विभागीय जांच के गैर कानूनी साबित होने के बाद ही श्रम अदालत मेरिट के आधार पर मामले की जांच कर सकता है; सुप्रीम कोर्ट ने ड्यूटी पर शराब पीकर आने वाले बैंकर की बर्खास्तगी को सही ठहराया [निर्णय पढ़ें]

सुप्रीम कोर्ट ने ड्यूटी पर शराब के नशे में धुत पाये जाने वाले एक बैंककर्मी की बर्खास्तगी को सही ठहराया और किसी कर्मचारी की बर्खास्तगी के बारे में औद्योगिक संदर्भ की जाँच के बारे में श्रम अदालत को हिदायत दी।

न्यायमूर्ति अभय मननोहर सप्रे और एस अब्दुल नज़ीर की पीठ ने कहा कि औद्योगिक संदर्भ का हवाला देने के क्रम में श्रम अदालत को आरोपों की जांच करने का अधिकार तभी मिलता है जब विभागीय जांच को गैर कानूनी ठहरा दिया गया है।

इस मामले में, कैशियर के रूप में कार्यरत बैंककर्मी को विभागीय जांच में ड्यूटी पर शराब पीने का दोषी पाया गया। उसी दिन कैश में 35  हजार रुपए की कमी भी पाई गई। अपीली प्राधिकरण ने कर्मचारी की अपील ठुकरा दी थी।

बाद में, उसके आग्रह पर राज्य ने श्रम अदालत में अपील की और श्रम अदालत ने इस बात की जांच किए बिना कि विभागीय जांच कानूनी या उचित थी कि नहीं, उसने बैंककर्मी के खिलाफ जांच अधिकारी की रिपोर्ट को खारिज कर दिया।

इसके बाद बैंक ने हाईकोर्ट में अपील की जिसने श्रम अदालत के आदेश को खारिज कर कर्मचारी की बर्खास्तगी को जायज ठहराया। बैंककर्मी ने इस फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि श्रम अदालत को कर्मचारी के खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच का अधिकार तभी है जब विभागीय जांच को गैर कानूनी करार दे दिया गया है और नियोक्ता ने आरोपों को साबित करने के लिए सबूत पेश करने की अनुमति मांगी है और इसके अनुमति दिये जाने के बाद उसने साक्ष्य प्रस्तुत किए हैं। कोर्ट ने इस प्रक्रिया के बारे में जो बातें कहीं,सारांशतः वे इस तरह से हैं –

  • श्रम अदालत पहले यह निर्णय करे कि विभागीय जांच सही और कानूनी है कि नहीं।
  • श्रम अदालत ऐसा करते हुए सिर्फ साक्ष्यों पर ही गौर करेगी और वह इसके आगे नहीं जाएगी।
  • श्रम अदालत पहली ही बार में सभी पक्षों को दुर्व्यवहार सहित सभी मामलों के बारे में साक्ष्य प्रस्तुत करने को नहीं कहेगी।
  • अगर विभागीय जांच कानूनन वैध और उचित है तो श्रम अदालत को यह देखना है कि जो सजा दी गई है वह अपराध के अनुरूप है कि नहीं।
  • इस क्रम में श्रम अदालत को सिर्फ आरोपों की प्रकृति और उसकी गंभीरता के जांच करनी है और अन्य बातों के अलावा कर्मचारी की सेवा रेकॉर्ड और जांच अधिकारी की जांच रिपोर्ट की जांच पर गौर करना है।
  • अगर प्राथमिक जांच गैर कानूनी है और वह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है और कर्मचारी के प्रति दुर्भावनापूर्ण है तो नियोक्ता को कर्मचारी के खिलाफ अपने दुर्व्यवहार को श्रम अदालत के समक्ष सिद्ध करना होगा बशर्ते कि उसने आरोपों को मेरिट के आधार पर साबित करने की अनुमति मांगी है।
  • श्रम अदालत जांच अधिकारी की रिपोर्ट को अपीली अदालत की तरह जांच नहीं कर सकता।
  • अगर कर्मचारी के खिलाफ आरोपों को साबित माना जाता है तो इसके बाद इस बात की जांच की जानी है कि उसे जो सजा दी गई है वह उसके अपराध के अनुरूप है कि नहीं।
  • अगर कर्मचारी के खिलाफ लगाए गए आरोपों की पुष्टि नहीं होती है तो उसको नौकरी पर पूर्ण या आंशिका बकाये वेतन के साथ, जैसा भी निर्णय होग, नौकरी पर दुबारा बहाल किया जाएगा।
  • बकाया वेतन कर्मचारी को तभी मिलेगा जब वह यह साबित करेगा कि नौकरी से बाहर रहने के दौरान उसे कोई नौकरी नहीं मिली और वह उसके दौरान बेरोजगार रहा।

सुप्रीम कोर्ट ने श्रम अदालत के फैसले को निरसते करने को लेकर हाईकोर्ट ने जो कारण बताए उसको नामंज़ूर किया। पीठ ने कहा, “…हाईकोर्ट जांच के क्रम में तथ्यों के क्षेत्र में गया और हमारी राय में उसे इसकी इजाजत नहीं है…”।

कोर्ट ने कहा कि इस बात के कोई संकेत नहीं हैं कि विभागीय जांच गलत और गैर कानूनी थी और जांच की प्रक्रिया से कर्मचारी के खिलाफ प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्त का उल्लंघन हुआ और इस वजह से कर्मचारी के खिलाफ दुर्भावना का वातावरण तैयार हुआ।

इसके बाद कोर्ट ने उसको मिली सजा की जांच की। कोर्ट ने कहा कि उसके खिलाफ पहला आरोप ड्यूटी पर शराब पीने का था और जांच में यह आरोप सही पाया गया…दूसरा आरोप 35 हजार रुपए कैश की कमी पाये जाने का था और यह भी सही पाया गया। यह भी विवाद से परे है कि वह कैशियर के रूप में कार्यरत था। वह उस दिन काम पर था। इसलिए वह कैश में कमी पाये जाने के लिए प्रत्यक्षतः जिम्मेदार था”।

इसके बाद पीठ ने अपने निष्कर्ष में कहा कि कर्मचारी को बर्खास्त करने के आदेश में कोई गड़बड़ी नहीं है और न ही यह कहा जा सकता है कि उसको अपराध के बदले ज्यादा सजा दी गई है।

 

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