कोर्ट के आदेश पर नौकरी में बहाल किए जाने का अर्थ यह नहीं कि कामगार बकाया वेतन भी पाने का अधिकारी है : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]

सिर्फ इसलिए कि किसी कामगार की बर्खास्तगी को निरस्त करते हुए कोर्ट ने सेवा में उसके पुनर्बहाली का आदेश दिया है, उसे अपने नियोक्त से बकाया वेतन पाने का दावा करने का अधिकार नहीं है”।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर किसी कामगार की बर्खास्तगी के खिलाफ कोर्ट फैसला देता है और उसको दुबारा काम पर रखा जाता है तो कोर्ट ऐसे कामगार को बकाया वेतन दिये जाने को उसका अधिकार मानकर इस बारे में कोई आदेश नहीं दे सकता।

राजस्थान राज्य सड़क परिवहन निगम बनाम श्री फूल चंद मामले में श्रम अदालत ने निगम के एक ड्राईवर नौकरी से निकाले जाने के दंड को बदलकर उसके सम्मिलित प्रभाव के बिना, उसको चार वार्षिक बढ़ोतरी नहीं देने की सजा में बदल दिया और इस मृत कामगार को नौकरी में बहाल करने का आदेश दिया। अपने आदेश में उसने यह भी कहा था कि उसे 13 साल का पूरा बकाया वेतन दिया जाए। हाईकोर्ट ने इस आदेश के खिलाफ दायर अपील को खारिज कर दिया और इसके बाद राज्य ने सुप्रीम कोर्ट में इसके खिलाफ अपील की।

न्यायमूर्ति अभय मनोहर सप्रे और एस अब्दुल नज़ीर की पीठ ने कहा कि किसी कामगार को अगर कोर्ट के फैसले की वजह से दुबारा काम पर रखा जाता है तो उसे अपने नियोक्ता से अधिकारतः बकाया वेतन प्राप्त करने का अधिकार नहीं है।

कामगार को साबित करना है कि वह बकाया वेतन पाने का अधिकारी है

कोर्ट ने कहा, “इस तरह के मामले में कामगार के लिए यह जरूरी है कि वह पूरे साक्ष्य के साथ यह साबित करे कि नौकरी से निकाले जाने के बाद उसके पास किसी तरह का रोजगार नहीं था और अपने और अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए वह कुछ भी अर्जित नहीं कर रहा था। नियोक्ता को भी यह साबित करना होगा कि कामगार इस दौरान कहीं काम कर रहा था और इसलिए वह बकाया वेतन पाने का हकदार नहीं है। पर शुरुआत में यह साबित करने की ज़िम्मेदारी कर्मचारी की है”।

पीठ ने आगे कहा कि हर मामले में तथ्यों को देखते हुए, बकाया वेतन देने से पूरी तरह इनकार किया जा सकता है या यह आंशिक ही दिया जा सकता है। कोर्ट ने इस बारे में कई मामलों में दिये गए फैसलों का भी जिक्र किया जिसमें कहा गया था कि बकाए वेतन के बारे में निर्णय किस तरह से लिये जाने की जरूरत है और इसके लिए किन बातों पर गौर करने की जरूरत है।  पीठ ने इस मामले के बारे में कहा कि बकाए वेतन के बारे में निर्णय करने के लिए कोर्ट के समक्ष पर्याप्त सबूत नहीं रखे गए हैं।

हालांकि, पीठ ने इस मामले में अनुच्छेद 142 के तहत कामगार को इस मुकदमे पर हुए खर्च और को देखते हुए मृतक के परिजन को उसके बकाए वेतन का 50 फीसदी राशि देने का आदेश दिया।

 

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