अगर बार काउंसिल या बार एसोसिएशन का कोई सदस्य हड़ताल का आह्वान करता है, तो ऐसे व्यक्ति के कोर्ट में पेश होने पर रोक लगाएगा मध्य प्रदेश हाईकोर्ट [आर्डर पढ़े]

अगर बार काउंसिल या बार एसोसिएशन का कोई सदस्य हड़ताल का आह्वान करता है, तो ऐसे व्यक्ति के कोर्ट में पेश होने पर रोक लगाएगा मध्य प्रदेश हाईकोर्ट [आर्डर पढ़े]

न्याय प्राप्त करना मुकदमादारों को अधिकार है। ऐसा तभी हो सकता है जब देश में कोर्ट काम कर रहे हों। पर बार के सदस्य काम रोकने का निर्णय कर लोकतंत्र के इस तीसरे पाए को निष्क्रिय नहीं कर सकते। उनकी यह कार्रवाई देश में लोकतंत्रीय जीवन के उलट है।”

 मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की प्रथम पीठ ने राज्य बार काउंसिल और बार एसोसिएशन के सदस्यों और अधिकारियों द्वारा हड़ताल के आह्वान के खिलाफ महत्त्वपूर्ण निर्देश जारी किया है।

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूति हेमंत गुप्ता और न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला की पीठ ने हाईकोर्ट प्रशासन को ऐसे नियम बनाने का निर्देश दिया है कि ताकि बार के वे सदस्य जो अपने काम से अनुपस्थित रहते हैं उन्हें कोर्ट में पेश होने से रोक दिया जाएगा। पीठ ने यह भी कहा कि राज्य बार काउंसिल अगर अपनी भूमिका के निर्वहन में विफल रहता है तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

 पृष्ठभूमि

 एडवोकेट प्रवीण पाण्डेय ने राज्य बार काउंसिल द्वारा राज्य के एडवोकेट्स को 9 से 14 अप्रैल 2018 तक कोर्ट से अनुपस्थित रहने के आह्वान को चुनौती दी थी। अप्रैल में अपने एक पूर्व आदेश में पीठ ने इस हड़ताल को गैर क़ानूनी और असंवैधानिक करार दे दिया था। कोर्ट ने यह भी कहा था कि इस तरह का आह्वान एक एडवोकेट के मौलिक अधिकार का हनन है।

पीठ ने अपने निर्देश में कहा है कि अगर राज्य बार काउंसिल ने हड़ताल का आह्वान किया तो-




  • अगर इस हड़ताल के आह्वान के पहले मुख्य न्यायाधीश की अनुमति नहीं ली गई तो राज्य बार काउंसिल के पदाधिकारियों को एक माह के लिए किसी कोर्ट में पेशी से रोक दिया जाएगा;

  • अगर पूर्व निर्णय के एक साल के भीतर ही राज्य बार काउंसिल एक बार फिर काम रोकने का फैसला लेता है तो जिस दिन से इस हड़ताल का आह्वान किया गया उस तिथि से उस काउंसिल को ही निलंबित माना जाएगा। शुरू में इस तरह का निलंबन एक माह के लिए होगा;

  • उपरोक्त अवधि के दौरान बार काउंसिल का काम बार काउंसिल का पदेन सदस्य होने के कारण राज्य के महाधिवक्ता देखेंगे; और

  • अगर आगे काम से दूर रहने का कोई और आह्वान किया जाता है तो राज्य बार काउंसिल पर प्रतिबन्ध लगा रहेगा। राज्य के महाधिवक्ता काउंसिल का काम काज देखेंगे और छह माह के भीतर काउंसिल के चुनाव कराये जाएंगे। इस चुनाव में प्रतिबंधित बार काउंसिल के सदस्य तीन साल तक हिस्सा नहीं ले पाएंगे।


अगर हाईकोर्ट/जिला अदालत बार एसोसिएशन काम रोकने का आह्वान करता है तो -




  • राज्य बार काउंसिल इसमें हस्तक्षेप करेगा और इस तरह के आह्वान को तत्काल गैरकानूनी घोषित करेगा बशर्ते कि ऐसा मुख्य न्यायाधीश या जिला जज की सलाह से किया गया हो;

  • बार एसोसिएशन को अगर गैरकानूनी घोषित कर दिया जाता है तो उसके बाद राज्य बार काउंसिल एक महीने तक एसोसिएशन का काम काज देखने के लिए एक तदर्थ समिति नियुक्ति करेगा। एसोसिएशन के चुने हुए प्रतिनिधि को एक महीने तक कोर्ट में पेश होने की इजाजत नहीं होगी। अगर एसोसिएशन हड़ताल नहीं करने का निर्णय करता है तो उसके चुने हुए सदस्य काम काज संभाल सकते हैं;

  • अगर बार एसोसिएशन दुबारा हड़ताल का आह्वान करता है तो राज्य बार काउंसिल इस तरह के बार एसोसिएशन का दुबारा चुनाव कराएगा और प्रतिबंधित एसोसिएशन के सदस्य बार काउंसिल या बार एसोसिएशन के चुनाव में तीन साल तक हिस्सा नहीं ले पाएंगे; और

  • अगर राज्य बार काउंसिल उपरोक्त निर्देशों को लागू करने में विफल रहता है तो राज्य बार काउंसिल के बारे में यह माना जाएगा कि उन्होंने अपना पद छोड़ दिया है और काउंसिल का दुबारा चुनाव कराया आएगा।


बार एसोसिएशन कोई मजदूर संगठन नहीं है

कोर्ट ने कहा, “हड़ताल या काम रोकने से न्याय का प्रशासन बाधित होता है और यह एडवोकेट के कर्तव्यों से मेल नहीं खाता। बार एसोसिएशन कोई मजदूर संघ नहीं है और इसका गठन मजदूर संघ अधिनियम, 1926 के तहत नहीं हुआ है। मजदूर संघ को हड़ताल करने का अधिकार है ताकि वह कामगारों की मांगों को मानने के लिए दबाव डाल सके। पर एडवोकेट, यद्यपि बार एसोसिएशन के सदस्य होते हैं पर वे पेशेवर होते हैं जिनकी सेवाएं मुकदमादार लेते हैं ताकि वे कोर्ट में उनका प्रतिनिधित्व कर सकें। काम से दूर रहकर बार के सदस्य किसी की मदद नहीं कर रहे होते हैं।”