नहीं कहता कि कबूलनामे में जिन परिस्थितियों की चर्चा की गई है उनमें से सभी का स्वतंत्र रूप से सत्यापन किया जाए,” न्यायमूर्ति आर बानुमती और इन्दिरा बनर्जी की पीठ ने राम लाल बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य मामले में यह बात कही।

इस मामले में दो वरिष्ठ अधिकारियों ने कबूलनामे की जांच की। कबूलनामे में इस चपरासी ने कबूल किया था कि उसने ग्राहक की राशि को खाते में जमा नहीं करता था और जब खाताधारक बैंक पैसे निकालने के लिए आता था तो वह उनके खाते में गलत क्रेडिट दिखाता था और उन फर्जी एंट्रीज़ के बल पर पैसे निकालता था।

आरोपी के वकील की दलील थी कि उसका कबूलनामा स्वैच्छिक नहीं था और अधिकारियों ने उस पर दबाव डालकर इसे कबूल करने को कहा।

पीठ ने वकील की इस दलील को खारिज कर दिया और कहा, “भय या प्रलोभन ही काफी नहीं है; कोर्ट की राय में, इस तरह के प्रलोभन ने अवश्य ही आरोपी के मन में काफी हद तक विश्वास पैदा किया होगा जिसके कारण आरोपी ने अपराध कबूल किया यह सोचते हुए कि इससे उसको फायदा होगा”।

पीठ ने कहा कि गवाहों से यह नहीं पूछा गया कि गैर कानूनी कबूलनामा किसी धमकी, प्रलोभन या लालच का नतीजा था।

नतीजे से सहमति जताते हुए पीठ ने कहा, “स्वीच्छिक कबूलनामे के आधार पर सजा सुनाना स्थापित प्रक्रिया है पर बुद्धिमता का नियम यह कहता है कि जहां भी संभव हो, इसको स्वतंत्र साक्ष्यों के आधार पर स्त्यापित किया जाए। हर मामले में आरोपी के गैर न्यायिक कबूलनामे को सत्यापित करने की जरूरत नहीं है”। इसके बाद कोर्ट ने इस मामले में मदन गोपाल कक्कड़ बनाम नवल दुबे एवं अन्य (1992) का जिक्र किया और पियारा सिंह एवं अन्य बनाम पंजाब राज्य मामले का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि इन सभी मामलों में ऐसा नहीं कहा गया कि गैर न्यायिक कबूलनामे को हर मामले में स्त्यापित किया जाए। विवेक यह कहता है कि हर मामले में गैर न्यायिक कबूलनामे के सत्यापन की जरूरत नहीं है।

 

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