कभी-कभी ऐसा भी होता है ! पटना हाईकोर्ट ने आपराधिक अपील पर अपना फैसला वापस लिया

कभी-कभी ऐसा भी होता है ! पटना हाईकोर्ट ने आपराधिक अपील पर अपना फैसला वापस लिया

हालांकि सीआरपीसी की धारा 482 अंतर्निहित क्षेत्राधिकार के तहत उच्च न्यायालय की शक्ति को निर्धारित सही ढंग से पहचानती है और उसकी सीमा असीमित रही है। ' 

क्या आपराधिक अपीलीय क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल कर कोई फैसला सुनाने के बाद  उच्च न्यायालय उस फैसले को वापस ले सकता है ?

 क्या सीआरपीसी की धारा 482  इसे ऐसा करने के लिए उसे सशक्त बनाती है जबकि धारा 362 आपराधिक मामले में पारित होने और हस्ताक्षरित होने के बाद किसी भी फैसले या आदेश को वापस लेने  या पुनर्विचार करने पर प्रतिबंध लगाती है?

दरअसल पटना उच्च न्यायालय ने हाल ही में बलात्कार के मामले में आपराधिक अपील को खारिज करने के आदेश को वापस लिया है। सुबोध कुमार को ट्रायल कोर्ट ने दोषी ठहराया था। उच्च न्यायालय ने शुरुआत में अपील स्वीकार कर ली और जमानत अर्जी को खारिज कर दिया। इसके बाद एक अन्य जमानत आवेदन दायर किया गया और आरोपी के वकील ने इस तरह दलीलें दी जैसे वो मेरिट पर अपील पर बहस कर रहा था।

पीठ ने फैसला सुरक्षित रख लिया और 27 जून 2018 को फैसला सुनाते हुए अपील को खारिज कर दिया और दोषसिद्धि को कायम रखा।

इसके बाद फैसले को वापस लेने के लिए एक और आवेदन दायर किया गया जिसमें दलील दी गई थी कि भले ही इस मामले की मेरिट को छुआ गया लेकिन ये पीठ को समझाने के लिए था कि पीड़िता व्यस्क है और ये संबंध सहमति से बनाए गए थे। इसलिए ये बलात्कार का मामला नहीं है और इसमें जमानत दी जानी चाहिए।

हालांकि लोक अभियोजक ने फैसला वापस लेने की याचिका का विरोध किया लेकिन न्यायमूर्ति आदित्य कुमार त्रिवेदी ने कहा: "एक बार घोषित करने के बाद फैसला बदलने, संशोधित करने पर प्रतिबंध लगाया गया है। जहां तक अधीनस्थ अदालतों का संबंध है,सीआरपीसी की धारा 151 की तरह अब तक सीआरपीसी के तहत ऐसा कोई प्रावधान नहीं मिला है।  हालांकि सीआरपीसी की धारा 482 अंतर्निहित क्षेत्राधिकार के तहत उच्च न्यायालय की शक्ति को निर्धारित करती है और सही ढंग से पहचानती है और उसकी सीमा असीमित रही है। "

अदालत ने सीआरपीसी की धारा 482  के तहत प्रदत्त शक्ति पर कुछ सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों का भी उल्लेख किया और फैसले को वापस ले लिया। न्यायाधीश ने याचिका को अनुमति देकर अपना आदेश समाप्त कर दिया: "हालांकि इस मामले को मेरे बोर्ड से हटाना उचित लग रहा है।"

लेखक का नोट 

2014 में सुप्रीम कोर्ट ने एक  याचिका को खारिज करते हुए कहा था कि एक न्यायाधीश आदेश को वापस ले सकता है और अपना दिमाग बदल सकता है भले ही इसकी ड्राफ्ट कॉपी हस्ताक्षरित हो और खुली अदालत में निर्धारित की गई हो।

इस फैसले में  सर्वोच्च न्यायालय  ने सुरेंद्र सिंह और अन्य बनाम यूपी राज्य के एक और फैसले का उदाहरण दिया जिसमें कहा गया है :

  "अब इस समय तक जब फैसला दिया जाता है न्यायाधीशों को अपने दिमाग को बदलने का अधिकार है और वास्तव में आखिरी मिनट में  अक्सर परिवर्तन होता है।

इसलिए भले ही किसी ड्राफ्ट फैसले पर हस्ताक्षर कर भी दिए जाएं तो भी ये तब तक ड्राफ्ट फैसला ही कहलाएगा जब तक इसे न्यायालय के फैसले के रूप में औपचारिक रूप से घोषित ना किया जाए। केवल तभी यह एक पूर्ण फैसला माना जाएगा और लागू होगा।

" लेकिन इस मामले में फैसला बकायदा सुरक्षित रखा गया था  और औपचारिक रूप से इसे सुनाया गया था। क्या सीआरपीसी की धारा 482  का आह्वान कर इस तरह फैसले को वापस लेना संभव है? यदि राज्य इस आदेश को चुनौती देता है तो  हम सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसका जवाब दिए जाने का इंतजार करेंगे।