व्याभिचार को अपराध बना रहने दिया जाए, कानून आयोग धारा 497 के लैंगिक तटस्था पर कर रहा है विचार : केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया

व्याभिचार को अपराध बना रहने दिया जाए, कानून आयोग धारा 497 के लैंगिक तटस्था पर कर रहा है विचार : केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित करते हुए कि भारतीय दंड संहिता की धारा 497 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करने की मांग की है और कहा है कि इस मुद्दे पर भारत के कानून आयोग द्वारा विचार-विमर्श किया जा रहा है।

 केंद्र के हलफनामे में कहा गया है, “  धारा 497 "विवाह संस्था की रक्षा, सुरक्षा और सरंक्षण करती है। 497 को रद्द करना अंतर्निहित भारतीय आचारों के लिए हानिकारक साबित होगा जो विवाह संस्था की पवित्रता को सर्वोच्च महत्व देता है। हलफनामे में केंद्र ने कहा है कि  विधायिका द्वारा कानून का प्रावधान विशेष रूप से अपने विवेक से विवाह की पवित्रता की रक्षा और सुरक्षा के लिए और भारतीय समाज की अद्वितीय संरचना और संस्कृति को ध्यान में रखते हुए किया गया है।

हलफनामे में  न्यायमूर्ति मालिमथ कमेटी की रिपोर्ट के बारे में अदालत को बताया गया है   जिसने मार्च, 2003 में धारा 497 को लिंग तटस्थ तरीके से  करने  सुझाव दिया था।ये  सिफारिश आपराधिक न्याय प्रणाली के सुधार पर समिति की रिपोर्ट में की गई थी। केंद्र ने कहा है कि आईपीसी की धारा 497 के संशोधन के संबंध में कानून आयोग की अंतिम रिपोर्ट का इंतजार है।  मालिमथ कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि इस खंड का उद्देश्य विवाह की पवित्रता को संरक्षित करना है। व्यभिचार के विलुप्त होने से वैवाहिक बंधन की पवित्रता कमजोर हो जाएगी और इसके परिणामस्वरूप वैवाहिक बंधन में लापरवाही होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वो इस प्रावधान की वैधता पर सुनवाई करेगा और जनवरी में इसे पांच जजों की संविधान पीठ को भेज दिया गया था।

खास बात ये है कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश वाईवी चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच ने सौमित्री विष्णु बनाम भारत संघ में इस प्रावधान की संवैधानिकता को बरकरार रखा था। तीन दशक बाद उनके बेटे न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड  ने इस मामले की सुनवाई  के दौरान कहा कि इस अधिनियम को सहमति देने के लिए पत्नी को अपने पति के विवेकानुसार वस्तु के रूप में नहीं माना जा सकता। पति महिला के साथ वस्तु की तरह बर्ताव नहीं कर सकता और महिला को कानूनी कार्रवाई से सरंक्षण मिलना चाहिए। वहीं मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा था कि   ये पुराना प्रावधान लगता है जब समाज में प्रगति होती है तो पीढियों की सोच बदलती है।