माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक गुजारा और कल्याण अधिनियम के तहत वरिष्ठ नागरिक अंतरिम बेदखली की मांग कर सकते हैं : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट [आर्डर पढ़े]

‘वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों के उल्लंघन को रोकने को प्रभावी बनाना होगा नहीं तो अगर इस बारे में अपील की सुनवाई नहीं की गई या अदालतें अगर नकली तरीके से इससे निपटती रहीं तो यह क़ानूनी व्यवस्था के टूटने का लक्षण होगा।’

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने प्रमोद राजनकर बनाम अरुणाशंकर मामले में कहा था कि वरिष्ठ नागरिक अंतरिम राहत के रूप में माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक गुजारा और कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत बेदखली की मांग कर सकते हैं।

एक वरिष्ठ नागरिक दम्पति ने मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत की थी कि उसका बेटा और उसकी बहू उससे बदसलूकी करती है। मजिस्ट्रेट ने इस मामले का संज्ञान लिया पर उसने वरिष्ठ दम्पति के इस आग्रह को अस्वीकार कर दिया कि इस मामले पर फैसला आने तक वह उनके बेटे और उनकी बहू को घर से निकालने का आदेश दें।

जिला अदालत में भी उनकी इस अपील को अस्वीकार कर दिया गया और कहा कि इस अधिनियम की धारा 24 के तहत बेटे और बहू को घर से निकाला नहीं जा सकता क्योंकि याचिका अदालत में लंबित है।

हाईकोर्ट ने कहा कि सीआरपीसी में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिसके तहत मजिस्ट्रेट गुजारे से संबंधित आवेदन पर फैसला आने तकप्रतिवादी के बेदखली का अंतरिम आदेश दे।

विभिन्न प्रावधानों की चर्चा करते हुए न्यायमूर्ति गौतम भादुड़ी ने कहा, “इस धारा के तहत मजिस्ट्रेट को जो अधिकार मिले हैं वे रोकथाम की प्रकृति का है न कि उपचारात्मक। इसको देखते हुए मजिस्ट्रेट का यह कर्तव्य है कि वह अधिनियम के अध्याय VIके प्रावधानों की इस तरह से व्याख्या करे कि जिस उद्देश्य से यह क़ानून बनाया गया वह पूरा होना चाहिए। इसमें इस तरह के किसी प्रावधान का नहीं होने से, यह मानना उचित होगा कि मजिस्ट्रेट के पास अधिनियम की धारा 24 के तहत उस व्यक्ति को यह निर्देश देने का निहित अधिकार है जिसके खिलाफ याचिका दायर की गई है कि वह वरिष्ठ नागरिकों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाए।”

कोर्ट ने कहा, “लगभग 89 और 77 साल के दो वरिष्ठ नागरिकों ने नारोप लगाया है कि उनके बेटे और उनकी बहू उन पर शारीरिक रूप से हमले करते हैं और उनको प्रताड़ित करते हैं और यह भी कि वे उनको न तो खाना देते हैं और न दवाई और उनको उनके ही घर के एक कोने में बंद रखते हैं। एक वरिष्ठ नागरिक से यह उम्मीद नहीं की जाती है कि वह इस तरह मारा-मारा फिरता रहे और उसके आवेदन पर अंतिम फैसला आने तक उसके खिलाफ हमले और उसको प्रताड़ित किये जाने की घटना के जारी रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती…इस बात की कल्पना की जा सकती है कि जब एक ही घर में रह रहे किसी वरिष्ठ नागरिक पर हमले होते हैं और उसको एक कमरे में बंद रखा जाता है और प्रतिवादी उसका बेटा और उसकी बहू हर दिन उस पर हमले करती हैं तो उस स्थिति में कड़े कदम उठाने की जरूरत होती है ताकि इस तरह के हमले को रोका जा सके और अदालत इस बारे में किनारे खड़े होकर ‘प्रतीक्षा करो और देखो’ की नीति नहीं अपना सकती।”

कोर्ट ने जिला मजिस्ट्रेट को बहू और बेटे की इस घर से बेदखली को सुनिश्चित करने का निर्देश दिया और कहा, “यह उम्मीद नहीं की जाती है कि अगर एक ही घर में रह रहे किसी वरिष्ठ नागरिक पर हमला हो रहा है तो क़ानून उनकी मदद आईपीसी के माध्यम से तब करे जब उनको नुकसान हो चुका होता है। इसलिए वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों के उल्लंघन की चिंताओं को प्रभावी बनाए जाने की जरूरत है नहीं तो यह क़ानून व्यवस्था के टूटने का संकेत होगा…।”

 

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