शपथ भंग के मामले में कोर्ट अवमानना के अपने क्षेत्राधिकार का प्रयोग कर सकता है : दिल्ली हाईकोर्ट ने शपथ लेकर झूठ बोलने के लिए मुकदमादार को जेल भेजा [निर्णय पढ़ें]

शपथ भंग के मामले में कोर्ट अवमानना के अपने क्षेत्राधिकार का प्रयोग कर सकता है : दिल्ली हाईकोर्ट ने शपथ लेकर झूठ बोलने के लिए मुकदमादार को जेल भेजा [निर्णय पढ़ें]

दीवानी मामले से जुड़े सभी पक्ष के लोग कोर्ट के समक्ष शपथ लेते हैं कि वे सिर्फ सच बता रहे हैं और सच के सिवा और कुछ भी नहीं कहेंगे। पर अगर यह साबित हो गया कि उन्होंने झूठ बोला है तो क्या उन्हें अवमानना के आरोप में सजा दी जा सकती है?

 मंगलवार को दिल्ली हाईकोर्ट को इसी तरह के प्रश्न से दो-चार होना पड़ा।

 कोर्ट के समक्ष दायर मामले में बचाव पक्ष ने कुछ ऐसे बयान दिए जिसे कोर्ट द्वारा नियुक्त आयुक्त ने झूठा पाया। वादी ने कोर्ट के समक्ष झूठ बोलने का आरोप लगाते हुए अवमानना का मामला दर्ज कराया।

 बचाव पक्ष के वकील ने कहा कि अवमाननाकर्ता ने खुली अदालत में न तो किसी पर हमला किया है और न ही अदालत में जज को अपमानित किया और न ही वह न्याय के प्रशासन में कोई रुकावट डाला है और इसलिए यह कोर्ट की अवमानना करने की परिधि में नहीं आता।

 हाईकोर्ट ने पाया कि धनंजय शर्मा बनाम हरियाणा राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक मुकदमादार को अवमानना के आरोप में सजा दी थी क्योंकि उस व्यक्ति ने गवाह की ओर से झूठा हलफनामा दायर किया था। कोर्ट ने यह भी कहा कि शपथ भंग के मामले में कोर्ट अवमानना के अपने अधिकार-क्षेत्र का प्रयोग कर सकता है।

 दिलचस्प बात यह है कि बचाव पक्ष के वकील ने भी कहा कि उसके मुवक्किल ने झूठ बोला। न्यायमूर्ति मनमोहन ने उसकी प्रशंसा की और कहा, “...यह अदालत प्रतिवादी नंबर 2 के वकील नितिन मेहता की सच्चाई और उनकी ईमानदारी की प्रशंसा करता है...वकील (नीतिम मेहता) का व्यवहार बार की शीर्ष परंपरा के अनुरूप है।”

कोर्ट ने कहा कि अभियोग लगाने और कार्रवाई करने की लंबी-चौड़ी प्रक्रिया पर अमल करने की जरूरत नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रतिवादी ने कोर्ट के समक्ष झूठा बयान देकर शपथ भंग किया है। इस अदालत का मत है कि उसे  इसके खिलाफ अवमानाना की प्रक्रिया शुरू करने का अधिकार है।

कोर्ट ने प्रतिवादी को एक माह की साधारण कैद और 2000 रुपए के जुर्माने की सजा सुनाई।