जांच के दौरान धोखाधड़ी करने वाले मेडिकल कॉलेज पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाया 2 करोड़ का जुर्माना;स्वस्थ व्यक्ति को बीमार बताकर पेश कर रहा था

जांच के दौरान धोखाधड़ी करने वाले मेडिकल कॉलेज पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाया 2 करोड़ का जुर्माना;स्वस्थ व्यक्ति को बीमार बताकर पेश कर रहा था

न्यूनतम मानदंड का पालन करने के तहत अपने अस्पताल में स्वस्थ व्यक्ति को बीमार बताकर पेश कर याचिकाकर्ता ने जो धोखाधड़ी की है उस पर हमने गौर किया है”

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक मेडिकल कॉलेज पर 2 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया और उसकी याचिका भी खारिज कर दी। इस कॉलेज ने यह दिखाने के लिए कि वह न्यूनतम मानदंड का पालन कर रहा है, जांच के समय धोखाधड़ी की और स्वस्थ व्यक्ति को रोगी बताकर अपने अस्पताल में पेश किया।

महावीर इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज ने केंद्र सरकार के निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। केंद्र सरकार ने मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया के उस सुझाव को स्वीकार कर लिया था जिसमें उसने कहा था कि इस कॉलेज को 2018-19 अकादमिक सत्र से 150 छात्रों की सीट वाले एमबीबीएस कोर्स में बच्चों का प्रवेश लेने की अनुमति नहीं है।

यद्यपि वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने इस संस्थान की पैरवी की और उन्होंने कॉलेज के बारे में कई तथ्य सामने रखे पर न्यायमूर्ति एसए बोबडे और न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव की पीठ ने कहा कि इस मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में पर्याप्त कर्मचारी, मरीज, चिकित्सा उपकरण और अन्य सुविधाएँ हैं कि नहीं इसका निर्णय करने की स्थिति में वे नहीं हैं।

“(हमें) विशेषज्ञों के उस दल की रिपोर्ट पर निर्भर रहना होगा जिसने कहा है कि याचिकाकर्ता-कॉलेज में सुविधाएं पर्याप्त नहीं हैं। अगर इस जांच रिपोर्ट में कोई क्षेत्राधिकार विषयक गलती या कोई अन्य गलतियां नहीं हैं तो विशेषज्ञों की रिपोर्ट पर जो निर्णय लिया गया है उसमें कोर्ट दखल नहीं देगा,” पीठ ने कहा।

पीठ ने आगे कहा कि यह संस्थान धोखाधड़ी करने का दोषी है। कोर्ट ने कहा कि उसे रिपोर्ट में यह पढ़ने को मिला कि कॉलेज का मौके पर जाकर निरीक्षण करने के दौरान मौजूद रोगियों की संख्या के बारे में जो बताया गया था वह सही नहीं थी।

कोर्ट ने कहा, “...निरीक्षणकर्ताओं ने पाया कि अस्पताल में मौजूद मरीजों के संख्या सही नहीं थी। इन लोगों का कहना था कि मामूली मर्ज वाले लोगों को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। कुछ लोगों को मरीज बताकर पेश किया गया था पर उनकी स्थिति ऐसी नहीं थी कि उन्हें अस्पताल में भर्ती कराने की जरूरत थी। याचिकाकर्ता ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि उसे नए अकादमिक सत्र में छात्रों का प्रवेश लेने के लिए अनुमति चाहिए था और वह यह दिखाना चाहता था कि वह न्यूनतम मानदंड का पालन कर रहा है। याचिकाकर्ता आँखों में धूल झोंकने का दोषी है।”

यद्यपि वरिष्ठ वकील ने कहा कि निरीक्षण करने वाले को रोगियों के वास्तविक होने के बारे में अपनी राय रखने का अधिकार है,पीठ ने कॉलेज पर दो करोड़ का जुर्माना लगाने की सजा सुनाई।