उत्तराखंड हाईकोर्ट ने झूठा हलफनामा दायर करनेवाले अधिवक्ता पर 2 लाख का जुर्माना लगाया [निर्णय पढ़ें]

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने झूठा हलफनामा दायर करनेवाले अधिवक्ता पर 2 लाख का जुर्माना लगाया [निर्णय पढ़ें]

इस मामले पर कड़ा रुख अपनाते हुए न्यायमूर्ति लोक पाल सिंह ने कहा कि झूठा हलफनामा दायर करना शपथ भंग करने जैसा है क्योंकि हलफनामा को आईपीसी की धारा 191 के तहत साक्ष्य माना गया है। जज ने हालांकि, इस मामले में संयम बरतते हुए आईपीसी की धारा 193 के तहत शपथ भंग करने के आरोप में कार्रवाई का आदेश नहीं दिया।

 कोर्ट चन्द्र शेखर करगेती की याचिका पर सुनवाई कर रहा था जो उसने सीआरपीसी की धारा 482 के तहत दायर किया था जिसमें उसने अपने खिलाफ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 31(p) और 31(q) के तहत लगाए गए अभियोगों को खारिज करने की मांग की थी।

 करगेती पर आरोप था कि उसने कुछ अन्य लोगों के साथ मिलकर शिकायतकर्ता गीता राम नौटियाल, सचिव, उत्तराखंड अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आयोग के खिलाफ झूठे आरोप लगाए थे। करगेती नौटियाल को भ्रष्ट अधिकारी बताते हुए फेसबुक पर उसके खिलाफ झूठा पोस्ट लिख रहा था।

 चार्जशीट के आधार पर विशेष जज (एससी/एसटी अधिनियम), देहरादून ने इन अपराधों का संज्ञान लिया और करगेती को सम्मन जारी किया।

 करगेती ने अब इस प्रक्रिया को हाईकोर्ट में चुनौती दी है और कहा है कि नौटियाल ब्राह्मण है और वह अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में नहीं आता। नौटियाल ने अपने बचाव में चकराता,  देहरादून जिला, के तहसीलदार द्वारा जारी जाति प्रमाणपत्र पेश किया जो उसे 1998 में जारी किया गया था और जिसमें कहा गया था कि वह जौनसारी अनुसूचित जाति समुदाय का है।

 कोर्ट ने इन दस्तावेजों की जांच के बाद कहा कि करगेती ने कोर्ट से मनमाफिक आदेश प्राप्त करने के लिए कोर्ट के समक्ष झूठा हलफनामा दायर किया था और कहा कि अपने दावे के समर्थन में वह कोई सबूत पेश नहीं कर पाया।

यह निष्कर्ष निकालते हुए कोर्ट ने कहा कि आवेदनकर्ता को कोई राहत नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने कहा, “...कोर्ट यह मानता है कि आवेदक से इसकी भारी कीमत वसूली जानी चाहिए। आवेदक कोई साधारण व्यक्ति नहीं है, वह एक अधिवक्ता है, उसे शपथ के तहत बयान देने के समय ज्यादा सतर्क और सावधान रहना चाहिए, पर उसने ...शपथ के तहत कोर्ट के समक्ष झूठे बयान दर्ज किये।”

 इसलिए कोर्ट ने इस अधिवक्ता पर दो लाख रूपए का जुर्माना लगाया ताकि “हलफनामे की पवित्रता” बची रह सके। उसे एक महिना के अंदर यह राशि रजिस्ट्री में जमा करने का निर्देश दिया गया।