केरल हाईकोर्ट ने 5 साल के लड़के को नाम दिया; पिता की उपनाम देने की अर्जी खारिज की [निर्णय पढ़ें]

मेरा मानना ​​है कि परिवार के नाम के बिना एक साधारण नाम वर्तमान में बच्चे को सौंपा जाना चाहिए, जिससे बच्चे की बालिग होने के बाद अगर इच्छा हो तो भविष्य में उसके नाम में संशोधन में मदद मिल सके, न्यायाधीश ने कहा। 

केरल उच्च न्यायालय अब एक और ‘नामहीन’ बच्चे के बचाव के लिए आगे आया है। हाल ही में कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश ऋषिकेश रॉय की अध्यक्षता वाली पीठ ने उस पीठ के फैसले को बरकरार रखा जिसने रजिस्ट्रार को जन्म प्रमाण पत्र में 5 वर्षीय लड़के को ‘स्टीव’ नाम दिया था। दूसरे मामले की तरह ही पंचायत ने जन्म प्रमाण पत्र में बच्चे के नाम के रूप में ‘रयान लुकोज’ नाम डालने के पिता के अनुरोध से इनकार कर दिया था। मामला उच्च न्यायालय पहुंचा और न्यायमूर्ति एके जयशंकरन नंबियार ने पक्षकारों के साथ बातचीत की। मां, जिसके साथ लड़का रह रहा है, ने अदालत से कहा कि चर्च ने उसे ‘स्टीव अब्राहम’ नाम दिया है। बच्चे के पिता के लिए उपस्थित हुए वकील ने इस पर विवाद किया और अदालत से कहा कि उपनाम ‘अब्राहम’ का पिता के परिवार से कोई लेना देना नहीं है। न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा: “तथ्यात्मक स्थिति को ध्यान में रखते हुए और यह पता लगाना कि यह बच्चे के हित में होगा कि उसके पास ऐसा नाम है जो अपने माता-पिता के बीच किसी भी विवाद का विषय नहीं है, इस तरह के विवाद के लिए भविष्य में उसे पूर्वाग्रह हो सकता है, मेरा मानना ​​है कि परिवार के नाम के बिना एक साधारण नाम वर्तमान में बच्चे को सौंपा जाना चाहिए, जिससे बच्चे की बालिग होने के बाद अगर इच्छा हो तो भविष्य में उसके नाम में संशोधन में मदद मिल सके। “

अदालत ने यह भी कहा कि बच्चे को उसके स्कूल में ‘स्टीव’ नाम से जाना जाए और उसे ऐसा कहने के लिए कोई उलझन ना हो।

जन्म प्रमाण पत्र में लड़के को ‘स्टीव’ नाम देने के लिए पंचायत को निर्देशित करते हुए अदालत ने कहा कि उपनाम ‘अब्राहम’, जिसे बपतिस्मा प्रमाण पत्र में और स्कूल के रिकॉर्ड में बच्चे का नाम सौंपा गया है,को बच्चे के संबंध में जारी जन्म प्रमाण पत्र के प्रयोजन में अपनाया नहीं जाएगा।

 पिता ने खंडपीठ के समक्ष इस एकल पीठ के आदेश को चुनौती दी। एकल पीठ के आदेश को देखते हुए खंडपीठ ने कहा: “हम पाते हैं कि अलग रह रहे दंपति के बच्चे को ‘स्टीव’ नाम दिया गया है और यह नाम न तो मां या पिता के लिए विशिष्ट है। पांच वर्षीय बच्चा पहले से ही इस नाम का आदी हो चुका है और और अलग रह रहे पिता के कहने पर नाम बदलने की अनुमति देना उसके हित में नहीं हो सकता। “

 

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